उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षक आंदोलन: डायरेक्ट भर्ती नीति के खिलाफ आवाज बुलंद

देहरादून। 15 सितंबर 2025। दैनिक प्रभातवाणी
देहरादून। उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नया विवाद गहराता जा रहा है। प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षक अब आंदोलन की राह पर हैं। शिक्षक संघ ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित प्रधानाध्यापक और हेडमास्टर पदों पर डायरेक्ट भर्ती (Direct Recruitment) नीति का कड़ा विरोध करते हुए प्रतीकात्मक आंदोलन शुरू किया है। यह आंदोलन फिलहाल शांतिपूर्ण है, लेकिन शिक्षकों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में यह और उग्र रूप ले सकता है।
शिक्षकों की मुख्य आपत्ति
शिक्षक संघ का कहना है कि वर्षों से सरकारी स्कूलों में सेवा दे रहे अनुभवी अध्यापकों को आंतरिक प्रमोशन के माध्यम से प्रधानाध्यापक और हेडमास्टर बनने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन सरकार की नई नीति से यह अवसर उनसे छिन जाएगा।
शिक्षकों का तर्क है कि वरिष्ठता और अनुभव को नज़रअंदाज़ कर बाहरी उम्मीदवारों को लाने से स्कूलों का शैक्षिक माहौल प्रभावित होगा।
उनका यह भी कहना है कि सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा आधार स्थायित्व और प्रमोशन की गारंटी होता है, जिसे यह नीति कमजोर कर रही है।
जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शन
विरोध प्रदर्शन की शुरुआत धीरे-धीरे कई जिलों में फैल चुकी है।
देहरादून: राजधानी में शिक्षक संगठनों ने शिक्षा निदेशालय के बाहर शांतिपूर्ण धरना दिया और सरकार से तत्काल इस निर्णय को वापस लेने की मांग की।
हरिद्वार: यहां अध्यापकों ने सामूहिक रूप से काली पट्टी बांधकर कक्षाएं संचालित कीं और छात्रों को इस आंदोलन के पीछे की वजह समझाई।
बागेश्वर और अल्मोड़ा: पर्वतीय जिलों में भी अध्यापक धरने पर बैठे और नारेबाजी की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार नहीं मानी तो बड़े पैमाने पर आंदोलन किया जाएगा।
शिक्षकों की दलीलें
शिक्षक संघ का कहना है कि नई भर्ती प्रणाली न केवल अध्यापकों के अधिकारों का हनन है बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को भी नुकसान पहुंचाएगी।
अनुभव का अनादर: जिन अध्यापकों ने 20-25 साल की सेवा दी है, उन्हें नजरअंदाज कर कोई नया व्यक्ति सीधे प्रधानाध्यापक बनेगा, यह न्यायसंगत नहीं।
प्रेरणा में कमी: अगर प्रमोशन का रास्ता बंद हो गया तो अध्यापक निराश हो जाएंगे और शिक्षा के स्तर पर असर पड़ेगा।
संस्थागत स्थिरता: प्रमोशन पाने वाले शिक्षक अपने स्कूल और स्टाफ से पहले से जुड़े होते हैं, जिससे नेतृत्व आसान होता है। बाहरी नियुक्तियों से यह संतुलन बिगड़ जाएगा।
सरकार का पक्ष
हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान जारी नहीं किया है, लेकिन शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि नई भर्ती नीति इसलिए लाई जा रही है ताकि अधिक योग्य और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों को अवसर मिल सके।
सरकार का मानना है कि प्रमोशन की प्रक्रिया में कई बार औसत प्रदर्शन करने वाले भी उच्च पद पर पहुंच जाते हैं, जबकि डायरेक्ट भर्ती से प्रतियोगी परीक्षा पास करने वाले ज्यादा सक्षम उम्मीदवार चुने जाएंगे।
शिक्षा विभाग का तर्क यह भी है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में नई ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा आएगी।
संभावित टकराव की स्थिति
शिक्षकों का आंदोलन अभी प्रतीकात्मक है, लेकिन संघ के नेताओं ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे कक्षाओं का बहिष्कार और राज्यव्यापी हड़ताल करने से पीछे नहीं हटेंगे।
इसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ेगा।
परीक्षाओं और सत्र संचालन में बाधा आ सकती है।
ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों के सरकारी स्कूल, जहां पहले से ही संसाधनों की कमी है, और भी प्रभावित होंगे।
राजनीतिक दबाव
शिक्षकों की संख्या प्रदेश में हजारों में है और उनका सामाजिक प्रभाव भी गहरा है। ऐसे में किसी भी आंदोलन का राजनीतिक असर पड़ना तय है। विपक्षी दल इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे हैं।
विपक्ष का कहना है कि सरकार शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रयोग कर रही है।
वहीं सत्तारूढ़ दल के नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि नई नीति राज्य की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक कदम है।
शिक्षा व्यवस्था पर प्रभाव
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और शिक्षक संघ के बीच सहमति नहीं बनी तो इसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों को होगा।
कक्षाओं में पढ़ाई का माहौल बिगड़ेगा।
अध्यापकों का मनोबल गिरेगा।
सरकारी स्कूलों पर जनता का विश्वास और भी कमजोर होगा, जबकि पहले से ही अभिभावक प्राइवेट स्कूलों की ओर झुक रहे हैं।
भविष्य की राह
अब देखना यह होगा कि सरकार और शिक्षक संगठन किस तरह समाधान निकालते हैं।
यदि सरकार शिक्षक संघ के साथ संवाद करती है और कोई बीच का रास्ता निकालती है, तो टकराव से बचा जा सकता है।
लेकिन अगर दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन बड़े पैमाने पर फैल सकता है।
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षक आंदोलन केवल प्रमोशन बनाम डायरेक्ट भर्ती का मामला नहीं है, बल्कि यह सिस्टम पर भरोसे और अधिकारों की सुरक्षा से भी जुड़ा है। शिक्षक संघ का तर्क है कि वर्षों की सेवा और अनुभव को दरकिनार कर बाहरी लोगों को अवसर देना शिक्षा व्यवस्था के साथ अन्याय है। वहीं सरकार का कहना है कि गुणवत्ता सुधार और नई ऊर्जा के लिए यह जरूरी कदम है।
अभी आंदोलन प्रतीकात्मक स्तर पर है, लेकिन यह आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगा, यह पूरी तरह सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द दोनों पक्ष संवाद की मेज पर बैठें और कोई व्यावहारिक समाधान निकालें।