श्रावण मास में श्रद्धा का महासागर: हरिद्वार में उमड़ा 4.5 करोड़ कांवड़ियों का जनसैलाब

श्रावण मास में श्रद्धा का महासागर: हरिद्वार में उमड़ा 4.5 करोड़ कांवड़ियों का जनसैलाब
हरिद्वार, 25 जुलाई:
श्रावण मास की पवित्रता ने एक बार फिर भारतवर्ष में भक्ति की बयार बहा दी है, और इस बार कांवड़ यात्रा 2025 ने हरिद्वार में भक्ति, अनुशासन और जनप्रबंधन का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसे आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा। 11 जुलाई से 23 जुलाई तक, मात्र 13 दिनों में हरिद्वार शहर में लगभग 4.5 करोड़ श्रद्धालुओं ने प्रवेश किया — यह संख्या किसी भी धार्मिक आयोजन की दृष्टि से अभूतपूर्व मानी जा रही है।
हरिद्वार में बही आस्था की अविरल धारा
गंगा तट पर हरकी पौड़ी से लेकर कनखल, सप्तऋषि, भीमगोडा और दक्ष मंदिर तक, इस बार हरिद्वार में कदम रखने की जगह तक नहीं बची। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु न केवल पैदल, बल्कि ट्रकों, मोटरसाइकिलों, साइकिलों और कंधों पर झंडे उठाए हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचे। इन श्रद्धालुओं की आस्था यह सिद्ध करती है कि आध्यात्मिक चेतना आज भी भारत के सामाजिक ताने-बाने का सबसे मजबूत आधार है।
कांवड़ यात्रा: केवल एक परंपरा नहीं, एक सामाजिक आंदोलन
कांवड़ यात्रा अब सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही। यह सामाजिक सेवा, पारस्परिक सहयोग और मानवीय एकता का भी प्रतीक बन चुकी है। लाखों लोग न केवल जल लेने आते हैं, बल्कि सेवा शिविरों में भोजन, पानी, प्राथमिक चिकित्सा, छाया और शीतल जल की व्यवस्था में भी सहभागी बनते हैं। इस वर्ष भी उत्तर भारत के विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय संस्थाओं ने अपने-अपने शिविरों में श्रद्धालुओं के स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी।
प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती: व्यवस्था बनाए रखना
इतनी विशाल भीड़ को संभालना किसी युद्ध-स्तर की योजना से कम नहीं था। उत्तराखंड शासन ने इस बार पहले से योजना बनाकर तैयारियां की थीं। 30,000 से अधिक पुलिसकर्मी, 500 से अधिक CCTV कैमरे, 60 से अधिक ड्रोन, और AI आधारित निगरानी केंद्रों की स्थापना की गई। डीजीपी उत्तराखंड ने स्वयं सभी व्यवस्थाओं की निगरानी की और कहा कि यह यात्रा राज्य की प्रशासनिक क्षमता का परीक्षण है, जिसे सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
यातायात प्रबंधन बना मॉडल
दिल्ली-हरिद्वार मार्ग, रुड़की बाईपास, लक्सर रोड, मंगलौर, खानपुर, भगवानपुर और नजीबाबाद रोड जैसे व्यस्त मार्गों पर अलग-अलग लेन बनाए गए, जिनमें से कुछ विशेष रूप से बाइक कांवड़ियों के लिए आरक्षित थे। ट्रैफिक पुलिस की विशेष योजना के अंतर्गत रूट डायवर्जन और नियंत्रण केंद्रों की स्थापना हुई। हर 10 किलोमीटर पर आपातकालीन सहायता बूथ बनाए गए।
उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई, आस्था का अपमान बर्दाश्त नहीं
जहां करोड़ों श्रद्धालु अनुशासन और निष्ठा के साथ यात्रा कर रहे थे, वहीं कुछ स्थानों पर उपद्रवी तत्वों ने नियमों का उल्लंघन कर अशांति फैलाने की कोशिश की। लेकिन प्रशासन ने इस बार पूरी सख्ती दिखाई। अब तक 203 गिरफ्तारियाँ, 58 वाहनों की जब्ती और 80 चालान किए गए हैं। कई मामलों में विशेष अदालतों में त्वरित सुनवाई कर दोषियों को दंडित किया गया।
स्थानीय जनता बनी यात्रा की रीढ़
