उत्तराखंड में हादसों का सिलसिला: रुद्रप्रयाग और बदरीनाथ में दुर्घटनाएँ, एक की मौत, कई घायल

देहरादून, 6 अक्टूबर 2025/ दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड के धार्मिक और राजनीतिक परिदृश्य में केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में सोने की प्लेट लगाने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। यह विवाद न केवल धार्मिक आस्था बल्कि राज्य की राजनीति में भी हलचल पैदा कर रहा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, जबकि राज्य सरकार ने मामले की जांच कर स्पष्टता देने का प्रयास किया है।
मामला क्या है?
केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह को स्वर्ण मंडित करने का कार्य एक निजी दानदाता के खर्च पर किया गया। दानदाता ने तांबे की प्लेटों पर सोने की परत चढ़ाकर उन्हें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया। राज्य सरकार ने इस कार्य के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर अनुमति प्रदान की थी।
इस प्रक्रिया में बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) की कोई भूमिका नहीं थी। समिति के पूर्व अध्यक्ष अजेंद्र अजय का कहना है कि उन्होंने स्वयं सरकार से मामले की जांच कराने का आग्रह किया था और सभी कार्य पूरी पारदर्शिता के साथ किए गए।
इस विवाद के सामने आने के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल शुरू हो गई और विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने बयान जारी किए।
कांग्रेस का आरोप
पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने गढ़वाल आयुक्त की जांच रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें इस जांच में शामिल नहीं किया गया। गोदियाल ने आरोप लगाया कि यह जांच केवल भाजपा सरकार को बचाने के लिए की गई है।
गोदियाल ने चेतावनी दी कि समय आने पर कांग्रेस इस मामले का पूरा खुलासा करेगी और इसमें संलिप्त लोगों को बेनकाब किया जाएगा। उनका कहना है कि मंदिर की आस्था और धार्मिक स्थल की पवित्रता को लेकर ऐसे फैसले राजनीति के लिए नहीं होने चाहिए।
कांग्रेस नेताओं का यह भी कहना है कि मंदिर के गर्भगृह में सोने की प्लेट लगाने की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है और जनता को इसके बारे में सही जानकारी नहीं दी गई।
भाजपा का बचाव
भाजपा और BKTC ने कांग्रेस के आरोपों का कड़ा जवाब दिया है। पूर्व अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने कहा कि यह कार्य केवल एक दानदाता की इच्छा और सरकारी अनुमति से किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि BKTC का इस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं था।
भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस के आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और राज्य में धार्मिक स्थलों के विकास को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
जांच रिपोर्ट की मुख्य बातें
गढ़वाल आयुक्त द्वारा की गई जांच रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि सोने की प्लेटें नियमों के अनुसार और उचित तरीके से लगाई गई थीं। जांच में सभी संबंधित बिल और दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे और किसी भी प्रकार की अनियमितता का प्रमाण नहीं मिला।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मंदिर में लगी सोने की प्लेटें धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए सही तरीके से रखी गई हैं।
धार्मिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
इस विवाद ने धार्मिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य दोनों में ही बहस को जन्म दिया है।
धार्मिक दृष्टि से, मंदिर में सोने की प्लेट लगाने को मंदिर की पवित्रता और भक्तों की आस्था के अनुरूप बताया गया है।
राजनीतिक दृष्टि से, यह मामला कांग्रेस और भाजपा के बीच टकराव का विषय बन गया है। भाजपा ने इसे पारदर्शिता का उदाहरण बताया, जबकि कांग्रेस इसे सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास मान रही है।
तीर्थ पुरोहितों और धार्मिक संगठनों ने भी इस मामले पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि धार्मिक स्थलों में ऐसे बदलाव केवल प्रशासन और समिति के मार्गदर्शन में होने चाहिए।
मीडिया और जन प्रतिक्रिया
इस मामले ने मीडिया में भी बड़ी चर्चा पैदा की है। समाचार चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर इस विषय को लेकर तीखी बहस चल रही है।
जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कुछ लोग इसे धार्मिक स्थल के विकास का संकेत मान रहे हैं, जबकि कई लोग इसे राजनीतिक हथकंडा और धार्मिक आस्था के साथ छेड़छाड़ के रूप में देख रहे हैं।
दैनिक प्रभातवाणी
केदारनाथ मंदिर में सोने की प्लेट लगाने का मामला केवल एक धार्मिक स्थल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल इसे अपने दृष्टिकोण से पेश कर रहे हैं।
सरकार और BKTC ने मामले में पारदर्शिता का दावा किया है।
गढ़वाल आयुक्त की जांच रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई अनियमितता नहीं हुई।
यह विवाद राज्य की राजनीति में और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व पारदर्शिता में महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। भविष्य में यह देखना होगा कि यह मामला किस दिशा में जाता है और राज्य की राजनीति तथा धार्मिक स्थलों के प्रबंधन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
समापन टिप्पणी
केदारनाथ मंदिर केवल उत्तराखंड का नहीं बल्कि पूरे देश का प्रमुख धार्मिक स्थल है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, प्रशासनिक निगरानी और धार्मिक आस्था का संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। राज्य सरकार, BKTC और सभी संबंधित पक्षों को इस संतुलन को ध्यान में रखते हुए कार्य करना होगा।
भविष्य में ऐसे विवादों से बचने के लिए सभी धार्मिक स्थल प्रशासनिक और कानूनी दिशा-निर्देशों का पालन करें, ताकि भक्तों की आस्था और धार्मिक स्थल की पवित्रता दोनों सुरक्षित रहें।