“चुनाव परिणाम बना जानलेवा: समर्थक ने प्रत्याशी की हार के बाद की आत्महत्या, गांव में शोक की लहर”
ajaysemalty98 August 2, 2025
उधमसिंह नगर | दिनांक: 2 अगस्त 2025 "चुनाव परिणाम बना जानलेवा: समर्थक ने प्रत्याशी की हार के बाद की आत्महत्या, गांव में शोक की लहर"
दैनिक प्रभातवाणी
उधमसिंह नगर | दिनांक: 2 अगस्त 2025
“चुनाव परिणाम बना जानलेवा: समर्थक ने प्रत्याशी की हार के बाद की आत्महत्या, गांव में शोक की लहर”
उत्तराखंड के उधमसिंह नगर जिले से एक बेहद दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे क्षेत्र को गहरे सदमे में डाल दिया है। पंचायत चुनावों के हालिया परिणामों के बाद एक 32 वर्षीय युवक ने आत्महत्या कर ली। युवक अपने क्षेत्र के एक प्रत्याशी का सक्रिय समर्थक था, लेकिन जब परिणामों में उसके प्रत्याशी को करारी हार मिली और गांव में विरोधियों ने उसे “गद्दार” और “नाकाम रणनीतिकार” जैसे ताने मारने शुरू किए, तो वह मानसिक तनाव में चला गया। अंततः उसने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
मृतक युवक की पहचान राहुल सिंह (बदला हुआ नाम) के रूप में की गई है, जो कि ग्राम अजीमपुर का निवासी था। राहुल एक मेहनती, मिलनसार और राजनीति में विशेष रुचि रखने वाला युवक था। वह पिछले कई महीनों से पंचायत चुनावों को लेकर अत्यधिक सक्रिय था और अपने पसंदीदा प्रत्याशी के लिए दिन-रात प्रचार प्रसार में जुटा हुआ था। राहुल की सक्रियता इतनी अधिक थी कि गांव में हर घर उसे प्रत्याशी के प्रतिनिधि के रूप में जानने लगा था। लेकिन जब चुनावी परिणाम प्रत्याशी के खिलाफ आए, तो राहुल पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
राजनीति की कटुता और मानसिक प्रताड़ना की परिणति
बताया जा रहा है कि चुनावों के परिणाम आते ही गांव के कुछ विरोधी गुटों द्वारा राहुल पर तंज कसने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ लोग उसे चुनावी हार का ज़िम्मेदार ठहराने लगे। उसे “गद्दार”, “फर्जी प्रचारक”, और “पैसे खाकर काम बिगाड़ने वाला” जैसे अपमानजनक शब्दों से पुकारा जाने लगा। राहुल जैसे संवेदनशील युवक के लिए यह ताने असहनीय बनते गए।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, चुनाव परिणाम आने के बाद से ही राहुल गुमसुम रहने लगा था। न पहले जैसी बातचीत, न किसी से मेल-जोल। वह अधिकतर समय अपने कमरे में ही बंद रहता और गहरी सोच में डूबा नजर आता। परिजनों ने कई बार उससे बात करने की कोशिश की लेकिन राहुल ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
1 अगस्त की रात को राहुल ने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और अगली सुबह जब वह काफी देर तक बाहर नहीं निकला, तो परिवार वालों को चिंता हुई। दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर राहुल का शव पंखे से लटकता मिला। यह दृश्य परिवार और गांववालों के लिए किसी भीषण दुःस्वप्न से कम नहीं था।
पुलिस जांच और प्राथमिक रिपोर्ट
मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया है। प्रारंभिक जांच में आत्महत्या की पुष्टि हुई है, लेकिन परिवार और ग्रामीणों के बयान के आधार पर पुलिस मानसिक प्रताड़ना और उकसावे के कोण से भी जांच कर रही है।
पुलिस अधीक्षक ने कहा है कि यदि यह प्रमाणित होता है कि राहुल को चुनावी हार के बाद सुनियोजित तरीके से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाएगी।
गांव में मातम और आत्मचिंतन का माहौल
राहुल की आत्महत्या के बाद पूरे अजीमपुर गांव में शोक की लहर है। युवक की अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग उमड़े और हर आंख नम थी। जिन लोगों ने चुनावी माहौल में उसे निशाना बनाया था, वे अब चुप हैं। परिजनों की पीड़ा असहनीय है। उनकी केवल यही मांग है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो जिन्होंने राहुल को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
