उत्तराखंड में तबाही: धराली में मलबा, मौत और मूक चीखें

उत्तराखंड में तबाही: धराली में मलबा, मौत और मूक चीखें
उत्तराखंड में तबाही: धराली में मलबा, मौत और मूक चीखें
रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी विशेष संवाददाता | दिनांक: 7 अगस्त 2025
5 अगस्त 2025 की दोपहर उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में जो कुछ घटा, वह महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पहाड़ों में रहने वाले लोगों की वर्षों पुरानी चिंता और उपेक्षा का क्रूर परिणाम था। यह घटना न केवल उत्तराखंड के पर्यावरणीय संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है, बल्कि आपदा प्रबंधन की तैयारियों और प्रशासन की लापरवाहियों की पोल भी खोल देती है। इस रिपोर्ट में हम धराली की इस त्रासदी को लगभग 5000 शब्दों में विस्तार से समझेंगे – आपदा के कारण, क्षति, राहत कार्य, और इससे जुड़े सामाजिक व राजनीतिक पहलुओं को समेटते हुए।
प्रकृति की चेतावनी: धराली कैसे तबाह हुआ?
धराली गांव, जो कि गंगोत्री घाटी में समुद्र तल से करीब 8800 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, लंबे समय से ग्लेशियरों की छाया में टिका हुआ एक सुंदर लेकिन संवेदनशील क्षेत्र रहा है। 5 अगस्त को दोपहर लगभग 1:50 बजे, अचानक से आई एक तेज़ फ्लैश फ्लड ने गांव को पूरी तरह से तबाह कर दिया।
जहाँ पहले माना जा रहा था कि यह बादल फटने (Cloudburst) की घटना है, वहीं अब विशेषज्ञों और प्रशासन की संयुक्त रिपोर्ट से संकेत मिल रहे हैं कि यह घटना ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) थी। माना जा रहा है कि धराली के ऊपर स्थित एक अस्थायी हिम झील, लगातार बढ़ते तापमान और बर्फ के पिघलने के कारण अस्थिर हो गई थी। झील के फटते ही भारी मात्रा में बर्फ, मलबा और पानी गांव की ओर टूट पड़ा।
तबाही का मंजर: आंखों देखी ज़ुबानी
जैसे ही यह सैलाब गांव में पहुंचा, उसने रास्ते में आई हर चीज़ को अपने साथ बहा लिया। खेत, मकान, दुकानें, मंदिर, बिजली के खंभे, पेड़, गाड़ियां – कुछ भी नहीं बचा। लोग चीखते हुए भागे, लेकिन जलप्रलय इतना तेज था कि कई परिवारों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
स्थानीय निवासी ललित सिंह राणा बताते हैं –
“मैं अपने खेत में काम कर रहा था, अचानक ज़मीन से कंपन हुआ और फिर सामने से ऐसा लगा जैसे कोई पहाड़ टूटकर आ गया हो। मैंने भागने की कोशिश की, लेकिन मेरे तीन पड़ोसी उस पानी में बह गए, उनकी चीखें अब भी मेरे कानों में गूंजती हैं।”
मौत का आंकड़ा और लापता लोग
प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 5 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है जबकि 100 से अधिक लोग लापता हैं। हालांकि गांववालों का दावा है कि मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है क्योंकि कई शव अब भी मलबे में दबे हुए हैं।
राहत और बचाव कार्यों के दौरान लगभग 400 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है। इन लोगों को अस्थायी राहत शिविरों में पहुंचाया गया है जहां भोजन, दवाइयों और मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था की गई है।
बहादुरी और बचाव: सेना और एजेंसियों का प्रयास
आपदा की सूचना मिलते ही भारतीय सेना, ITBP, NDRF और SDRF की टीमों ने तत्परता से मोर्चा संभाला। MI‑17 और चिनूक हेलीकॉप्टरों की मदद से ऊपर फंसे लोगों को एयरलिफ्ट किया गया। SDRF की टीमों ने अस्थायी पुलों के सहारे बहते हुए मलबे से कई लोगों को बचाया।
राज्य सरकार ने आपदा स्थल पर मेडिकल टीमें, सैटेलाइट फोन और ड्रोन तैनात किए हैं ताकि लापता लोगों को खोजा जा सके। इसके अलावा, दूर-दराज़ के गांवों से संपर्क साधने के लिए अस्थायी सड़कों और हेलिपैड्स का निर्माण किया जा रहा है।
धराली की सामाजिक संरचना पर असर
धराली गांव की जनसंख्या लगभग 1200 के करीब थी। गांव में मुख्य रूप से बर्फ़ीले फलों की खेती, पर्यटकों के लिए होमस्टे, और छोटा-मोटा व्यवसाय जीवन यापन का साधन था। आपदा ने न केवल भौतिक संरचनाओं को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि गांव की सामाजिक संरचना को भी पूरी तरह तोड़ दिया है।
