March 1, 2026

गढ़वाल में जनवरी की सूखी ठंड: इतिहास में पहली बार बिना बर्फबारी के गुज़रा महीना, जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में जनवरी महीने में बर्फबारी न होने से सूखी पहाड़ियां, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की पहाड़ियां, जहां जनवरी महीने में इस बार बर्फबारी नहीं हुई।

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उत्तराखंड (गढ़वाल) / दैनिक प्रभात वाणी
20 जनवरी, 2026

उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के ऊँचाई वाले इलाकों में इस वर्ष जनवरी महीना बिना बर्फबारी के गुजरना एक असामान्य और चिंताजनक घटना के रूप में देखा जा रहा है। चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और टिहरी जैसे पारंपरिक हिमपात वाले क्षेत्रों में जहां हर साल जनवरी में बर्फ की मोटी चादर बिछ जाया करती थी, वहां इस बार पहाड़ सूखे और भूरे दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों के अनुसार, गढ़वाल के इतिहास में यह पहली बार है जब जनवरी में बर्फबारी दर्ज नहीं की गई।

पर्यावरणविदों का मानना है कि यह बदलाव केवल एक मौसमी संयोग नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी, पश्चिमी विक्षोभ की कमजोर गतिविधि और मौसम चक्र में असंतुलन इसके प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस सर्दी में न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक बना रहा, जिससे बर्फ बनने की परिस्थितियां विकसित ही नहीं हो सकीं।

इसका सीधा असर गढ़वाल की जल व्यवस्था, कृषि और पर्यटन पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। बर्फबारी कम होने से प्राकृतिक जलस्रोतों और नदियों के रिचार्ज पर प्रभाव पड़ेगा, जिसका असर आने वाले महीनों में पेयजल संकट के रूप में सामने आ सकता है। सेब, आलू और अन्य ठंडे मौसम की फसलों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।

पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि बर्फ न पड़ने से शीतकालीन पर्यटन को भारी नुकसान हुआ है। औली, हर्षिल और चोपता जैसे पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की संख्या अपेक्षा से काफी कम रही, जिससे स्थानीय रोजगार पर भी असर पड़ा है।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इसी तरह मौसम का मिजाज बदलता रहा, तो भविष्य में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरा हो सकता है। उनका कहना है कि अब यह जरूरी हो गया है कि जलवायु परिवर्तन को केवल वैश्विक मुद्दा न मानकर स्थानीय स्तर पर भी इसके प्रभावों को समझा जाए और पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

गढ़वाल की बर्फीली चोटियों का जनवरी में सूना रह जाना न सिर्फ प्रकृति का बदला हुआ रूप दिखा रहा है, बल्कि यह आने वाले समय के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है, जिसे अनदेखा करना भारी पड़ सकता है।