March 1, 2026

दुनिया के केंद्रीय बैंक क्यों नहीं खरीद रहे अब सोना? वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेत बदलते दिखे

दुनिया के केंद्रीय बैंक क्यों नहीं खरीद रहे अब सोना? वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेत बदलते दिखे
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दुनिया के केंद्रीय बैंक क्यों नहीं खरीद रहे अब सोना? वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकेत बदलते दिखे

(विशेष रिपोर्ट | दैनिक प्रभातवाणी डिजिटल डेस्क | 3 अगस्त 2025)
बीते कुछ वर्षों से दुनिया भर में सोने की चमक बढ़ती जा रही थी — न केवल आम निवेशक के लिए, बल्कि देशों के केंद्रीय बैंकों के लिए भी। खासकर कोविड-19 महामारी के बाद के वर्षों में अमेरिका, चीन, रूस, भारत समेत दर्जनों देशों ने रिकॉर्ड मात्रा में सोना खरीदा। पर अब 2025 के मध्य में, हालात धीरे-धीरे बदलते नजर आ रहे हैं। वैश्विक बाजार के ताजे संकेत और रिपोर्ट यह दर्शा रही हैं कि अब केंद्रीय बैंक पहले जैसी तेजी से सोना नहीं खरीद रहे।

यह सवाल बेहद अहम हो गया है: आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या दुनिया के केंद्रीय बैंक अब सोने को सुरक्षित निवेश मानना बंद कर चुके हैं? या फिर इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है? इस रिपोर्ट में हम इन सभी पहलुओं की गहराई से पड़ताल करेंगे — मौजूदा आंकड़ों, भू-राजनीतिक संकेतों और अर्थव्यवस्था के बदलावों के आलोक में।

अचानक क्यों रुकी खरीदारी?

पिछले दो वर्षों (2022 और 2023) में केंद्रीय बैंकों ने ऐतिहासिक स्तर पर सोना खरीदा। विश्व स्वर्ण परिषद (World Gold Council) की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में केंद्रीय बैंकों द्वारा कुल 1,136 टन सोना खरीदा गया — जो 1967 के बाद की सबसे बड़ी मात्रा थी। 2023 में यह आँकड़ा 1,100 टन के आस-पास रहा।

लेकिन 2024 के दूसरे छमाही में यह ट्रेंड अचानक धीमा पड़ गया और 2025 की पहली तिमाही में कई बड़े केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीदारी पर पूर्ण विराम लगा दिया। उदाहरण के लिए, चीन की पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC), जिसने लगातार 18 महीनों तक हर महीने सोना खरीदा था, उसने मई 2024 से यह प्रक्रिया रोक दी। भारत के रिजर्व बैंक (RBI) ने भी अप्रैल 2024 के बाद से कोई नई खरीद नहीं की है।

इसके पीछे कौन-से प्रमुख कारण हैं?

1. सोने की कीमतें अब अस्थिर हो गई हैं

पिछले दो सालों में सोने की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया। जहां 2020 में सोने का भाव ₹40,000 प्रति 10 ग्राम के आस-पास था, वहीं 2024 में यह ₹72,000 के स्तर को भी पार कर गया। इतनी ऊंची कीमतों पर सोने में नई खरीदारी करना जोखिम भरा हो सकता है — खासकर तब, जब आर्थिक अस्थिरता बढ़ रही हो।

केंद्रीय बैंक आमतौर पर दीर्घकालिक दृष्टिकोण से सोना खरीदते हैं, न कि केवल शॉर्ट टर्म मुनाफे के लिए। लेकिन जब सोना अपने उच्चतम स्तर पर हो और कीमतें स्थिर न हों, तो ऐसी स्थिति में वे रुकने को प्राथमिकता देते हैं।

2. डॉलर और बॉन्ड यील्ड का आकर्षण बढ़ा

अमेरिका में ब्याज दरें अब स्थिर हो चुकी हैं और 2024 के अंत से ही 10-वर्षीय ट्रेज़री बॉन्ड की यील्ड में बढ़ोतरी देखी गई है। इससे डॉलर आधारित निवेश पहले से अधिक आकर्षक बन गए हैं।

अमेरिकी डॉलर को अब भी दुनिया की सबसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है और जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो रिटर्न की अपेक्षा से केंद्रीय बैंक डॉलर आधारित संपत्तियों की ओर रुख करते हैं — न कि सोने की।

3. भू-राजनीतिक स्थिरता का भ्रम

रूस-यूक्रेन युद्ध, ताइवान-चीन टकराव और पश्चिम एशिया के तनाव के बाद 2024-25 में वैश्विक मंच पर एक तरह की ‘झूठी स्थिरता’ नजर आ रही है। अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक तनाव कम हुआ है, और रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का असर सीमित हो गया है। इस भ्रम ने कुछ देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि “अब सोना स्टोर करना उतना जरूरी नहीं।”

4. विदेशी मुद्रा भंडार का संतुलन बनाना जरूरी

कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं जैसे तुर्की, ब्राज़ील, मिस्र और थाईलैंड अपने विदेशी मुद्रा भंडार में पहले ही उच्च मात्रा में सोना जोड़ चुकी हैं। अब वे डॉलर, यूरो या युआन में पुनः संतुलन बनाना चाहती हैं। इससे भी नई खरीदारी में ठहराव आया है।

