उत्तराखंड के वन विभाग ने 161 पवित्र प्राकृतिक स्थलों का किया वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण

14 सितम्बर 2025। देहरादून। दैनिक प्रभातवाणी विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, क्योंकि यहां का हर पर्वत, घाटी, नदी और जंगल किसी न किसी आस्था से जुड़ा हुआ है। यहां सदियों से लोग प्रकृति को पूजते आए हैं और उसे देवत्व का स्वरूप मानते रहे हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड के वन विभाग ने राज्य में फैले 161 पवित्र प्राकृतिक स्थलों (Sacred Natural Sites – SNS) की पहचान और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया है। यह प्रयास न केवल आस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के लिहाज से भी ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
पवित्र प्राकृतिक स्थल: आस्था और प्रकृति का संगम
भारत की प्राचीन परंपरा में जंगलों, पहाड़ों, नदियों और झीलों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि उन्हें ईश्वर का निवास समझा गया। उत्तराखंड में भी यह परंपरा गहराई से जुड़ी हुई है। यहां कई जंगलों को “देव वन” या “देवता का जंगल” कहा जाता है। ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, इन जंगलों से लकड़ी काटना या किसी तरह की क्षति पहुँचाना धार्मिक अपराध माना जाता है। इसी प्रकार, कई झीलें और चरागाह आज भी तीर्थस्थलों की तरह पूजे जाते हैं।
वन विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, पहचाने गए 161 स्थलों में शामिल हैं:
83 पवित्र जंगल – जिनमें स्थानीय देवताओं और ग्राम देवताओं की पूजा होती है।
62 पवित्र उपवन – जो धार्मिक उत्सवों और लोक परंपराओं से जुड़े हुए हैं।
12 अल्पाइन चरागाह – जो ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थित हैं और स्थानीय समुदायों के पशुपालन तथा धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े हैं।
4 उच्च हिमालयी झीलें – जिनमें विश्वप्रसिद्ध हेमकुंड साहिब और पवित्र सतोपंथ ताल भी शामिल हैं।
वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण क्यों जरूरी था?
आज के दौर में जब विकास की दौड़ में प्राकृतिक संसाधन लगातार दबाव में हैं, ऐसे में आस्था से जुड़े प्राकृतिक स्थलों की सुरक्षा और भी जरूरी हो गई है। वन विभाग का कहना है कि यदि इन स्थलों का व्यवस्थित रूप से वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इनका महत्व समझाना मुश्किल हो जाएगा।
वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण से कई फायदे होंगे:
इन स्थलों की सटीक पहचान और लोकेशन दर्ज होगी।
इनके सांस्कृतिक महत्व को सुरक्षित किया जा सकेगा।
जैव विविधता संरक्षण की योजनाएँ तैयार होंगी।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जिम्मेदारी सुनिश्चित की जा सकेगी।
भविष्य में इन स्थलों को इको-टूरिज्म से जोड़ा जा सकेगा।
हेमकुंड साहिब और सतोपंथ ताल का विशेष महत्व
उत्तराखंड की चार झीलों में से सबसे प्रसिद्ध हैं हेमकुंड साहिब और सतोपंथ ताल।
हेमकुंड साहिब सिख धर्म का पवित्र तीर्थ है, जो समुद्र तल से 4,329 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं और सात झरनों से घिरी यह झील न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी दुर्लभ वनस्पतियों और हिमालयी जैव विविधता के लिए भी जानी जाती है।
सतोपंथ ताल बद्रीनाथ धाम से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। मान्यता है कि यह झील त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – को समर्पित है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, पांडव भी स्वर्गारोहण की यात्रा पर इसी झील से होकर गुजरे थे।
इन दोनों झीलों का संरक्षण धार्मिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से अत्यंत आवश्यक है।
ग्रामीण समुदाय और आस्था का जुड़ाव
इन 161 स्थलों में से अधिकांश ग्रामीण इलाकों से जुड़े हुए हैं। स्थानीय लोग इन स्थलों को देवताओं का निवास मानते हैं और वहां किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करते। यही कारण है कि सदियों से ये स्थल प्राकृतिक रूप से संरक्षित रहे। उदाहरण के लिए, कई गांवों में यह परंपरा है कि देवता के जंगल से केवल उतनी ही लकड़ी ली जा सकती है जितनी किसी धार्मिक अनुष्ठान या आपात स्थिति में जरूरी हो।
इस तरह की परंपराओं ने इन स्थलों को आज तक संरक्षित रखा। लेकिन बदलते दौर में आधुनिकरण और पर्यटन के बढ़ते दबाव के कारण अब इन स्थलों पर खतरा मंडराने लगा है।
पर्यटन और विकास से उत्पन्न खतरे
उत्तराखंड में पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है। हर साल लाखों की संख्या में यात्री और पर्यटक राज्य का रुख करते हैं। इससे एक ओर जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है, वहीं दूसरी ओर पवित्र प्राकृतिक स्थलों पर दबाव भी बढ़ जाता है।
मुख्य खतरे इस प्रकार हैं:
प्लास्टिक और कचरे का बढ़ना।
जंगलों में अनियंत्रित लकड़ी कटाई।
चरागाहों पर अत्यधिक दबाव।
झीलों और नदियों में प्रदूषण।
अनियंत्रित होटल और सड़क निर्माण।
वन विभाग के अधिकारी मानते हैं कि यदि समय रहते इन स्थलों की सुरक्षा नहीं की गई तो आने वाले समय में ये अपनी मौलिकता खो सकते हैं।
संरक्षण के लिए नई पहल
वन विभाग अब इन स्थलों को स्थानीय ग्राम सभाओं, धार्मिक संगठनों और पर्यावरणविदों के साथ मिलकर संरक्षित करने की योजना बना रहा है। इसके तहत:
प्रत्येक स्थल की मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्डिंग की जाएगी।
स्थानीय युवाओं को इको-गार्डियन बनाया जाएगा।
धार्मिक यात्राओं के दौरान सस्टेनेबल टूरिज्म गाइडलाइन लागू होंगी।
प्रदूषण रोकने के लिए कड़े नियम और दंड तय किए जाएंगे।
अंतरराष्ट्रीय महत्व
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के पवित्र प्राकृतिक स्थल न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की धरोहर हैं। इन स्थलों का महत्व यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नजर में भी बढ़ रहा है। अगर इनका संरक्षण सही ढंग से किया गया तो इन्हें विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित करने की संभावना भी बन सकती है।
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड के वन विभाग द्वारा 161 पवित्र प्राकृतिक स्थलों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण एक ऐतिहासिक कदम है। यह पहल न केवल आस्था और परंपरा की रक्षा करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और संस्कृति का संतुलन बनाए रखने का भी काम करेगी।
यह सच है कि विकास और पर्यटन जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम अपनी प्राकृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को बचाकर रखें। अगर आज हम इन स्थलों को सुरक्षित कर पाए, तो कल की पीढ़ियाँ भी उत्तराखंड की इस दिव्य पहचान पर गर्व कर सकेंगी।