January 13, 2026

उत्तराखंड: एंटी-कन्वर्शन कानून के तहत पास्टर को पहली बार मिली राहत

उत्तराखंड: एंटी-कन्वर्शन कानून के तहत पास्टर को पहली बार मिली राहत
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देहरादून , 3 अक्टूबर 2025/दैनिक प्रभातवाणी 

देहरादून। उत्तराखंड में लागू धार्मिक-स्वतंत्रता कानून (एंटी-कन्वर्शन कानून) के तहत यह पहला मामला है जिसमें अदालत ने एक पास्टर को बरी किया है। यह फैसला राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस निर्णय को लेकर न्यायपालिका, समाज और सरकार के बीच चर्चा शुरू हो गई है, क्योंकि यह राज्य के धार्मिक और सामाजिक ढांचे पर भी असर डाल सकता है।


मामला: पृष्ठभूमि

उत्तराखंड में कुछ समय पहले एक पास्टर पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने स्थानीय लोगों को अपने धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास किया। शिकायत दर्ज होने के बाद प्रशासन ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। इस मामले ने राज्य में काफी चर्चा पैदा की, क्योंकि यह एंटी-कन्वर्शन कानून लागू होने के बाद पहला बड़ा मामला था।

कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इस मामले में अपनी राय रखी। कुछ समुदायों ने आरोप लगाया कि पास्टर ने उनके धार्मिक विश्वासों को प्रभावित करने का प्रयास किया, जबकि मानवाधिकार संगठन और धार्मिक स्वतंत्रता समर्थक समूहों ने कहा कि कानून का गलत प्रयोग हो रहा है।


अदालत का फैसला

उत्तराखंड की अदालत ने सभी साक्ष्यों और दलीलों की गहन समीक्षा के बाद पास्टर को बरी कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोप पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं हुए और आरोपी ने किसी भी व्यक्ति को जबरदस्ती या धोखाधड़ी के जरिए धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य नहीं किया।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता भारतीय संविधान का मूलभूत अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और दूसरों को अपने धर्म में आमंत्रित करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि केवल उन मामलों में कानून के तहत कार्रवाई संभव है जहाँ किसी व्यक्ति को बल, धोखाधड़ी या लालच के जरिए धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय राज्य में कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।


कानूनी महत्व

यह फैसला कानूनी दृष्टिकोण से ऐतिहासिक है। उत्तराखंड में एंटी-कन्वर्शन कानून लागू होने के बाद यह पहला मामला है जिसमें आरोपी को निर्दोष पाया गया। अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए और कानून का उद्देश्य केवल जबरन धर्मांतरण रोकना होना चाहिए।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से यह संदेश जाता है कि कानून का गलत प्रयोग नहीं किया जा सकता और निर्दोष व्यक्तियों को परेशान नहीं किया जाएगा। इससे राज्य में न्यायपालिका की भूमिका और पारदर्शिता भी उजागर होती है।


सामाजिक और धार्मिक प्रतिक्रिया

उत्तराखंड के नागरिकों और धार्मिक संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि अदालत ने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की और किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित किया।

एक स्थानीय नागरिक ने कहा – “यह फैसला हमारे लिए बहुत मायने रखता है। इससे भरोसा मिलता है कि कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होगा और हर व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी।”

धार्मिक स्वतंत्रता समर्थक संगठन इसे एक सकारात्मक संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि अब कानून का उद्देश्य केवल धर्मांतरण रोकना होना चाहिए, न कि निर्दोष नागरिकों को डराना या परेशान करना।


सरकार की प्रतिक्रिया

उत्तराखंड सरकार ने अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए कहा कि राज्य का उद्देश्य केवल सकारात्मक निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। सरकार ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य धर्मांतरण को रोकना है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना है।

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में भी इस कानून का पालन न्यायसंगत और संवेदनशील तरीके से किया जाएगा, ताकि समाज में विश्वास और संतुलन बना रहे।


संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता का महत्व

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा सुरक्षित है। अनुच्छेद 25–28 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और अपने विश्वासों के अनुसार जीवन जीने का अधिकार प्रदान करते हैं। हालांकि राज्य में धर्मांतरण की शिकायतें बढ़ रही हैं, लेकिन न्यायपालिका के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि कानून का उद्देश्य संतुलन बनाए रखना है, न कि किसी व्यक्ति को डराना।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे फैसले न केवल न्यायिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि समाज में विश्वास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को भी मजबूत करते हैं।


भविष्य के लिए संकेत

इस मामले का असर भविष्य में अन्य विवादित मामलों पर भी पड़ेगा। यह फैसला यह संदेश देता है कि:

  1. कानून का उद्देश्य बलपूर्वक धर्मांतरण रोकना है।

  2. निर्दोष व्यक्तियों को परेशान नहीं किया जाएगा।

  3. न्यायपालिका धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के बीच संतुलन बनाए रखेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक साबित हो सकता है, जहाँ एंटी-कन्वर्शन कानूनों को लागू किया गया है।


दैनिक प्रभातवाणी

उत्तराखंड में पास्टर की बरी होने की घटना राज्य के लिए ऐतिहासिक है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संतुलन के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता है।

इस निर्णय से यह संदेश जाता है कि कानून का उद्देश्य डर और दमन नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। आगामी समय में यह मामला अन्य विवादित मामलों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है और राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मिसाल बनेगा।