देहरादून में अवैध निर्माण और नदी की धारा मोड़ने का मामला, करोड़ों की क्षति और प्रशासन हरकत मे

दैनिक प्रभातवाणी
देहरादून, 19 सितंबर 2025
देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक गंभीर पर्यावरणीय और कानूनी उल्लंघन का मामला सामने आया है। यहां एक निजी रिज़ॉर्ट मालिक द्वारा अवैध निर्माण और नदी की धारा को मोड़ने की घटना ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका को भी गहरी चोट पहुँचाई है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार इस घटना से लगभग ₹6 करोड़ की क्षति हुई है।
घटना का खुलासा
सूत्रों के मुताबिक, यह मामला तब सामने आया जब ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन को शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि एक निजी रिज़ॉर्ट ने बिना अनुमति नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव किया और उसके किनारे अवैध निर्माण खड़ा कर दिया। जब प्रशासनिक टीम मौके पर पहुँची तो पाया गया कि नदी का बहाव वास्तव में कृत्रिम रूप से मोड़ा गया था और आसपास की ज़मीन पर दबाव बढ़ गया था।
अवैध निर्माण के दुष्परिणाम
नदी के बहाव में छेड़छाड़ का सीधा असर आसपास की बस्तियों और कृषि भूमि पर पड़ा। किसानों की कई एकड़ उपजाऊ ज़मीन बर्बाद हो गई और कुछ जगहों पर पानी का बहाव इतना तेज़ हो गया कि मिट्टी कटकर बह गई। स्थानीय निवासियों ने बताया कि बरसात के मौसम में यह बदलाव और भी खतरनाक हो सकता है, क्योंकि तेज़ बारिश की स्थिति में पानी का दबाव कई गुना बढ़ जाता है और तबाही का खतरा भी अधिक हो जाता है।
करोड़ों का नुकसान
प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की गई प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि इस अवैध कार्यवाही से लगभग ₹6 करोड़ का नुकसान हुआ है। इसमें क्षतिग्रस्त फसलें, टूटी हुई सड़कें, घरों की दीवारें और स्थानीय संसाधनों को पहुँची क्षति शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नदी की धारा में इस तरह का हस्तक्षेप जारी रहा तो भविष्य में नुकसान और भी ज़्यादा हो सकता है।
प्रशासन की सख्ती
देहरादून जिला प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तुरंत जांच के आदेश दिए हैं। संबंधित विभागों को निर्देशित किया गया है कि वे पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण तैयार करें और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई करें। प्रारंभिक स्तर पर यह भी माना जा रहा है कि रिज़ॉर्ट मालिक ने निर्माण कार्य के लिए न तो वन विभाग और न ही जल संसाधन विभाग से कोई अनुमति ली थी।
कानूनी प्रावधान और उल्लंघन
नदी की धारा को मोड़ना और उसके किनारे अवैध निर्माण करना सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और जल संरक्षण कानून का उल्लंघन है। भारत के पर्यावरण कानूनों के तहत इस प्रकार का कार्य न केवल दंडनीय अपराध है बल्कि इसके लिए भारी जुर्माना और जेल की सज़ा का भी प्रावधान है।
स्थानीय लोगों का आक्रोश
इस घटना के बाद स्थानीय निवासियों में गुस्सा और आक्रोश स्पष्ट रूप से देखने को मिला। ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से नदी पर निर्भर हैं, लेकिन रिज़ॉर्ट मालिक ने अपने निजी स्वार्थ के लिए उनके जीवन को संकट में डाल दिया। कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि स्थानीय स्तर पर कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा निर्माण संभव ही नहीं था।
पर्यावरण विशेषज्ञों की राय
पर्यावरणविदों ने इस घटना को बेहद खतरनाक बताते हुए कहा कि पहाड़ी राज्यों में नदी की धारा के साथ छेड़छाड़ करना आपदा को न्योता देने जैसा है। पहले भी उत्तराखंड में कई बार प्राकृतिक आपदाएँ देखी जा चुकी हैं, और उनकी एक बड़ी वजह मानवीय हस्तक्षेप ही माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में नदियाँ अपना प्राकृतिक मार्ग खुद तय करेंगी और तब नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी।
उत्तराखंड का संवेदनशील भूगोल
उत्तराखंड भौगोलिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील राज्य है। यहाँ पहाड़, नदियाँ और ग्लेशियर प्राकृतिक रूप से अस्थिर रहते हैं। ऐसे में ज़रा-सी मानवीय लापरवाही भी बड़े हादसे में बदल सकती है। यही वजह है कि राज्य सरकार समय-समय पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर कार्रवाई के आदेश देती रहती है। लेकिन कई बार निजी लाभ और पर्यटन के नाम पर इस तरह की घटनाएँ सामने आती हैं।
सरकार और न्यायपालिका की भूमिका
इस पूरे प्रकरण ने राज्य सरकार और न्यायपालिका दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। संभावना जताई जा रही है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो न केवल रिज़ॉर्ट मालिक पर जुर्माना लगाया जाएगा बल्कि अवैध निर्माण को ध्वस्त भी किया जाएगा। साथ ही, न्यायालय भी स्वत: संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई कर सकता है, जैसा कि पहले कई पर्यावरणीय मामलों में हो चुका है।
दैनिक प्रभातवाणी
देहरादून का यह मामला सिर्फ एक रिज़ॉर्ट मालिक की लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय कानूनों और प्रशासनिक ढांचे की गंभीर चुनौती है। इससे साफ पता चलता है कि जब तक अवैध निर्माण और नदियों के साथ छेड़छाड़ पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे रुकने वाले नहीं हैं। स्थानीय लोगों की आजीविका, पर्यावरण का संतुलन और राज्य की प्राकृतिक धरोहर तभी सुरक्षित रह पाएगी जब प्रशासन और सरकार मिलकर इस प्रकार के अपराधों पर अंकुश लगाएंगे।