5. डिजिटल करेंसी की तैयारी

कई देशों के केंद्रीय बैंक अब डिजिटल करेंसी की दिशा में तेज़ी से काम कर रहे हैं। जैसे भारत का डिजिटल रुपया, चीन का e-CNY और यूरो ज़ोन की डिजिटल यूरो योजनाएं। डिजिटल करेंसी के बढ़ते प्रभाव से यह मान लिया गया है कि भविष्य में स्वर्ण जैसे पारंपरिक भंडारों की उपयोगिता सीमित हो जाएगी।

क्या यह रुकावट स्थायी है?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि केंद्रीय बैंक अब कभी सोना नहीं खरीदेंगे। इतिहास में भी ऐसा कई बार हुआ है जब बैंकों ने एक निश्चित अवधि के लिए खरीदारी रोकी और फिर अगले वर्ष बड़े पैमाने पर निवेश किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘रोक’ अस्थायी है — एक रणनीतिक अंतराल। जैसे ही बाजार स्थिरता प्राप्त करेगा और वैश्विक संकटों की तस्वीर साफ होगी, सोने की ओर फिर से रुझान बढ़ सकता है।

कौन-कौन से देश अब भी खरीदारी कर रहे हैं?

हालांकि अधिकांश प्रमुख देशों ने फिलहाल खरीदारी रोकी है, लेकिन कुछ देशों ने अब भी सोने को प्राथमिकता दी है — खासकर वे देश जो पश्चिमी मुद्रा पर निर्भर नहीं रहना चाहते। इन देशों में शामिल हैं:

  • कज़ाखस्तान: इसने जून 2025 में लगभग 5 टन सोना जोड़ा।

  • सिंगापुर: उच्च मूल्य होने के बावजूद उसने अपनी स्वर्ण भंडार रणनीति जारी रखी।

  • इरान और टर्की: प्रतिबंधों के कारण ये देश डॉलर से दूर और स्वर्ण में अधिक निवेश कर रहे हैं।

  • सऊदी अरब: अपने रणनीतिक भंडार के हिस्से के रूप में सोने की खरीदारी जारी रखे हुए है।

भारत का क्या रुख है?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अप्रैल 2024 के बाद से सोने की नई खरीद नहीं की है। लेकिन RBI ने इस पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है। जानकारों के अनुसार, RBI अब अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बहु-मुद्रा में संतुलित रखना चाहता है।

भारत का कुल स्वर्ण भंडार लगभग 822 टन से अधिक है। वर्ष 2022-23 में RBI ने लगभग 30 टन सोना जोड़ा था, लेकिन 2024-25 में यह आंकड़ा शून्य बना हुआ है।

हालांकि भारत ने अप्रैल 2025 में घरेलू सोने के लिए इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रसीद (EGR) प्रणाली की शुरुआत की है, जो एक डिजिटल गोल्ड मार्केट को बढ़ावा दे रही है। इससे स्पष्ट है कि भारत भौतिक सोना जमा करने की बजाय अब इसके वैकल्पिक और अधिक आधुनिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है।

आम निवेशकों के लिए क्या संकेत?

जब दुनिया के केंद्रीय बैंक सोने से दूरी बनाने लगते हैं, तो आम निवेशकों को सतर्क हो जाना चाहिए। हालांकि भारत जैसे देशों में सोने का भाव सांस्कृतिक, पारिवारिक और निवेश के दृष्टिकोण से हमेशा मजबूत बना रहेगा, लेकिन यदि सोने की अंतरराष्ट्रीय मांग में गिरावट आती है, तो इसकी कीमतों पर असर पड़ना तय है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को अब सोने को “हेज” के बजाय “डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो” का हिस्सा मानना चाहिए। मतलब – न बहुत अधिक भरोसा करें, न पूरी तरह नज़रअंदाज़ करें।

दैनिक प्रभातवाणी : क्या सोने का युग खत्म हो रहा है?

इतिहास के पन्नों में देखें तो सोना सदियों से सत्ता, संरक्षण और स्थायित्व का प्रतीक रहा है। चाहे वह रोमन साम्राज्य हो, मौर्य वंश या ब्रिटिश शासन – हर युग में सोने की भूमिका केंद्रीय रही है। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करते हुए तस्वीर बदलती नजर आ रही है।

केंद्रीय बैंकों द्वारा खरीदारी में ठहराव इस बात का संकेत है कि अब वैश्विक वित्तीय ढांचा नई प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रहा है — जहां डिजिटल करेंसी, क्रिप्टो-समर्थन और बहु-मुद्रा भंडार ज्यादा अहमियत रखने लगे हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि सोना अप्रासंगिक हो गया है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट हो गया है कि अब उसे “एकमात्र सुरक्षित निवेश” नहीं माना जा रहा। सोने की चमक अब केवल उसके भौतिक रूप में नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक उपयोगिता और समय के साथ बदलती भूमिका में निहित है।


रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी डिजिटल डेस्क | 3 अगस्त 2025 | विशेष श्रृंखला: बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था
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