उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन की मार: आपदाओं का नया केंद्र बनता पहाड़ी राज्य

दैनिक प्रभातवाणी | विशेष पर्यावरण रिपोर्ट | 14 जुलाई 2025
उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन की मार: आपदाओं का नया केंद्र बनता पहाड़ी राज्य
देहरादून।
एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है कि उत्तराखंड अब देश के तेजी से उभरते जलवायु आपदा केंद्रों (Climate Disaster Epicenters) में से एक बन चुका है। दून यूनिवर्सिटी, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, और दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से किए गए शोध में स्पष्ट किया गया है कि 2010 के बाद से राज्य में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति में खतरनाक इज़ाफा हुआ है।
तेज़ी से बढ़ते जलवायु संकट के संकेत
शोधकर्ताओं ने 15 सालों के जलवायु आंकड़ों और आपदा रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया।
उनका निष्कर्ष है कि:
बादल फटने (Cloudburst) की घटनाओं में चार गुना वृद्धि देखी गई है।
अचानक आई बाढ़ें (Flash Floods) अब पहले से अधिक व्यापक इलाकों को प्रभावित कर रही हैं।
मौसमी अस्थिरता जैसे एक ही दिन में अत्यधिक वर्षा और लंबे समय तक सूखा अब आम हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं की आवृत्ति जलवायु परिवर्तन से सीधी तौर पर जुड़ी हुई है, और इसके कारण हिमालयी क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील हो गया है।
राज्य के कौन-कौन से जिले सबसे अधिक प्रभावित?
अध्ययन में राज्य के निम्न जिलों को “उच्च जोखिम” वाले क्षेत्र घोषित किया गया है:
| जिला | प्रमुख खतरे |
|---|---|
| रुद्रप्रयाग | भूस्खलन, बादल फटना |
| पिथौरागढ़ | हिमस्खलन, बाढ़ |
| उत्तरकाशी | अचानक बारिश, नदी उफान |
| चमोली | ग्लेशियर झील विस्फोट |
| टिहरी और पौड़ी | भारी वर्षा, सड़कें बंद |
जलवायु बदलाव की वजहें और मानव प्रभाव
वैज्ञानिकों ने बताया कि:
तेजी से हो रहे जंगलों की कटाई,
बेतरतीब निर्माण कार्य,
ग्लेशियरों के पिघलने की दर में वृद्धि,
और स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ — इन सभी कारणों ने उत्तराखंड को जलवायु संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
क्या कहती है रिसर्च टीम?
शोध टीम के प्रमुख सदस्य डॉ. नवीन कंडवाल (दून यूनिवर्सिटी) के अनुसार:
“उत्तराखंड अब केवल पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील राज्य नहीं, बल्कि ‘जलवायु असाधारण घटनाओं का केंद्र’ बनता जा रहा है। अगर जिला स्तर पर जल्द नीतिगत कदम नहीं उठाए गए तो नुकसान और बढ़ेगा।”
अनुशंसाएं: अब क्या करना होगा?
रिसर्च टीम ने राज्य सरकार को कई सुझाव दिए हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
जिला-स्तरीय जलवायु अनुकूलन नीति बनाना।
प्राकृतिक जलस्रोतों और ग्लेशियरों की निगरानी के लिए रियल-टाइम सिस्टम स्थापित करना।
स्थानीय निवासियों को आपदा प्रबंधन में प्रशिक्षित करना।
बिल्डिंग कोड में बदलाव – खासकर पहाड़ी इलाकों में निर्माण के लिए नए मानदंड लागू करना।
वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए पुनः वनीकरण अभियान को तेज़ी से बढ़ाना।
सरकार की प्रतिक्रिया
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) और राज्य सरकार ने रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कहा है कि वे शीघ्र ही “हाई रिस्क जिलों के लिए जलवायु लचीलापन नीति” पर कार्य योजना बनाएंगे।
राज्य के पर्यावरण मंत्री ने यह भी कहा कि अगले बजट सत्र में पर्यावरणीय संकट से निपटने हेतु विशेष प्रावधान किया जाएगा।
दैनिक प्रभात वाणी : प्रकृति चेतावनी दे चुकी है
उत्तराखंड में प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ आपदा का खतरा भी गहराता जा रहा है। यह रिपोर्ट न केवल सरकार बल्कि जनता के लिए भी चेतावनी है कि यदि समय रहते संतुलित विकास और पर्यावरण संरक्षण नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में हालात और बिगड़ सकते हैं।