
दैनिक प्रभातवाणी विशेष रिपोर्ट | इंटरनेशनल डेस्क | प्रकाशित – 25 जुलाई 2025
शिव मंदिरों पर बौद्ध प्रभाव: इतिहास की जटिल परतें
भारत, श्रीलंका, नेपाल, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देशों में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जो पहले शिव मंदिर थे लेकिन बाद में या तो बौद्ध विहारों में बदल दिए गए या बौद्ध प्रतीकों के साथ मिश्रित कर दिए गए।
भारत में भी शिव मंदिरों पर बौद्ध विवाद
उड़ीसा, बिहार और मध्यप्रदेश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जहां:
पहले शिव की पूजा होती थी,
बाद में उन्हें बौद्ध विहार घोषित किया गया,
और फिर स्थानीय स्तर पर पुनः शिवमंदिर के रूप में स्थापित करने के प्रयास हुए।
उदाहरण:
भीमबेटका (मध्यप्रदेश) में कुछ गुफाएँ पहले शिवमंदिर मानी जाती थीं लेकिन उन्हें बौद्ध शिलालेखों और नक्काशियों ने “मौन बौद्ध धर्मस्थल” बना दिया।
उड़ीसा का रत्नगिरि और ललितगिरि क्षेत्र, जहां शिवलिंग के ऊपर बौद्ध मूर्तियाँ स्थापित कर दी गई थीं।
सीमा की सरहदों पर तनातनी: कंबोडिया-थाईलैंड विवाद फिर चर्चा में
विश्व राजनीति में जब भी सीमाओं की बात होती है, तो केवल ज़मीन के टुकड़े नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, पहचान और आत्मसम्मान के प्रश्न सामने आते हैं। कुछ सीमाएं सिर्फ रेखाएं होती हैं, पर कुछ सीमाएं ऐसे संघर्षों की गवाह होती हैं जो दशकों नहीं, सदियों से चले आ रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो पड़ोसी देश — कंबोडिया और थाईलैंड — ऐसे ही एक विवाद में उलझे हुए हैं जो न सिर्फ ज़मीनी सीमाओं से जुड़ा है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्विक धरोहर और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से भी गहराई से जुड़ा है।
प्रेअह विहेयर मंदिर: विवाद की जड़
एक मंदिर जो इतिहास से वर्तमान तक लड़ाई का कारण बना
इस विवाद की सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रेअह विहेयर मंदिर (Preah Vihear Temple) से जुड़ी हुई है। यह मंदिर 9वीं सदी में बना एक प्राचीन हिंदू मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर डांगरेक पर्वत श्रृंखला पर स्थित है, जो कंबोडिया और थाईलैंड की सीमा को विभाजित करती है। यह वही स्थान है जहाँ दोनों देशों की ऐतिहासिक सीमाएं आपस में मिलती हैं — और जहां से विवाद की शुरुआत होती है।
मंदिर की भव्यता, स्थापत्य कला और धार्मिक महत्व तो है ही, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर भले ही कंबोडियाई क्षेत्र में है, लेकिन इसका मुख्य प्रवेश द्वार थाईलैंड की ओर खुलता है। यही बिंदु इस विवाद को लगातार पुनर्जीवित करता है।
1904–1962: जब इतिहास ने विवाद की नींव रखी
कंबोडिया और थाईलैंड के बीच यह सीमा फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के समय तय की गई थी। 1904 और 1907 में फ्रांस और सियाम (थाईलैंड का पुराना नाम) के बीच हुई संधियों के तहत इस क्षेत्र को विभाजित किया गया था। फ्रांसीसी मानचित्रकारों ने प्रेअह विहेयर मंदिर को कंबोडिया के हिस्से में दिखाया, जिसे थाईलैंड ने शुरू में मौन सहमति दी लेकिन बाद में विवादित करना शुरू किया।
1962 में यह मामला International Court of Justice (ICJ) तक पहुँचा। ICJ ने स्पष्ट रूप से यह फैसला सुनाया कि प्रेअह विहेयर मंदिर कंबोडिया की संप्रभुता में आता है और थाईलैंड को वहां से अपनी सेना हटानी होगी।
थाईलैंड ने शुरू में इस फैसले पर असहमति जताई, लेकिन अंततः वह मान गया। हालांकि, विवाद तब तक शांत नहीं हुआ — वह सिर्फ दब गया था।
2008–2011: जब फिर से गोलियां चलीं
UNESCO का निर्णय और बढ़ता तनाव
2008 में जब UNESCO ने प्रेअह विहेयर को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया, तो यह निर्णय थाईलैंड के लिए चौंकाने वाला था। थाई सरकार ने आपत्ति जताई कि यह क्षेत्र अब भी विवादित है और इसे यूनेस्को द्वारा एकतरफा मान्यता नहीं मिलनी चाहिए थी।
इसके बाद सीमा पर सैन्य तैनाती, बमबारी और गोलीबारी शुरू हो गई। कई गांव खाली कराए गए, हजारों लोग विस्थापित हुए और दर्जनों सैनिक दोनों पक्षों से मारे गए। 2011 में फिर से यह मामला ICJ पहुंचा। इस बार कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न केवल मंदिर, बल्कि उसके आसपास का क्षेत्र भी कंबोडिया का हिस्सा है।
केवल मंदिर नहीं, सीमाएं भी विवादित
