January 12, 2026

भारी बारिश और बादल फटने से तबाही: उत्तर भारत के पहाड़ों से मैदान तक मची हाहाकार

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दैनिक प्रभातवाणी रिपोर्ट \17 अगस्त

भारी बारिश और बादल फटने से तबाही: उत्तर भारत के पहाड़ों से मैदान तक मची हाहाकार

पिछले कुछ दिनों से उत्तरी भारत में मानसून ने ऐसा कहर बरपाया है कि पहाड़ से लेकर मैदान तक तबाही का मंजर नजर आने लगा है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्य इस समय लगातार हो रही भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं से जूझ रहे हैं। कहीं फ्लैश फ्लड से गांव बह गए हैं, कहीं पहाड़ टूटकर सड़कों पर आ गए हैं, तो कहीं नदी-नाले अपने किनारों को तोड़ते हुए बस्तियों की ओर बढ़ चले हैं। इस आपदा की चपेट में आकर अब तक सैकड़ों परिवार बेघर हो गए हैं और हजारों लोग राहत शिविरों में ठिकाना ढूंढ रहे हैं।

पहाड़ी राज्यों में ऐसी तबाही कोई नई बात नहीं है। मानसून के दौरान अक्सर ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं, लेकिन इस बार का मंजर ज्यादा खतरनाक है। वैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से इन इलाकों में आपदाओं की तीव्रता बढ़ गई है। लगातार हो रही बारिश ने पहाड़ की नमी को इतना बढ़ा दिया है कि मामूली सी बारिश के बाद भी पहाड़ खिसकने लगते हैं। यही कारण है कि जगह-जगह भूस्खलन हो रहे हैं, जिससे कई राष्ट्रीय राजमार्ग बंद हो चुके हैं।

हिमाचल प्रदेश की स्थिति

हिमाचल प्रदेश में पिछले दो दिनों से बारिश ने जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। मंडी, कुल्लू, चंबा और किन्नौर जैसे जिलों में भूस्खलन की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। कई जगहों पर घर ढह गए हैं और खेत पूरी तरह से बह गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की फसलें बर्बाद हो गई हैं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।

सड़कों की हालत सबसे खराब है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह-जगह मलबा जमा हो गया है। कुल्लू-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर पर्यटक घंटों तक फंसे रहे। चंबा में अचानक आई बाढ़ से दर्जनों मकान पानी में डूब गए और लोगों को अपनी जान बचाने के लिए ऊँचाई वाले इलाकों में भागना पड़ा।

हिमाचल की सरकार ने हालात की गंभीरता को देखते हुए राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए हैं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बताया है कि अब तक सैकड़ों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में लगातार बारिश के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में मुश्किलें आ रही हैं। हेलिकॉप्टर कई जगह उड़ान नहीं भर पा रहे हैं, जिससे सेना और NDRF को जमीन से ही राहत अभियान चलाना पड़ रहा है।

उत्तराखंड में हालात

उत्तराखंड का जिक्र होते ही सबसे पहले गंगोत्री और बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थलों का नाम सामने आता है। इस समय यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद हैं, लेकिन लगातार बारिश और भूस्खलन ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

मोतीबग्गा हाईवे पर मलबा और पेड़ गिरने से यातायात घंटों तक बाधित रहा। इस वजह से हजारों तीर्थयात्री रास्ते में ही फंसे रहे। स्थानीय प्रशासन ने भारी मशक्कत के बाद सड़क को आंशिक रूप से खोला, लेकिन अभी भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।

उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने तबाही मचाई है। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से टूट चुका है। ग्रामीण अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। SDRF और NDRF की टीम दिन-रात राहत कार्यों में जुटी हुई हैं। पहाड़ी नदियों में उफान इतना ज्यादा है कि लोग किनारे पर खड़े होने से भी डर रहे हैं।

सबसे चिंताजनक स्थिति उन इलाकों की है जहाँ बादल फटने से एक ही झटके में पूरा गांव पानी और मलबे में दब गया। अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार करीब 75 लोग लापता बताए जा रहे हैं। इनकी खोज में सेना, पुलिस और आपदा प्रबंधन दल लगातार जुटे हुए हैं। परिजनों की आँखों में भय और उम्मीद दोनों दिखाई दे रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में बारिश का असर

जम्मू-कश्मीर के डोडा, किश्तवाड़ और रामबन जिलों में भारी बारिश से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। किश्तवाड़ में पहाड़ का बड़ा हिस्सा टूटकर नदी में गिर गया, जिससे अचानक पानी का बहाव बढ़ गया और कई घर बह गए। डोडा जिले में भी कई गांव पानी की चपेट में आ गए हैं।

सड़क मार्ग पूरी तरह से अवरुद्ध हो चुके हैं। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर जगह-जगह भूस्खलन हुआ है, जिसके चलते यातायात पूरी तरह से ठप है। हजारों लोग दोनों ओर फंसे हुए हैं और उन्हें प्रशासन की ओर से राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है।

यहाँ भी सेना और NDRF की टीमें लगातार राहत कार्य कर रही हैं। लेकिन पहाड़ी रास्तों और लगातार हो रही बारिश के कारण बचाव कार्य कठिन हो गया है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कई स्कूलों और सामुदायिक भवनों को राहत शिविरों में बदल दिया है ताकि प्रभावित लोग अस्थायी रूप से वहाँ रह सकें।

आपदा के पीछे का विज्ञान: क्यों हर साल बढ़ रही है बारिश और भूस्खलन की तबाही

उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों — हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर — में हर साल मानसून के दौरान भारी तबाही देखने को मिलती है। कहीं बादल फटते हैं, कहीं नदियाँ उफान पर आ जाती हैं और कहीं पूरे-के-पूरे गांव मलबे में दब जाते हैं। इस बार भी हालात वैसे ही बने हुए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों हर साल इन इलाकों में तबाही का पैमाना बढ़ता जा रहा है? क्या यह सिर्फ प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है या फिर इंसानी गतिविधियों ने इसे और विकराल बना दिया है?