गांव के बुजुर्गों और समाजसेवियों ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा है कि राजनीति का स्तर अब इतना गिर चुका है कि लोग निजी स्तर पर अपमान और नफरत फैलाने में संकोच नहीं करते। एक सामान्य युवक जिसने केवल चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया, उसकी आत्महत्या इस बात की चेतावनी है कि सामाजिक माहौल को साफ-सुथरा बनाना अत्यंत आवश्यक हो चुका है।
मानसिक स्वास्थ्य पर उठते गंभीर सवाल
यह घटना मानसिक स्वास्थ्य और सामूहिक जिम्मेदारी को लेकर कई सवाल खड़े करती है। क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि किसी की भावनाओं का सम्मान करना भूल चुके हैं? राहुल की आत्महत्या यह दर्शाती है कि ग्रामीण भारत में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कितनी गंभीर उपेक्षा है। ना कोई परामर्शदाता, ना कोई सहारा – जब युवक जैसे राहुल अकेले पड़ जाते हैं, तो मौत ही उन्हें अंतिम रास्ता लगती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब सरकार को हर ग्राम पंचायत में मानसिक स्वास्थ्य परामर्शदाताओं की नियुक्ति करनी चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों और ग्राम सभाओं में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
राजनीति बनाम मानवता – एक सोचने वाली बात
राहुल की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या चुनावों की हार-जीत इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि वह किसी की जान ले ले? चुनाव लोकतंत्र का पर्व होता है, लेकिन जब यह पर्व किसी की ज़िंदगी का अंधकार बन जाए, तो समाज को रुककर सोचना होगा। राहुल कोई बड़ा नेता नहीं था, न ही वह किसी कुर्सी का दावेदार था। वह एक आम ग्रामीण युवक था जो लोकतंत्र की प्रक्रिया में भाग लेने का उत्साही समर्थक था। उसकी मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, यह पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की संवेदनहीनता की चीर-फाड़ है।
समाज को लेना होगा सामूहिक उत्तरदायित्व
अब समय आ गया है कि हम, समाज के सभी वर्ग – नेता, कार्यकर्ता, ग्रामीण, प्रशासनिक अधिकारी और आम जनता – यह आत्ममंथन करें कि हमारी भाषा, हमारी सोच और हमारे व्यवहार का क्या असर पड़ता है। यदि हम केवल विरोध करने के नाम पर दूसरों की मानसिक स्थिति को नजरअंदाज करते हैं, तो हम भी उतने ही दोषी हैं जितना कोई अपराधी।
राहुल जैसे युवाओं को बचाने के लिए हमें उन्हें विश्वास देना होगा, संवाद करना होगा, और आलोचना की जगह सहयोग और समर्थन की भावना विकसित करनी होगी।
सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस घटना ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार की तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या चुनाव के बाद उत्पन्न होने वाले सामाजिक तनाव को कम करने के लिए कोई नीति है? क्या कोई मानसिक परामर्शदाता या हेल्पलाइन गांवों में कार्यरत है? क्या जिला स्तर पर निगरानी समितियाँ गठित की गई हैं जो चुनाव के बाद तनावग्रस्त परिवारों से संवाद करें? यदि नहीं, तो यह कमी अब दूर करना अनिवार्य हो गया है।
अंतिम शब्द: राहुल की मौत – एक चेतावनी, एक पुकार
राहुल की आत्महत्या सिर्फ एक युवक की निजी त्रासदी नहीं है। यह पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि संवेदनशीलता, समझदारी और मानवीय दृष्टिकोण अब केवल उपदेश नहीं, बल्कि व्यवहारिक जरूरत बन गई है। राजनीति के इस भीड़ में यदि हम अपने युवा वर्ग की मानसिक स्थिति को नहीं समझ पाए, तो हम भविष्य में और भी भयावह घटनाओं के साक्षी बन सकते हैं।
दैनिक प्रभातवाणी इस दुखद घटना पर गहरा शोक व्यक्त करता है और शासन से मांग करता है कि भविष्य में ऐसी कोई घटना न हो इसके लिए विशेष नीति और रणनीति तैयार की जाए। साथ ही, समाज के सभी वर्गों से आग्रह करता है कि चुनाव केवल जीत और हार का खेल नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और लोकतांत्रिक संवाद का अवसर है।
वेबसाइट: dainikprbhatvani.com