January 15, 2026

शिक्षा में श्रीमद्भगवद्गीता की एंट्री पर घमासान – विरोध में शिक्षक और विपक्ष

Screenshot_20250716-193402.Canva
Spread the love

शिक्षा में श्रीमद्भगवद्गीता की एंट्री पर घमासान – विरोध में शिक्षक और विपक्ष

देहरादून, 16 जुलाई 2025:
उत्तराखंड सरकार द्वारा विद्यालयों में श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ को शामिल करने के निर्णय के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। राज्य के विभिन्न शिक्षकों के संगठन और प्रमुख विपक्षी दलों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि शिक्षा को धर्म के दायरे में लाकर संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को ठेस पहुँचाई जा रही है।


क्या है सरकार का नया निर्णय?

उत्तराखंड सरकार ने घोषणा की है कि अब राज्य के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का नियमित रूप से वाचन कराया जाएगा। सरकार का तर्क है कि यह कदम छात्रों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन, तथा आत्मचिंतन की भावना को बढ़ावा देगा। शिक्षा विभाग ने इसे नैतिक शिक्षा का हिस्सा बताया है और कहा है कि यह प्रयास भारतीय परंपराओं से बच्चों को जोड़ने के लिए है।

शिक्षा मंत्री का कहना है कि गीता का ज्ञान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन, मानसिक संतुलन और चरित्र निर्माण का माध्यम है, जिसे हर छात्र को समझना चाहिए।


शिक्षक संगठनों ने जताई आपत्ति

राज्य के विभिन्न शिक्षक संघों ने सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि विद्यालयों को धार्मिक एजेंडा फैलाने का स्थान नहीं बनाया जाना चाहिए। उत्तराखंड शिक्षक महासंघ के अध्यक्ष श्री रमेश बिष्ट ने कहा:

“हमारी शिक्षा प्रणाली पहले ही पाठ्यक्रम के बोझ से दब रही है। ऐसे में धार्मिक ग्रंथों का वाचन अनिवार्य करना छात्रों और शिक्षकों दोनों के लिए एक अतिरिक्त मानसिक दबाव पैदा करेगा। गीता का अध्ययन यदि किसी छात्र की रुचि हो तो वह अलग बात है, लेकिन इसे पूरे राज्य में लागू करना धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना के विपरीत है।”


विपक्षी दलों का तीखा प्रहार

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह शिक्षा प्रणाली को धार्मिक रंग देने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा:

“राज्य सरकार शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के बजाय धार्मिक विषयों को बढ़ावा देने में लगी है। श्रीमद्भगवद्गीता का सम्मान हर कोई करता है, लेकिन इसे विद्यालयों में लागू करने से पहले सभी धर्मों और समुदायों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार वास्तव में छात्रों के नैतिक विकास को लेकर चिंतित है, तो उसे पहले विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएँ, गुणवत्तापूर्ण शिक्षक और समग्र पाठ्यक्रम सुनिश्चित करना चाहिए।


सरकार ने दी सफाई

विवाद बढ़ने पर राज्य के शिक्षा मंत्री ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि गीता का वाचन अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक और स्वैच्छिक होगा। किसी भी छात्र या अभिभावक पर इसे स्वीकारने का दबाव नहीं डाला जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को विद्यार्थियों में विकसित करना है।

शिक्षा मंत्री ने आगे जोड़ा:

“श्रीमद्भगवद्गीता को केवल धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें दिए गए उपदेश – जैसे कि कर्म पर विश्वास, आत्मबल, संयम और दायित्व – जीवन के हर क्षेत्र में मार्गदर्शन करते हैं।”


शिक्षा विशेषज्ञों की राय

कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि अगर गीता को एक साहित्यिक, दार्शनिक और नैतिक दृष्टिकोण से पढ़ाया जाए तो यह बच्चों के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन धार्मिक रूप में इसे लागू करना संविधान और विविधता की भावना को नुकसान पहुंचा सकता है। देहरादून विश्वविद्यालय के प्रो. अशोक शर्मा कहते हैं:

“भारत जैसे बहुधर्मी राष्ट्र में किसी एक धर्म के ग्रंथ को विद्यालयी शिक्षा में अनिवार्य करना संवेदनशील मामला है। गीता के साथ-साथ यदि बाइबल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब जैसे अन्य ग्रंथों के नैतिक पक्ष भी सिखाए जाएं तो यह कदम समावेशी माना जा सकता है।”


आम जनता की मिश्रित प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना की दिशा में स्वागतयोग्य कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे शिक्षा का धार्मिककरण करार दे रहे हैं।

  • साक्षी नेगी (अभिभावक): “मेरे बच्चे को नैतिक बातें सीखनी चाहिए, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह सिर्फ गीता से ही सीखे।”

  • राजीव रावत (पूर्व छात्र): “अगर हमें अपने ग्रंथों से जुड़ने का अवसर स्कूलों में मिलता तो हम जीवन में पहले ही दिशा पकड़ लेते।”

दैनिक प्रभातवाणी: संतुलन की जरूरत

उत्तराखंड सरकार का यह फैसला बहस का विषय बन गया है। एक ओर जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता को भारतीय दर्शन और नैतिक शिक्षा का आधार माना जाता है, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की दृष्टि से सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण बनाए रखना भी अनिवार्य है।

यदि गीता का वाचन स्वैच्छिक रखा जाए और छात्रों को यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि यह धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा का एक विकल्प है, तो शायद यह निर्णय कम विवादास्पद हो। साथ ही, यदि अन्य धर्मों के विचारों को भी स्थान दिया जाए तो यह कदम और अधिक समावेशी बन सकता है।