January 12, 2026

उत्तराखंड में महिलाओं के 30% क्षैतिज आरक्षण पर सवाल: हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 18 अगस्त को

उत्तराखंड में महिलाओं के 30% क्षैतिज आरक्षण पर सवाल: हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 18 अगस्त को
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उत्तराखंड में महिलाओं के 30% क्षैतिज आरक्षण पर सवाल: हाईकोर्ट में अगली सुनवाई 18 अगस्त को

दैनिक प्रभातवाणी | नैनीताल | 5 अगस्त 2025

उत्तराखंड राज्य में स्थानीय मूल की महिलाओं को 30 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने की नीति पर अब न्यायिक संकट गहराता जा रहा है। इस आरक्षण नीति को चुनौती देते हुए दायर की गई याचिका पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। अदालत ने अगली सुनवाई की तिथि 18 अगस्त 2025 तय की है।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि यह क्षैतिज आरक्षण नीति संविधान के अनुच्छेद 16 (Article 16) का उल्लंघन करती है, जो सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता की गारंटी देता है। मामले में सरकार को भी नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया है।


क्या है 30% क्षैतिज आरक्षण?

उत्तराखंड राज्य सरकार द्वारा जारी नीति के अनुसार, राज्य की स्थानीय मूल की महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30% क्षैतिज आरक्षण दिया जाता है। यह आरक्षण क्षैतिज होने के कारण हर श्रेणी – सामान्य, ओबीसी, एससी, एसटी आदि – में लागू होता है। इस नीति के तहत, यदि कोई महिला अन्य श्रेणी में चयनित होती है, तो उसे 30% क्षैतिज कोटे के अंतर्गत भी गिना जा सकता है।


याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता ने न्यायालय में तर्क दिया कि यह आरक्षण नीति लैंगिक असमानता की जगह अवसरों की असमानता को जन्म देती है। उनका कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 16 (1) यह कहता है कि “सभी नागरिकों को समान अवसर मिलना चाहिए”। इस 30% क्षैतिज आरक्षण के कारण पुरुष उम्मीदवारों को प्रतियोगी परीक्षाओं में समुचित अवसर नहीं मिल पाता।

याचिका में यह भी कहा गया है कि इस नीति के चलते बाहरी जिलों या अन्य राज्यों से आने वाली महिला अभ्यर्थियों के अवसर सीमित हो जाते हैं, जिससे समग्र प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ता है।


राज्य सरकार का पक्ष

उत्तराखंड सरकार ने इस आरक्षण को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक नीतिगत निर्णय बताया है। सरकार का तर्क है कि राज्य की महिलाएं विशेष भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहती हैं, जिनके चलते उन्हें विशेष संरक्षण और अवसर प्रदान करना आवश्यक है।

विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और आयोगों ने भी माना है कि उत्तराखंड की महिलाओं की भागीदारी सरकारी नौकरियों में अपेक्षाकृत कम रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने यह विशेष आरक्षण नीति लागू की थी।


उच्च न्यायालय की भूमिका

नैनीताल उच्च न्यायालय में अब यह मुद्दा संवैधानिक समीक्षा के दायरे में है। अदालत यह जांच कर रही है कि क्या यह क्षैतिज आरक्षण नीति संवैधानिक प्रावधानों की सीमा में है या नहीं। पहले की सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया था कि वह इस मामले को गंभीरता से ले रही है क्योंकि यह लाखों उम्मीदवारों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

अगली सुनवाई अब 18 अगस्त 2025 को होनी तय है, जिसमें संभव है कि अदालत राज्य सरकार से विस्तृत हलफनामा और पूर्ववर्ती नीतियों का विवरण मांगे।


पिछली कानूनी घटनाएँ

यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड की क्षैतिज आरक्षण नीति को चुनौती दी गई हो। इससे पहले भी कई बार विभिन्न भर्तियों – विशेषकर पुलिस, शिक्षक, और पटवारी भर्ती – में इस नीति पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि अधिकतर मामलों में अदालत ने राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय दिया था, लेकिन इस बार याचिकाकर्ता ने इसे संवैधानिक व्याख्या के स्तर पर चुनौती दी है।


सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

राज्य के विभिन्न महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस याचिका को महिला विरोधी कदम बताया है। उनका कहना है कि यह आरक्षण कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास है।

उत्तरकाशी, चंपावत और बागेश्वर जैसे दूरस्थ जिलों की महिलाओं को अब तक मुख्यधारा की नौकरियों में जगह मिलनी कठिन रही है। यदि यह आरक्षण हटाया गया तो महिलाओं की भागीदारी और भी कम हो जाएगी।


समानता बनाम संरक्षण: कानूनी दुविधा

इस मुद्दे पर संवैधानिक और सामाजिक दोनों ही पक्षों में संघर्ष स्पष्ट है। एक ओर संविधान समान अवसर की बात करता है, वहीं दूसरी ओर Article 15(3) यह अधिकार देता है कि राज्य महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बना सकता है।

ऐसे में अदालत को यह तय करना होगा कि क्या यह 30% क्षैतिज आरक्षण संविधान की भावना के अनुरूप है या नहीं। यह भी देखना होगा कि यह आरक्षण किसी विशेष वर्ग को अनुचित लाभ तो नहीं पहुंचा रहा।


दैनिक प्रभातवाणी : 18 अगस्त को हो सकता है बड़ा फैसला

उत्तराखंड में महिलाओं के लिए लागू 30% क्षैतिज आरक्षण पर चल रही बहस अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। नैनीताल उच्च न्यायालय की अगली सुनवाई 18 अगस्त 2025 को है, और यदि उस दिन अदालत कोई दिशा-निर्देश देती है, तो यह न केवल राज्य की भविष्य की नियुक्तियों पर असर डालेगा, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।