January 15, 2026

साधु-संतों का अद्वितीय योगदान : मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹25 लाख, आपदा पीड़ितों के लिए आशा की किरण

साधु-संतों का अद्वितीय योगदान : मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹25 लाख, आपदा पीड़ितों के लिए आशा की किरण

साधु-संतों का अद्वितीय योगदान : मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹25 लाख, आपदा पीड़ितों के लिए आशा की किरण

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दैनिक प्रभातवाणी (देहरादून, 2 सितंबर 2025)
उत्तराखंड की पहाड़ियाँ इस समय प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रही हैं। कहीं भूस्खलन से रास्ते बंद हो गए हैं, तो कहीं अतिवृष्टि से नदियाँ उफान पर हैं। सैकड़ों परिवार बेघर हो चुके हैं और हजारों लोग अब भी असुरक्षित हालात में जी रहे हैं। इन परिस्थितियों में साधु-संतों का आगे आकर मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹25 लाख का योगदान देना न केवल आर्थिक सहायता का प्रतीक है बल्कि मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी का उज्ज्वल उदाहरण भी है।

आपदा प्रभावित इलाकों में हालात बेहद कठिन हैं। गाँवों के मकान बह गए, कई जगहों पर खेत खलिहान पूरी तरह नष्ट हो गए और सड़कों का संपर्क टूटने से लोग अपने ही क्षेत्रों में फंसे रह गए। बिजली, पानी और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी बाधित हो गईं। इस आपदा से प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करने की है। ऐसे समय में साधु-संतों द्वारा दी गई आर्थिक सहायता उनके लिए राहत और उम्मीद का संदेश लेकर आई है।

साधु-संतों ने मुख्यमंत्री राहत कोष में सहयोग प्रदान करते हुए कहा कि उनका धर्म और परंपरा सदैव सेवा और त्याग पर आधारित रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है जब उसका उपयोग समाज और मानवता की सेवा में किया जाए। संत समाज ने यह भी कहा कि यह योगदान केवल एक शुरुआत है और यदि भविष्य में भी आवश्यकता हुई तो वे हर संभव सहयोग प्रदान करेंगे।

मुख्यमंत्री ने साधु-संतों के इस योगदान का स्वागत करते हुए इसे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि आपदा प्रभावितों की मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष सबसे महत्वपूर्ण साधन है और इसमें मिलने वाली हर राशि सीधे पीड़ितों तक पहुंचाई जाती है। सरकार ने यह आश्वासन दिया कि ₹25 लाख की यह राशि पारदर्शी प्रक्रिया के तहत राहत सामग्री, चिकित्सा सुविधाएँ, अस्थायी आश्रय और पुनर्वास कार्यों में उपयोग की जाएगी।

उत्तराखंड के पहाड़ी भूगोल को देखते हुए आपदाएँ यहाँ बार-बार अपना असर छोड़ती रही हैं। चाहे 2013 की केदारनाथ त्रासदी हो या हाल के वर्षों की अतिवृष्टि और भूस्खलन, हर बार इस राज्य ने भारी नुकसान देखा है। ऐसी परिस्थितियों में केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होते, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी से ही व्यापक स्तर पर राहत और पुनर्वास संभव हो पाता है। साधु-संतों का यह सहयोग इसी सामाजिक सहभागिता का प्रमाण है।

आपदा प्रभावित लोगों के लिए राहत कोष में मिलने वाला प्रत्येक दान, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, जीवन को संभालने में मददगार साबित होता है। साधु-संतों का यह योगदान इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इससे समाज के अन्य वर्ग भी प्रेरित होंगे। व्यापारी, उद्योगपति, सामाजिक संगठन और आम नागरिक भी इससे सीख लेकर आगे आ सकते हैं। जब सभी वर्ग मिलकर प्रयास करेंगे तभी प्रभावित परिवारों को वास्तविक सहायता मिल पाएगी।

देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साधु-संतों ने यह राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में सौंपी। इस मौके पर मौजूद लोगों ने इसे साधु-संतों की सेवा भावना और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक बताया। कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि यह योगदान राज्य की संस्कृति और परंपरा को दर्शाता है, जिसमें साधु-संत केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक ही नहीं बल्कि समाज के लिए संकटमोचक भी रहे हैं।

संत समाज का यह कदम दर्शाता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है बल्कि उसका असली रूप तब सामने आता है जब वह संकटग्रस्त समाज के साथ खड़ा होता है। साधु-संतों ने यह भी कहा कि “नर सेवा ही नारायण सेवा है” और यही भावना उन्हें इस राहत कार्य के लिए प्रेरित करती है। उनका मानना है कि यदि समाज का हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दे तो किसी भी आपदा से उबरना कठिन नहीं होगा।

उत्तराखंड सरकार ने साधु-संतों के इस योगदान की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल आर्थिक सहयोग ही नहीं है बल्कि उस नैतिक ताकत का प्रतीक भी है जो समाज को कठिन समय में आगे बढ़ने का हौसला देती है। मुख्यमंत्री ने जनता से भी अपील की कि वे अपनी क्षमता अनुसार मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान दें ताकि आपदा प्रभावित परिवारों तक समय पर मदद पहुँच सके।

साधु-संतों द्वारा दिया गया यह सहयोग आने वाले समय में समाज के अन्य वर्गों के लिए भी मार्गदर्शन का काम करेगा। यह केवल पैसों का योगदान नहीं बल्कि मानवता का वह संदेश है जो कहता है कि संकट की घड़ी में हमें एक-दूसरे के लिए सहारा बनना चाहिए। आपदा से जूझ रहे परिवारों को साधु-संतों की यह सहायता न केवल आर्थिक रूप से बल्कि भावनात्मक रूप से भी संबल प्रदान करेगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत केवल मंदिरों और आश्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि जब समाज पर संकट आता है तो वही आध्यात्मिक शक्ति राहत और पुनर्वास कार्यों में भी बदल जाती है। साधु-संतों का यह योगदान निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाएगा कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है और सेवा ही जीवन का सबसे पवित्र कार्य।