यमुना उफान पर: मैदानों में बढ़ा डर, दिल्ली में बाढ़ का संकट

यमुना उफान पर: मैदानों में बढ़ा डर, दिल्ली में बाढ़ का संकट
यमुनानगर/दिल्ली
17 अगस्त 2025, रविवार
यमुना उफान पर: मैदानों में बढ़ा डर, दिल्ली में बाढ़ का संकट
उत्तर भारत में लगातार हो रही बारिश ने अब मैदानों की रफ्तार को भी थाम दिया है। हरियाणा के यमुनानगर जिले में स्थित हैटनीकुंड बैराज से जलस्तर बढ़ने के बाद सभी 18 गेट खोल दिए गए। इससे यमुना नदी में एक साथ 1.78 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह जलराशि अगले 30 से 48 घंटे में दिल्ली पहुँचेगी। ऐसे में राजधानी सहित यमुना किनारे बसे जिलों में बाढ़ का खतरा गहराने लगा है।
यमुनानगर से दिल्ली तक पानी की राह
हैटनीकुंड बैराज से छोड़ा गया पानी सबसे पहले यमुनानगर और करनाल जिलों के खेतों और गांवों से गुजरता हुआ सोनीपत, पानीपत और फिर दिल्ली तक पहुँचता है। रास्ते में नदी के छोटे-छोटे सहायक नाले भी इसमें मिलकर जलस्तर को और ऊँचा कर देते हैं। इस बार पहाड़ों से लगातार पानी आने के कारण यमुना का प्रवाह पहले ही तेज़ है। ऐसे में बैराज से छोड़ा गया पानी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।
यमुनानगर के ग्रामीण इलाकों में पहले से ही पानी भरने लगा है। प्रशासन ने कई गांवों को अलर्ट पर रखा है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। वहीं दिल्ली के यमुना खादर क्षेत्र, मजनू का टीला, लोहे का पुल और आईटीओ के पास बसे बस्तियों में खतरा सबसे ज्यादा माना जा रहा है।
दिल्ली में अलर्ट, प्रशासन तैयार
दिल्ली सरकार ने हालात को देखते हुए बाढ़ नियंत्रण कक्षों को सक्रिय कर दिया है। आपदा प्रबंधन विभाग ने NDRF और SDRF की टीमों को तैनात कर दिया है। स्कूल और सामुदायिक भवनों को अस्थायी राहत शिविरों में बदलने की तैयारी की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने समीक्षा बैठक में साफ कहा कि किसी भी हाल में लोगों की जान को खतरे में नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि निचले इलाकों से लोगों को पहले ही सुरक्षित निकाला जाए। वहीं, पुलिस और सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स को नदी किनारों पर निगरानी बढ़ाने के आदेश दिए गए हैं।
जनता की परेशानी: डर और अनिश्चितता
यमुना किनारे रहने वाले लोगों के बीच डर का माहौल है। मजदूर बस्तियों के परिवार अपना सामान समेटकर सुरक्षित स्थानों की तलाश में हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। दिल्ली के कई हिस्सों में लोग अब भी पिछली बार की तबाही को याद कर रहे हैं जब पानी लोहे के पुल तक पहुँच गया था और हजारों लोग बेघर हो गए थे।
राहुल, जो यमुना खादर में रहते हैं, बताते हैं — “हर साल यही होता है। बरसात आते ही हमें अपना घर छोड़कर जाना पड़ता है। सरकार वादा करती है कि स्थायी समाधान होगा, लेकिन कुछ नहीं बदलता।”
वैज्ञानिक नजरिया: क्यों बढ़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट केवल पहाड़ों पर बारिश का असर नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन और मानव हस्तक्षेप का परिणाम भी है। मानसून के दौरान जब पश्चिमी विक्षोभ और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी टकराती है, तो पहाड़ी इलाकों में अत्यधिक वर्षा होती है। यह पानी तेजी से नदियों में पहुँचता है और अचानक उनका जलस्तर बढ़ जाता है।
हैटनीकुंड बैराज का निर्माण यमुना नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए किया गया था। लेकिन जब जलराशि इस क्षमता से अधिक हो जाती है तो मजबूरन गेट खोलने पड़ते हैं। यही स्थिति इस बार बनी है।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर दिल्ली में लगातार बारिश हुई और ऊपर से यह पानी भी पहुँच गया, तो यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर जा सकता है।
ऐतिहासिक दिल्ली की बाढ़ और दिल्ली
दिल्ली में यमुना नदी की बाढ़ कोई नई बात नहीं है। 1978 में आई बाढ़ को सबसे भयावह माना जाता है जब राजधानी के बड़े हिस्से पानी में डूब गए थे। उसके बाद 2010 और 2013 में भी नदी ने अपना रौद्र रूप दिखाया। हाल ही में जुलाई 2023 में यमुना का जलस्तर 208 मीटर से ऊपर पहुँच गया था, जिसने 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। उस समय हजारों लोग विस्थापित हुए और शहर का यातायात ठप पड़ गया था।
इस बार भी खतरा उतना ही गंभीर माना जा रहा है क्योंकि पहाड़ों में बारिश का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा।
प्रशासन की जद्दोजहद और चुनौतियाँ
दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के प्रशासन ने संयुक्त रणनीति बनानी शुरू कर दी है। ग्रामीण इलाकों में नाव और ट्रैक्टरों की मदद से लोगों को निकाला जा रहा है। शहरों में पंप लगाकर पानी निकालने और ड्रेनेज को साफ रखने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन चुनौती यह है कि दिल्ली की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा यमुना किनारे के इलाकों में रहता है। यह लोग रोज़गार और मजबूरी के कारण वहीं रहते हैं, भले ही हर साल बाढ़ का खतरा मंडराता है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी समस्या इनका विस्थापन और पुनर्वास है।
सामाजिक संगठन
इस संकट की घड़ी में कई सामाजिक संगठन भी आगे आए हैं। गुरुद्वारों और मंदिर समितियों ने राहत शिविरों में भोजन और पानी उपलब्ध कराने की घोषणा की है। स्वयंसेवी संस्थाएँ दवाइयाँ और कंबल वितरित करने की तैयारी कर रही हैं। युवाओं के समूह नावों के जरिए फंसे हुए लोगों तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।
जनता से अपील
प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और बाढ़ नियंत्रण विभाग के निर्देशों का पालन करें। लोगों को सलाह दी गई है कि वे बिजली के उपकरणों से दूरी बनाए रखें, साफ पानी पिएं और बच्चों को नदी के किनारे न जाने दें।
सतर्कता
यमुना का यह उफान सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह हमारे विकास मॉडल पर सवाल भी खड़ा करता है। नदी किनारों पर अतिक्रमण, नालों का गंदा पानी और अवैध निर्माण ने बाढ़ की स्थिति को और बिगाड़ दिया है।
दैनिक प्रभातवाणी का मानना है कि सरकारों को केवल राहत और बचाव पर ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना होगा। नदी किनारों को सुरक्षित करना, स्थायी पुनर्वास नीति बनाना और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को समझना बेहद ज़रूरी है।
अभी जो संकट मंडरा रहा है, वह केवल आने वाले दिनों की एक झलक है। यदि हमने समय रहते चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले सालों में यमुना का हर उफान और बड़ी तबाही लेकर आएगा।