हरिद्वार और आस-पास के क्षेत्रों — जैसे रुड़की, लक्सर, भगवानपुर, बहादराबाद और मंगलौर — के नागरिकों ने इस यात्रा को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। कई परिवारों ने अपने घरों के बाहर जलपान, छाया और विश्राम की व्यवस्था की। दुकानदारों ने श्रद्धालुओं से उचित दाम लिए और धर्मशालाओं ने निःशुल्क आवास प्रदान किया।
धार्मिक माहौल के बीच आर्थिक गतिविधियाँ भी चरम पर
कांवड़ यात्रा से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी जबरदस्त बल मिला है। हरिद्वार के व्यापारी संगठनों के अनुसार, इस वर्ष यात्रा से लगभग ₹400–₹500 करोड़ का आर्थिक लाभ हुआ है। फूलों की बिक्री, पूजा सामग्री, वस्त्र, होटल, ट्रांसपोर्ट, टेंट, खाने-पीने की दुकानों और स्वास्थ्य सेवाओं में भारी मांग देखी गई। कुछ दुकानों ने तो अपने पिछले वर्ष का पूरा टर्नओवर केवल 10 दिनों में कमा लिया।
स्वास्थ्य व्यवस्था रही मुस्तैद
भीड़ और गर्मी के बीच स्वास्थ्य सेवाएँ एक बड़ी चुनौती होती हैं, लेकिन इस बार राज्य स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह तैयार रहा। कुल मिलाकर 200+ मेडिकल बूथ, 50 मोबाइल मेडिकल यूनिट, और 24 घंटे कार्यरत 108 एम्बुलेंस सेवा लगातार तैनात रही। अब तक 12,000 से अधिक श्रद्धालुओं को प्राथमिक उपचार और 400 से अधिक को रेफर किया गया। यात्रा मार्गों पर ORS, शीतल जल और प्राथमिक इलाज की समुचित व्यवस्था थी।
साफ-सफाई और पर्यावरण सुरक्षा बनी प्राथमिकता
हरिद्वार नगर निगम ने स्वच्छता के लिए विशेष “कांवड़ सफाई मिशन” चलाया। 3,200 टन से अधिक कचरा हटाया गया, विशेषकर प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों पर नियंत्रण के लिए चौकसी रखी गई। हर गली और घाट पर “प्लास्टिक मुक्त यात्रा” के पोस्टर लगाए गए, और स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को गंगा में स्नान के बाद साफ-सफाई के निर्देश दिए।
सीएम ने की व्यवस्था की सराहना
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने यात्रा के दौरान व्यवस्थाओं की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को बधाई दी और कहा,
“उत्तराखंड की पहचान धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संतुलन के रूप में उभर रही है। यह यात्रा केवल आस्था की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्रशासनिक कुशलता और मानवीय संवेदनशीलता की भी मिसाल है।”
महिलाओं की भागीदारी और सुरक्षा
इस बार की यात्रा में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही। अकेले या समूहों में यात्रा करने वाली हजारों महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। ‘महिला सहायता केंद्र’, अलग रूट, और महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती ने महिलाओं को सुरक्षित वातावरण में आस्था निभाने का अवसर दिया।
भविष्य की दृष्टि से मॉडल यात्रा
कांवड़ यात्रा 2025 अब भविष्य के लिए एक आदर्श मॉडल बन चुकी है। धार्मिक आयोजनों में तकनीकी दक्षता, प्रशासनिक समन्वय, स्थानीय सहभागिता और पर्यावरणीय चेतना — इन चारों स्तंभों पर यह यात्रा सफल रही। पूरे देश से आए श्रद्धालु, प्रशासन, स्वयंसेवक और नागरिकों के सहयोग ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
निष्कर्ष: गंगा के तट पर लिखी गई समर्पण, सेवा और संयम की गाथा
4.5 करोड़ लोगों की यह यात्रा केवल गंगा जल लेने और शिव अभिषेक तक सीमित नहीं थी। यह एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक चेतना का प्रतीक थी, जिसमें धर्म के साथ-साथ व्यवस्था, सुरक्षा, पर्यावरण और आर्थिक पहलुओं का भी समावेश रहा। हरिद्वार ने फिर से यह सिद्ध कर दिया कि जब आस्था संगठित होती है, तो उसका स्वरूप केवल धार्मिक नहीं, राष्ट्रीय एकता का दर्पण बन जाता है।