January 13, 2026

उत्तराखंड में भारी बारिश और बादल फटने से तबाही: देहरादून सबसे प्रभावित

उत्तराखंड में भारी बारिश और बादल फटने से तबाही: देहरादून सबसे प्रभावित
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दैनिक प्रभातवाणी
देहरादून, 17 सितंबर 2025

उत्तराखंड राज्य के पहाड़ी इलाके एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ गए हैं। 16 और 17 सितंबर की रात हुई मूसलाधार बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने राज्य के कई जिलों में भयावह स्थिति पैदा कर दी है। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार अब तक 15 लोगों की मौत हुई है, जबकि 16 लोग लापता हैं।

देहरादून, नैनीताल और पीथौरागढ़ जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। भारी बारिश ने सड़कें, पुल, मकान और दुकानों को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया। नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुँच गया और छोटे नाले भी उफान में बहने लगे। प्रशासन ने राहत-बचाव कार्य तेज कर दिया है, लेकिन लगातार बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में पहुँचने की कठिनाई राहत प्रयासों को धीमा कर रही है।


देहरादून: तबाही का केंद्र

देहरादून जिले में सहस्त्रधारा, मालदेवता और प्रेमनगर क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। रात भर हुई मूसलाधार वर्षा ने नदियों और नालों को उफान में ला दिया। सहस्त्रधारा के पास कई होटल और रेस्टोरेंट मलबे में दब गए। रानीपोखरी और प्रेमनगर में नदी का पानी कई घरों में घुस गया।

स्थानीय निवासी मोहन सिंह ने बताया, “हमारी दुकान और घर पूरी तरह बह गए। हम सिर्फ बच्चों को लेकर भाग सके।” मालदेवता और प्रेमनगर में लोग स्कूल और पंचायत भवनों में शरण लिए हुए हैं।

सहस्त्रधारा क्षेत्र में सड़कें बह जाने के कारण राहत सामग्री और मेडिकल सहायता पहुँचाना कठिन हो गया है। स्थानीय प्रशासन ने अस्थायी पुल बनाए, लेकिन यह स्थिति अस्थायी राहत ही दे रही है।


नैनीताल और झीलों का खतरा

नैनीताल जिले में झीलों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुँच गया है। हल्द्वानी और भीमताल क्षेत्र में कई कॉलोनियाँ और घर पानी में डूब गए। झील के किनारे बसे छोटे व्यवसाय और होटल पूरी तरह प्रभावित हुए हैं।

स्थानीय लोग डर के मारे सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि झीलों के आसपास अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण के कारण यह क्षति अधिक हुई। कई स्थानों पर पानी ने सड़क और मकान दोनों को अपने तेज बहाव में बहा दिया।


पीथौरागढ़ और चमोली में भूस्खलन

पीथौरागढ़ जिले में पहाड़ दरकने और भूस्खलन की घटनाओं ने लोगों को दहशत में डाल दिया। धारचूला, मुनस्यारी और गंगोत्री मार्ग पर पहाड़ी दरकने और मलबे के कारण सड़कें बंद हैं। कई गाँव संपर्क से कट गए हैं।

चमोली में ग्लेशियर से बह रहे पानी ने नदियों के स्तर को बढ़ा दिया है। ऋषिगंगा और अलकनंदा नदी के किनारे बसे गाँवों में पानी भर गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों का पिघलना और अचानक भारी बारिश भूस्खलन की मुख्य वजह है।


मौत और लापता लोगों का आँकड़ा

राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, अब तक पंद्रह लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। सोलह लोग अभी भी लापता हैं। मृतकों में अधिकांश देहरादून और नैनीताल के निवासी हैं। कई शव मलबे और बहते पानी से निकाले गए।

लापता लोगों के परिजन राहत शिविरों में आश्रय लिए हुए हैं। प्रशासन और एनडीआरएफ की टीमों ने खोजबीन तेज कर दी है, लेकिन लगातार बारिश और कठिन भूगोल कार्य को चुनौती दे रहे हैं।


बुनियादी ढाँचे की व्यापक क्षति

भारी बारिश और बादल फटने की वजह से कई पुल टूट गए, सड़कें बह गईं और बिजली की आपूर्ति ठप हो गई। सहस्त्रधारा और मालदेवता में पर्यटक स्थलों को जोड़ने वाली सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं। सरकारी भवन, स्कूल और कई निजी दुकानों की दीवारें गिर गईं।

इससे आवागमन बाधित हो गया और राहत सामग्री पहुँचाना कठिन हो गया। गाँवों में खाने-पीने और दवाइयों की कमी होने लगी है।


मौसम विभाग और IMD अलर्ट

भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी जारी की थी। 17 सितंबर के लिए उत्तराखंड के अधिकांश पहाड़ी जिलों में ऑरेंज अलर्ट घोषित किया गया। विभाग ने साफ कहा कि भारी बारिश के कारण फ्लैश बाढ़, सतह से बहाव और भूस्खलन का खतरा है।

सितंबर के पहले 16 दिनों में राज्य में सामान्य से 22–24 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई। मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिन भी बारिश का सिलसिला जारी रह सकता है।


राहत और बचाव कार्य

राज्य सरकार ने तुरंत सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें तैनात की हैं। हेलीकॉप्टर की मदद से फँसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा रहा है। रामगढ़, सहस्त्रधारा और प्रेमनगर में अस्थायी राहत शिविर बनाए गए हैं।

इन शिविरों में प्रभावित लोगों को भोजन, पानी और दवाइयाँ दी जा रही हैं। बचावकर्मी और स्थानीय लोग दिन-रात काम कर रहे हैं। टूटी सड़कें और लगातार बारिश राहत कार्य में बाधा डाल रही हैं।


प्रशासन और सरकारी प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आपात बैठक बुलाकर हालात का जायजा लिया। मृतकों के परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा की गई। अधिकारियों को राहत कार्य तेज करने का निर्देश दिया गया।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है।


पर्यावरणीय और वैज्ञानिक विश्लेषण

विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों पर अनियंत्रित निर्माण और सड़क-सेतु निर्माण ने आपदा का जोखिम बढ़ा दिया है। पुराने जलमार्गों को रोककर मकान और सड़कें बनाई गई हैं। जब बारिश सामान्य से अधिक होती है तो पानी अपने पुराने रास्ते खोजता है और तबाही मचाता है।

सुरंग निर्माण और सड़क चौड़ीकरण ने पहाड़ों को अस्थिर किया है। इससे भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं।


सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

भारी बारिश और बाढ़ ने स्थानीय जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। कई गाँव संपर्क से कट गए हैं। स्कूल, कॉलेज और स्थानीय बाजार बंद हैं। कृषि और पर्यटन उद्योग पर भी बुरा असर पड़ा है।

स्थानीय व्यापारी और होटल मालिक भारी आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं। मवेशियों और फसल को नुकसान हुआ है। कई परिवारों की रोज़मर्रा की कमाई प्रभावित हुई है।


दैनिक प्रभातवाणी

उत्तराखंड में यह प्राकृतिक आपदा राज्य के लिए गंभीर चुनौती है। प्रशासन, बचाव दल और स्थानीय लोग मिलकर राहत कार्य में जुटे हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास के उपाय न अपनाए गए तो भविष्य में ऐसे हादसे और बढ़ सकते हैं।

राज्य सरकार ने राहत कार्य तेज करने और प्रभावितों को मुआवज़ा देने की व्यवस्था की है। मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में भी सतर्क रहने की चेतावनी दी है।

उत्तराखंड की यह आपदा हमें यह याद दिलाती है कि पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों और विकास का संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है।