अब दर्जनों परिवारों के सदस्य लापता हैं, कई बच्चे अनाथ हो चुके हैं, महिलाएं विधवा हो गई हैं, और बुज़ुर्गों के सहारे छिन गए हैं। यह सिर्फ भौतिक नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक आघात भी है।
क्या थी आपदा के पीछे की असली वजहें?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल प्राकृतिक नहीं थी, बल्कि मानवजनित कारणों ने इस त्रासदी को और विकराल बना दिया।
- ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों का पिघलना: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में औसत तापमान पिछले 30 वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। इससे ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और झीलों का निर्माण हो रहा है।
- बेतरतीब निर्माण कार्य: चारधाम यात्रा, सड़क विस्तार और पर्यटन विकास के नाम पर पर्वतीय इलाकों में अनियंत्रित खुदाई और कंक्रीट निर्माण हुआ है। इससे जल निकासी की प्राकृतिक व्यवस्था बाधित हुई है।
- वन कटान और पर्यावरणीय लापरवाही: क्षेत्र में वन काटे गए हैं, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो गई है। परिणामस्वरूप मलबा, भारी बारिश में तेजी से खिसकता है।
- पूर्व चेतावनी प्रणाली का अभाव: धराली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में न तो राडार हैं, न सैटेलाइट निगरानी, न ही मौसम अलर्ट। अगर समय पर चेतावनी मिलती, तो शायद जानें बचाई जा सकती थीं।
पुनर्वास और राहत के वादे
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपदा स्थल का हवाई दौरा करते हुए पीड़ितों से मुलाकात की और कई घोषणाएं कीं:
- मृतकों के परिजनों को ₹5 लाख की राहत राशि
- घायलों को ₹1 लाख
- जिनके घर तबाह हुए उन्हें ₹2 लाख तक की मदद
- धराली के लिए विशेष पुनर्वास योजना का ऐलान
- एक स्थायी ग्लेशियर निगरानी केंद्र की स्थापना
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सवाल
इस आपदा को लेकर राजनीतिक हलकों में भी गर्माहट है। विपक्ष ने सरकार पर सवाल खड़े करते हुए पूछा है कि इतने संवेदनशील क्षेत्र में आपदा पूर्व चेतावनी क्यों नहीं थी? क्यों धराली जैसे गांव को हाई-रिस्क ज़ोन घोषित नहीं किया गया?
वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय का कहना है कि राज्य सरकार जलवायु परिवर्तन को लेकर पहले से ही सजग है और इस दिशा में व्यापक रणनीति पर काम हो रहा है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन
देशभर से राहत सामग्री, स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद और आर्थिक सहायता धराली पहुंच रही है। विदेशों में बसे उत्तराखंडी प्रवासियों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाए हैं। सोशल मीडिया पर #PrayForDharali ट्रेंड कर रहा है, और कई NGO ऑनलाइन डोनेशन के जरिए राहत कार्यों में जुटे हैं।
मीडिया की भूमिका
इस बार की आपदा में मीडिया ने न सिर्फ सूचना पहुंचाने का कार्य किया, बल्कि सरकार और प्रशासन को जवाबदेह भी बनाया। ‘दैनिक प्रभातवाणी’ ने धराली की जमीनी स्थिति को दिखाकर राहत कार्यों में तेजी लाने में मदद की।
भविष्य की दिशा: क्या सीखा इस त्रासदी से?
धराली की घटना एक चेतावनी है कि हमें अब भी समय रहते चेतना होगा:
- हिमालयी क्षेत्र में Early Warning Systems की स्थापना
- सभी ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और उनकी निगरानी
- बेतरतीब विकास पर रोक और पर्यावरणीय मंजूरी की सख्ती
- आपदा प्रबंधन के लिए स्थायी इकाइयों का निर्माण
- स्थानीय लोगों को जागरूक और प्रशिक्षित करना
निष्कर्ष: आशा की किरण
धराली उजड़ गया, लेकिन उसके लोगों की हिम्मत अब भी कायम है। वह फिर से अपने गांव को बसाना चाहते हैं, फिर से अपने खेतों में फसल उगाना चाहते हैं, और फिर से एक सुरक्षित जीवन जीना चाहते हैं।
सरकार, सेना, समाज और मीडिया की एकजुटता ने यह साबित किया है कि हम आपदा में भी साथ खड़े हो सकते हैं। लेकिन अब वक्त है सतर्कता का, नीतिगत बदलावों का और जिम्मेदार भविष्य निर्माण का।
धराली की यह त्रासदी सिर्फ एक खबर नहीं – यह एक आह्वान है, एक चेतावनी है, एक अवसर है – प्रकृति से दोस्ती करने का, और उसके नियमों के साथ जीने का।
रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी | उत्तरकाशी, उत्तराखंड से