जलवायु परिवर्तन का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की आपदाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। बीते कुछ दशकों में धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर हिमालयी इलाकों में देखा जा रहा है। जब वातावरण का तापमान बढ़ता है, तो हवा में नमी भी बढ़ जाती है। नमी बढ़ने के कारण बादल बहुत तेजी से भारी हो जाते हैं और एक ही जगह पर अचानक पानी उंडेल देते हैं। यही वजह है कि बादल फटने की घटनाएँ अब सामान्य होती जा रही हैं।

पहले बारिश का पैटर्न अलग था। धीरे-धीरे लंबे समय तक बारिश होती थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। बारिश की जगह अचानक मूसलधार पानी गिरता है, जिससे नदियाँ और नाले पल भर में उफान पर आ जाते हैं। यही फ्लैश फ्लड यानी अचानक आने वाली बाढ़ का मुख्य कारण है।

ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना

हिमालय दुनिया का सबसे बड़ा “वॉटर टॉवर” कहलाता है। यहां हजारों ग्लेशियर हैं, जो उत्तर भारत की नदियों को जीवन देते हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं।

ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी का स्तर अचानक बढ़ जाता है। कई बार ग्लेशियरों के पास झीलें बन जाती हैं। इन्हें “ग्लेशियल लेक” कहा जाता है। जब इनमें पानी का दबाव बहुत ज्यादा हो जाता है, तो झील टूट जाती है और एक साथ लाखों क्यूसेक पानी नीचे की ओर बह निकलता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड और लद्दाख में ऐसी घटनाएँ कई बार देखी गई हैं।

इस बार भी लगातार हो रही बारिश और बर्फ पिघलने की वजह से कई जगह नदियाँ उफान पर आ गईं और गांव तबाह हो गए।

जंगलों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण

इन आपदाओं के पीछे इंसानी गतिविधियों की भूमिका भी कम नहीं है। हिमालयी राज्यों में लगातार जंगलों की कटाई हो रही है। सड़कों और होटलों के निर्माण के लिए पहाड़ों को काटा जा रहा है। इससे पहाड़ कमजोर हो गए हैं।

पहले घने जंगल बारिश के पानी को रोक लेते थे। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को थामे रहती थीं, जिससे भूस्खलन कम होता था। लेकिन अब पेड़ कटने से मिट्टी ढीली हो गई है। यही कारण है कि मामूली सी बारिश में भी पहाड़ खिसकने लगते हैं और मलबा नीचे आ जाता है।

साथ ही, अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। नदी किनारे होटल और बाजार खड़े कर दिए गए हैं। जब नदियाँ उफान पर आती हैं, तो सबसे पहले ये निर्माण बह जाते हैं और साथ ही आसपास के इलाके को भी तबाह कर देते हैं।

भूगर्भीय कारण

हिमालय दुनिया का सबसे युवा पर्वत माना जाता है। यह अभी भी भूगर्भीय दृष्टि से स्थिर नहीं है। यहां की चट्टानें काफी कमजोर हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में भूकंप और भूस्खलन की घटनाएँ ज्यादा होती हैं।

जब लगातार बारिश होती है, तो पानी चट्टानों और मिट्टी में रिसकर दबाव बढ़ा देता है। दबाव बढ़ने के बाद पहाड़ का हिस्सा टूटकर नीचे गिर जाता है। यही कारण है कि भूस्खलन बार-बार होते रहते हैं।

मानसून का बदलता पैटर्न

भारत में मानसून सदियों से जीवनदायिनी रहा है। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसके पैटर्न को बदल दिया है। पहले मानसून धीरे-धीरे आता और लंबे समय तक रहता था। अब मानसून कम अवधि का और ज्यादा तीव्र हो गया है।

इसका मतलब है कि जितनी बारिश पहले एक महीने में होती थी, अब उतनी ही बारिश तीन-चार दिनों में हो जाती है। इससे नदियाँ और नाले पानी सम्हाल नहीं पाते और बाढ़ आ जाती है।

वैज्ञानिक चेतावनी और भविष्य

वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में ये आपदाएँ और भी गंभीर रूप ले लेंगी। हिमालयी ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक अगले सौ वर्षों में इनका एक बड़ा हिस्सा गायब हो सकता है।

इससे न केवल बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ेंगी बल्कि भविष्य में पानी की कमी भी हो सकती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमें अब सतत विकास की ओर ध्यान देना होगा। नदी किनारे और भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों में निर्माण कार्य रोकने होंगे। साथ ही, जंगलों की कटाई पर सख्त रोक लगानी होगी।

समाधान की ओर

आपदा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसके असर को कम किया जा सकता है। इसके लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं।

  • सबसे पहले, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करना होगा।

  • दूसरा, स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग देना होगी ताकि किसी भी स्थिति में वे तुरंत कार्रवाई कर सकें।

  • तीसरा, वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित विकास कार्य होने चाहिए। जहां भूस्खलन का खतरा है, वहाँ भारी निर्माण से बचना होगा।

  • चौथा, वनीकरण को बढ़ावा देना होगा ताकि पहाड़ की मिट्टी मजबूत हो सके।