उत्तरकाशी की त्रासदी: धराली में ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़

धराली आपदा 2025: खीरगंगा घाटी में बादल फटने से तबाही, बाढ़ और मलबे में समाया जीवन
उत्तरकाशी की त्रासदी: धराली में ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़
रिपोर्ट: 6 अगस्त 2025 | देहरादून ब्यूरो

प्रस्तावना
उत्तराखंड एक बार फिर एक भीषण प्राकृतिक आपदा का गवाह बना है। 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने न केवल स्थानीय जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया, बल्कि राज्य और देश भर को यह सोचने पर विवश कर दिया कि आखिर हमने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर कितना बड़ा खतरा मोल लिया है। आरंभ में मीडिया और प्रशासन द्वारा इसे ‘बादल फटना’ कहा गया, लेकिन विशेषज्ञों की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह घटना एक ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) थी — एक ऐसी आपदा जिसका संकेत पहले से था, पर जिसकी अनदेखी की गई। यह रिपोर्ट धराली त्रासदी की विस्तृत जानकारी, वैज्ञानिक कारण, मानवीय दृष्टिकोण, प्रशासनिक प्रतिक्रिया, पर्यावरणीय चेतावनी और भविष्य के लिए संभावित समाधान प्रस्तुत करती है।
घटना की पृष्ठभूमि
धराली गाँव उत्तरकाशी जिले का एक शांत, सुरम्य और ऐतिहासिक स्थान है, जो हिमालय की गोद में बसा हुआ है। यह गाँव पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, साथ ही यह भागीरथी नदी के किनारे स्थित है, जो गंगोत्री की ओर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक प्रमुख पड़ाव भी है। वर्षों से इस क्षेत्र में छोटे होटल, होमस्टे और दुकानें उग आए हैं, जिन्होंने गाँव के परिदृश्य को एक व्यावसायिक रूप दे दिया है। लेकिन इसी व्यावसायीकरण ने इस क्षेत्र को आपदा की दृष्टि से अधिक संवेदनशील बना दिया।
5 अगस्त को दोपहर 1:50 बजे अचानक धराली गाँव में एक तेज़ गर्जना सुनाई दी, जिससे लोगों को लगा कि कोई बड़ा विस्फोट हुआ है। लेकिन कुछ ही पलों में गाँव की ऊपरी पहाड़ी से तेज़ रफ्तार में पानी, कीचड़, चट्टानें और बर्फ का सैलाब बहता हुआ आया। यह नज़ारा किसी विनाशकारी भू-स्खलन जैसा था। कुछ ही मिनटों में लगभग 36 भवन, जिनमें होटल, होमस्टे और घर शामिल थे, धराशायी हो गए या बह गए।
स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग ने तुरंत हरकत में आते हुए बचाव कार्य शुरू किया, लेकिन बाढ़ के तीव्र वेग और मलबे की भारी मात्रा ने राहत कार्यों को कठिन बना दिया। अब तक की जानकारी के अनुसार 4 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है और 50 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। बचाव कार्य लगातार जारी है।