कंबोडिया और थाईलैंड के बीच लगभग 800 किलोमीटर लंबी सीमा है। लेकिन इस पूरी सीमा में से कई हिस्सों का सीमांकन अब तक स्पष्ट नहीं हुआ है। फ्रांसीसी नक्शे और थाईलैंड के सैन्य रिकॉर्ड अक्सर एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, जिससे स्थानीय स्तर पर झड़पें और भ्रम की स्थिति बनी रहती है।
कई सीमावर्ती गांवों में लोगों को नहीं पता कि वे किस देश का हिस्सा हैं। उन्हें कभी कंबोडियाई पुलिस पकड़ती है, कभी थाई सैनिक धमकाते हैं। ऐसे में स्थानीय नागरिकों का जीवन असुरक्षा, अनिश्चितता और भय के साए में बीतता है।
धरोहर बनाम राष्ट्रवाद
यह विवाद केवल ज़मीन का नहीं है, यह संस्कृति और विरासत का भी है। थाईलैंड और कंबोडिया दोनों इस मंदिर को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं। कंबोडिया के लिए यह मंदिर उनकी खोमेर साम्राज्य की महानता का प्रतीक है, वहीं थाईलैंड इसे अपने ऐतिहासिक क्षेत्र के रूप में देखता है।
दोनों देशों में राष्ट्रवादी ताकतें इस विवाद को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़तीं। मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक भाषणों के ज़रिए इस मुद्दे को समय-समय पर फिर से जीवित किया जाता है।
ASEAN और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की भूमिका
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की संस्था ASEAN ने दोनों देशों के बीच संवाद कायम रखने और युद्ध जैसे हालात को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संयुक्त सैन्य निगरानी, सीमा क्षेत्र में नो-फायर जोन और शांति प्रस्तावों के माध्यम से ASEAN लगातार प्रयास कर रही है कि यह विवाद हथियारों के बजाय कूटनीति से सुलझे।
हालांकि ASEAN की सीमित शक्ति और सदस्य देशों की संप्रभुता के सम्मान की बाध्यता के चलते उसका प्रभाव सीमित रहता है।
भू-राजनीतिक प्रभाव और वैश्विक दृष्टिकोण
यह विवाद केवल स्थानीय सीमा तक सीमित नहीं है। इसमें चीन, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन जैसे देशों की भी रुचि रही है। चीन ने दोनों देशों में भारी निवेश किया है — थाईलैंड में इंफ्रास्ट्रक्चर और कंबोडिया में निर्माण व रक्षा सौदों में। वहीं अमेरिका ने ASEAN के ज़रिए शांतिपूर्ण समाधान की बात कही है।
यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस ट्रेंड को दर्शाती है जहाँ क्षेत्रीय विवादों में वैश्विक शक्तियाँ परोक्ष रूप से भाग लेती हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
सीमा विवाद का सबसे गहरा असर सीमावर्ती गांवों और उनके नागरिकों पर पड़ता है। झड़पों के चलते:
स्कूल बंद होते हैं,
चिकित्सा सुविधाएं बाधित होती हैं,
खेतों में काम नहीं हो पाता,
रोज़गार के अवसर सीमित हो जाते हैं।
इसके अलावा पर्यटन पर भी गहरा असर होता है। प्रेअह विहेयर मंदिर तक जाने वाले मार्ग कई बार बंद कर दिए जाते हैं, जिससे दोनों देशों के पर्यटन राजस्व पर असर पड़ता है।
नागरिकों की आवाज़: युद्ध नहीं, समझौता चाहिए
जब भी विवाद बढ़ता है, दोनों देशों के नागरिक — विशेष रूप से युवाओं और शांति समर्थकों — की आवाज़ एक जैसी होती है: “हमें युद्ध नहीं, शांति चाहिए। हमें जमीन नहीं, रिश्ते चाहिए।” सोशल मीडिया पर हैशटैग्स चलते हैं:
#PrayForPeace
#BorderOfFriendship
#KhmerThaiUnity
इन अभियानों में दोनों देशों के कलाकार, छात्र और पत्रकार मिलकर तनाव कम करने की पहल करते हैं।
2025 की स्थिति: तनाव तो है, लेकिन संवाद भी
हाल ही में 2025 में फिर से सीमा क्षेत्र में कुछ हलचल देखी गई है। दोनों देशों की सेना ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अपने बेस को मज़बूत किया है, लेकिन साथ ही संयुक्त सीमा समिति की बैठकें भी चल रही हैं।
दोनों सरकारों ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि वे विवाद को बातचीत से सुलझाने को प्रतिबद्ध हैं।
दैनिक प्रभातवाणी : विरासत, सीमाएं और समाधान
कंबोडिया और थाईलैंड का यह विवाद हमें यह सिखाता है कि सीमा केवल भौगोलिक नहीं होती — यह राजनीतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक होती है। जब विरासत राष्ट्रवाद से टकराती है, तो संवाद ही एकमात्र रास्ता बचता है।
भारत जैसे देशों के लिए भी यह एक सीख है कि कैसे पुराने नक्शों, सांस्कृतिक धरोहरों और संप्रभुता के बीच संतुलन बनाकर ही भविष्य की राह तय की जा सकती है।