सहमति से बने रिश्ते के बाद शादी का वादा टूटना रेप नहीं, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द किया मुकदमा

नैनीताल | 25 फरवरी 2026 | दैनिक प्रभातवाणी
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध बने हों, तो बाद में शादी से इनकार करना स्वतः दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता। न्यायालय ने फौज में कार्यरत एक जवान के खिलाफ दर्ज अपहरण और दुष्कर्म के मुकदमे को निरस्त करते हुए कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग असफल व्यक्तिगत रिश्तों के निपटारे या प्रतिशोध के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने की। यह मामला पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग थाना क्षेत्र से जुड़ा था, जहां वर्ष 2022 में एक युवती ने युवक पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और बाद में शादी से इनकार करने का आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था।
अदालत ने मामले से जुड़े दस्तावेजों, दोनों पक्षों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दोनों पक्ष वर्ष 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क में थे। न्यायालय ने पाया कि युवती स्वयं अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी और वह वयस्क थी, इसलिए अपहरण की धारा लागू होने के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं थे।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि शादी के वादे के आधार पर बने शारीरिक संबंध तभी दुष्कर्म माने जा सकते हैं, जब यह प्रमाणित हो कि आरोपी की मंशा शुरुआत से ही धोखा देने की थी। अदालत को इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने प्रारंभ से ही शादी न करने के इरादे से सहमति प्राप्त की थी। न्यायालय ने कहा कि असफल संबंध और आपराधिक धोखाधड़ी के बीच स्पष्ट अंतर समझना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट में भी जबरन संबंध या बल प्रयोग के कोई प्रमाण नहीं पाए गए। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं था जिससे प्रथम दृष्टया दुष्कर्म का अपराध सिद्ध हो सके। बचाव पक्ष ने इसे दो वयस्कों के बीच सहमतिजन्य संबंध बताया था, जिसे अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर स्वीकार किया।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि जहां आरोप आधारहीन प्रतीत होते हों, वहां किसी व्यक्ति को लंबे समय तक आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। अदालत ने धारा 482 के अंतर्गत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए मुकदमा रद्द कर दिया और कहा कि न्यायालय का दायित्व अनावश्यक उत्पीड़न को रोकना भी है।
यह फैसला सहमति आधारित संबंधों और आपराधिक कानून की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या माना जा रहा है, जिसे भविष्य के मामलों में संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।