GLOF क्या होता है?
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, जिसे संक्षेप में GLOF कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें ग्लेशियरों के पास बनी बर्फीली झीलें अचानक फट जाती हैं और भारी मात्रा में पानी, बर्फ, और मलबा नीचे के इलाकों में बह जाता है। यह आपदा विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जहाँ ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण नई झीलें बन रही हैं। जब इन झीलों की बर्फीली या मिट्टी-पत्थर की दीवार कमजोर हो जाती है, तो वह अचानक टूट सकती है और नीचे के क्षेत्रों को तबाह कर सकती है।
धराली की घटना में भी यही हुआ। विशेषज्ञों ने बताया कि ऊपर के इलाके में एक झील बनी हुई थी, जिसका जलस्तर भारी बारिश और ग्लेशियर के पिघलने से बहुत अधिक बढ़ गया था। झील की प्राकृतिक दीवार टूट गई, जिससे पूरी झील का पानी अचानक धराली गाँव की ओर बह निकला। यह कोई सामान्य बाढ़ नहीं थी, बल्कि बर्फ, चट्टानों और पानी का एक तूफान था।
चश्मदीदों की गवाही और मानवीय त्रासदी
इस त्रासदी का सबसे मार्मिक पहलू वह मानवीय पीड़ा है जो गाँववासियों ने झेली। एक स्थानीय महिला, निर्मला देवी, कहती हैं, “मैं अपने घर में दोपहर का खाना बना रही थी, तभी मुझे ज़ोर की आवाज़ सुनाई दी। मैंने बाहर देखा तो पहाड़ी से धूल का एक गुबार उठता हुआ आया और फिर कुछ समझ आता, उससे पहले ही पूरा घर काँपने लगा। हम किसी तरह बाहर भागे और पेड़ की आड़ में छिप गए। जब शोर थमा, तो देखा कि मेरा घर बह चुका था।”
इसी तरह रमेश नेगी नामक एक दुकानदार का कहना था, “हमने पहले कभी ऐसी तबाही नहीं देखी। होटल के कमरे, गाड़ियाँ, पेड़ – सब कुछ कुछ ही मिनटों में बह गया। किसी को भागने तक का मौका नहीं मिला।”
गांव के स्कूल शिक्षक मनोज रावत बताते हैं, “बाढ़ इतनी तेज़ थी कि ज़मीन ही खिसक गई। दो छात्र और एक अध्यापक लापता हैं। हम प्रार्थना कर रहे हैं कि वे जीवित मिल जाएँ।”
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और राहत कार्य
उत्तराखंड सरकार ने तुरंत इस घटना पर संज्ञान लेते हुए आपदा प्रबंधन बलों को सक्रिय किया। NDRF, SDRF, ITBP और सेना के संयुक्त बलों ने राहत और बचाव अभियान शुरू किया। घटनास्थल तक पहुँचने के लिए हेलीकॉप्टर, ड्रोन्स और सैटेलाइट इमेजरी का सहारा लिया गया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटनास्थल का हवाई निरीक्षण किया और कहा, “सरकार हर संभव मदद करेगी। प्रभावितों को मुआवज़ा मिलेगा और पुनर्वास के लिए विशेष पैकेज दिया जाएगा।”
अब तक 150 से अधिक जवान राहत कार्यों में लगे हैं। करीब 60 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है।
वैज्ञानिकों की राय और पर्यावरणीय संकेत
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने घटनास्थल की जांच के बाद स्पष्ट किया कि यह GLOF की घटना थी। डॉ. रेखा चौधरी, जो जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन करती हैं, कहती हैं, “हिमालयी क्षेत्र में GLOF की घटनाएँ जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और उनके पास बनी झीलें अस्थिर होती जा रही हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि धराली जैसी घटनाएँ चेतावनी हैं कि अगर हमने हिमालय के प्राकृतिक ढाँचे से छेड़छाड़ नहीं रोकी, तो ऐसे हादसे और बढ़ेंगे। सड़कों का चौड़ीकरण, जंगलों की कटाई, अनियंत्रित पर्यटन, और निर्माण कार्य इन सबका असर अब हमारे सामने है।
मीडिया की भूमिका और भ्रम की स्थिति
शुरुआत में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इसे “बादल फटना” बताया गया था, जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हुई। लेकिन जैसे-जैसे वैज्ञानिक प्रमाण सामने आए, स्पष्ट हुआ कि यह GLOF था।
मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह आपदा की वास्तविक प्रकृति को समझे और सही जानकारी लोगों तक पहुँचाए। गलत रिपोर्टिंग से न केवल अफवाहें फैलती हैं बल्कि आपदा प्रबंधन और नीति निर्माण में भी बाधा आती है।
भविष्य के लिए नीतिगत सुझाव
- पूर्व चेतावनी प्रणाली: सभी ग्लेशियर और उनसे जुड़ी झीलों की सैटेलाइट से निगरानी और अलार्म सिस्टम की स्थापना।
- स्थानीय प्रशिक्षण: पहाड़ी क्षेत्रों के निवासियों को आपदा प्रबंधन और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
- पर्यावरणीय कानूनों का सख्त पालन: संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
- ग्लेशियर अध्ययन केंद्र: उत्तराखंड में ग्लेशियरों और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर विशेष अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाएँ।
- जन-जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में आपदा शिक्षा को शामिल किया जाए।
दैनिक प्रभातवाणी
धराली की त्रासदी एक चेतावनी है — एक ऐसी चेतावनी जो केवल उत्तरकाशी ही नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र और नीति निर्माताओं को सुननी चाहिए। यह आपदा सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं थी, यह मानवजनित लापरवाही, पर्यावरणीय अज्ञानता और अनियंत्रित विकास का परिणाम भी है। अगर अब भी हमने चेतना नहीं ली, तो भविष्य में ऐसी त्रासदियाँ और भी भयानक रूप ले सकती हैं।
धराली के लोग आज उजड़े हुए हैं, लेकिन उनकी पीड़ा हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ तालमेल ही हमारे अस्तित्व की गारंटी है। विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति की सीमाओं के भीतर हो। उत्तराखंड को चाहिए कि वह विकास की नई परिभाषा गढ़े — एक ऐसी परिभाषा जिसमें ‘प्रगति’ और ‘प्रकृति’ साथ-साथ चलें।