January 13, 2026

वन्यजीव हमले में मृतकों को अब 10 लाख का मुआवजा: मुख्यमंत्री धामी का बड़ा फैसला

वन्यजीव हमले में मृतकों को अब 10 लाख का मुआवजा: मुख्यमंत्री धामी का बड़ा फैसला
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देहरादून, 4 अक्टूबर 2025/दैनिक प्रभातवाणी 

देहरादून। उत्तराखंड में वन्यजीव-मानव संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में लोगों का जंगली जानवरों से आमना-सामना होना अब सामान्य बात हो गई है। कभी खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों पर जंगली सूअर हमला कर देते हैं, तो कभी गांव से गुजरते समय बाघ या तेंदुआ जानलेवा हो जाता है। कई बार तो गज-गजधर कहे जाने वाले हाथी भी अचानक ग्रामीणों पर टूट पड़ते हैं। इस संघर्ष में न जाने कितने परिवार अपनों को खो चुके हैं। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बड़ा निर्णय लेते हुए वन्यजीव हमलों में मृतकों के परिजनों को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि 6 लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी है।

यह घोषणा राज्य के हजारों परिवारों के लिए राहत की खबर लेकर आई है। अब तक कई बार ग्रामीण संगठनों और स्थानीय लोगों ने आवाज उठाई थी कि वर्तमान मुआवजा राशि पीड़ित परिवार की भरपाई के लिए नाकाफी है। मुख्यमंत्री धामी ने इस चिंता को गंभीरता से लेते हुए मुआवजे में बढ़ोतरी का ऐलान किया है।

बढ़ते वन्यजीव हमले: एक गंभीर चुनौती

उत्तराखंड का भौगोलिक स्वरूप वन्यजीवों के लिए हमेशा से अनुकूल रहा है। यहां के जंगल बाघ, तेंदुआ, हाथी, भालू और अन्य जंगली जानवरों का घर हैं। राज्य के जंगलों से सटे सैकड़ों गांव ऐसे हैं जहाँ ग्रामीण और वन्यजीव आमने-सामने रहते हैं। खेतों में फसलों को नुकसान पहुँचाने से लेकर इंसानों पर हमले तक, यह समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है।

वन विभाग की रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक दशक में उत्तराखंड में सैकड़ों लोगों की मौत वन्यजीव हमलों में हो चुकी है। इनमें से सबसे अधिक मामले हाथियों, तेंदुओं और जंगली सूअरों से जुड़े पाए गए हैं। खासतौर पर हरिद्वार, उधमसिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल और चंपावत जैसे जिलों में इस तरह की घटनाएँ आम हो चुकी हैं।

अब तक 6 लाख रुपये मिलती थी राहत

अब तक उत्तराखंड सरकार वन्यजीव हमले में मृतक व्यक्ति के परिजनों को 6 लाख रुपये का मुआवजा देती थी। लेकिन महंगाई और परिवार की जरूरतों को देखते हुए यह राशि अपर्याप्त मानी जा रही थी। कई बार ग्रामीण संगठनों ने मुआवजे को कम से कम 10 लाख करने की मांग की थी।

मुख्यमंत्री धामी ने इन मांगों पर सहमति जताते हुए कहा कि राज्य सरकार पीड़ित परिवारों के साथ खड़ी है। उनका कहना है कि यह कदम केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकार अब वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए ठोस रणनीतियाँ भी बनाएगी।

मुख्यमंत्री धामी का बयान

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस संबंध में कहा, “हमारी सरकार राज्य के हर नागरिक के जीवन और सुरक्षा को सर्वोपरि मानती है। वन्यजीव हमले से किसी परिवार का सदस्य खोना बहुत ही दुखद है। हम यह नुकसान तो कभी नहीं भर सकते, लेकिन मुआवजे के रूप में दी जाने वाली राशि को बढ़ाकर हम पीड़ित परिवारों को कम से कम आर्थिक सहारा देने का प्रयास कर रहे हैं।”

उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि मुआवजा राशि पीड़ित परिवारों तक बिना किसी देरी के पहुँचे। इसके लिए प्रशासन और वन विभाग को प्रक्रिया सरल और पारदर्शी बनाने को कहा गया है।

ग्रामीणों की प्रतिक्रिया

सरकार के इस फैसले का स्वागत ग्रामीणों और स्थानीय संगठनों ने किया है। हरिद्वार जिले के लक्सर ब्लॉक के एक ग्रामीण ने बताया कि, “अक्सर हमारे गाँव में हाथियों का झुंड घुस आता है। लोग जान जोखिम में डालकर फसलों की रक्षा करते हैं। कई बार हादसे हो चुके हैं। मुआवजे की राशि बढ़ाना जरूरी था। अब कम से कम परिवार को कुछ आर्थिक सहारा मिलेगा।”

नैनीताल जिले के एक किसान संगठन के प्रतिनिधि ने कहा कि यह फैसला सकारात्मक है, लेकिन सरकार को साथ ही वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर, बिजली के तारों से सुरक्षा और फेंसिंग जैसी व्यवस्थाएँ भी करनी होंगी। केवल मुआवजा बढ़ाना ही समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

वन्यजीव विशेषज्ञों की राय

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीव-मानव संघर्ष बढ़ने की सबसे बड़ी वजह जंगलों का सिकुड़ना और आबादी का विस्तार है। पहाड़ों से पलायन कर लोग मैदानी क्षेत्रों में बस रहे हैं, वहीं सड़कों, कॉलोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार ने जानवरों का प्राकृतिक रास्ता बाधित कर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाती, तो आने वाले वर्षों में संघर्ष और बढ़ सकता है। मुआवजा राशि बढ़ाना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन साथ ही वन्यजीव संरक्षण और मानवीय सुरक्षा दोनों पर संतुलन बैठाना भी जरूरी है।

अन्य राज्यों से तुलना

अन्य राज्यों में भी इस तरह के मुआवजे की व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी वन्यजीव हमलों के मामलों में मृतकों के परिजनों को 8 से 10 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है। उत्तराखंड ने भी अब इस श्रेणी में शामिल होकर ग्रामीणों को राहत पहुँचाने का प्रयास किया है।

स्थायी समाधान की ज़रूरत

विशेषज्ञ और ग्रामीण संगठनों का कहना है कि केवल मुआवजा राशि बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। वन्यजीव-मानव संघर्ष को कम करने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा।

  • वन्यजीवों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर विकसित करना।

  • खेतों और गाँवों के आसपास सौर ऊर्जा आधारित फेंसिंग करना।

  • रात के समय गश्त बढ़ाना।

  • ग्रामीणों को वन्यजीवों से बचाव के लिए प्रशिक्षित करना।

  • प्रभावित परिवारों को रोजगार और वैकल्पिक आजीविका से जोड़ना।

यदि ये कदम उठाए जाते हैं तो न केवल जानवरों की सुरक्षा होगी, बल्कि इंसानों की जान-माल भी सुरक्षित रहेगी।

आगे की राह

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में विकास और संरक्षण दोनों ही बड़ी चुनौतियाँ हैं। मुख्यमंत्री धामी के इस फैसले ने एक नई उम्मीद जगाई है। अब ग्रामीणों को भरोसा है कि सरकार केवल मुआवजा बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वन्यजीव-मानव संघर्ष को जड़ से खत्म करने के लिए ठोस योजनाएँ बनाएगी।


दैनिक प्रभातवाणी

वन्यजीव हमले में मृतकों के लिए मुआवजा 6 लाख से बढ़ाकर 10 लाख करना न केवल आर्थिक दृष्टि से राहत देने वाला कदम है, बल्कि यह सरकार की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। हालांकि यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए यह एक बड़ी मदद साबित होगी। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ हरियाली और वन्यजीव जीवन का हिस्सा हैं, वहाँ संतुलन बनाना समय की मांग है। यदि सरकार और समाज मिलकर काम करें तो वन्यजीवों और इंसानों के बीच यह संघर्ष कम किया जा सकता है।