सेंट्रल सरकार से आपदा राहत की मांग, उत्तराखंड ने भेजा ₹5,702 करोड़ का प्रस्ताव

देहरादून, 8 सितंबर 2025
देहरादून। हिमालयी राज्य उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज़ से हमेशा संवेदनशील माना जाता रहा है। इस साल अप्रैल से अगस्त 2025 के बीच हुई मूसलधार बारिश, बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन ने राज्य की जीवन रेखा को झकझोर कर रख दिया। गांव से लेकर शहर तक तबाही का मंजर देखने को मिला। सड़कें बह गईं, पुल ढह गए, खेतों में खड़ी फसलें नष्ट हो गईं और हजारों परिवार बेघर हो गए। इसी व्यापक क्षति को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने केंद्र सरकार से ₹5,702 करोड़ की विशेष आपदा राहत राशि की मांग की है।
राज्य सरकार का कहना है कि इस राशि का इस्तेमाल मुख्य रूप से क्षतिग्रस्त अवसंरचना के पुनर्निर्माण और भविष्य में आपदाओं से बचाव हेतु नई योजनाओं पर किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि यदि समय रहते आपदा प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं पर निवेश किया जाए, तो भविष्य में जनहानि और संपत्ति का नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मौतें, लापता लोग और तबाही का आंकड़ा
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) की रिपोर्ट के अनुसार, इन चार महीनों में हुई प्राकृतिक आपदाओं में 79 लोगों की मौत हो चुकी है, 115 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं और 90 लोग अब भी लापता हैं। आपदाओं से प्रभावित परिवारों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है। सबसे अधिक नुकसान पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग और टिहरी जिलों में हुआ है। इन इलाकों में गांव के गांव कटकर अलग-थलग पड़ गए, जिससे राहत और बचाव कार्यों में भारी कठिनाइयाँ आईं।
सड़क और पुल सबसे ज्यादा प्रभावित
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सड़क ही जीवन की मुख्य धुरी मानी जाती है। इसी पर व्यापार, पर्यटन और आम जनजीवन टिका हुआ है। लेकिन इस आपदा के दौरान राज्य के सैकड़ों किलोमीटर सड़क नेटवर्क बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह-जगह भूस्खलन से बड़े-बड़े बोल्डर गिरने के कारण यातायात ठप हो गया। कई जगह तो यात्रियों और स्थानीय लोगों को घंटों-घंटों फंसे रहना पड़ा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस आपदा में 50 से अधिक बड़े पुल और 200 से ज्यादा छोटे पुलिया ढह गए या क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनके टूटने से न केवल स्थानीय यातायात प्रभावित हुआ, बल्कि तीर्थयात्राओं पर भी असर पड़ा।
किसानों और ग्रामीण इलाकों की सबसे बड़ी मार
आपदा का सबसे गहरा असर किसानों पर पड़ा है। राज्य की हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ और मलबे में दब गई। धान, मक्का और सब्जियों की खड़ी फसल बर्बाद हो गई। जिन किसानों की जमीन नदी किनारे थी, उनका बड़ा हिस्सा बह गया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
कई इलाकों में पीने के पानी की पाइपलाइनें बह गईं और बिजली आपूर्ति के खंभे जमींदोज हो गए। गांवों में अंधेरा छा गया और लोग पेयजल संकट से जूझने लगे।
पर्यटन और धार्मिक यात्रा पर असर
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन और तीर्थयात्रा की बड़ी भूमिका है। लेकिन इस बार की आपदाओं ने चारधाम यात्रा और अन्य धार्मिक स्थलों तक पहुंचने वाले मार्गों को बुरी तरह प्रभावित किया। कई जगह यात्रियों को वापस लौटना पड़ा। होटल और गेस्टहाउस खाली हो गए और स्थानीय लोगों की आय पर गहरा असर पड़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपदाओं का यह दौर लगातार जारी रहा तो पर्यटन उद्योग पर दीर्घकालिक असर हो सकता है। यही वजह है कि सरकार ने केंद्र से राहत राशि मांगते हुए यह साफ किया है कि इसमें से एक बड़ा हिस्सा पर्यटन मार्गों और सुविधाओं के पुनर्निर्माण पर खर्च किया जाएगा।
पुनर्निर्माण और भविष्य की तैयारी
उत्तराखंड सरकार ने अपने प्रस्ताव में साफ किया है कि ₹5,702 करोड़ की राशि सिर्फ तत्कालीन पुनर्निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन रणनीति पर भी खर्च की जाएगी। इसमें अर्ली वार्निंग सिस्टम, नदी तटों पर सुरक्षात्मक दीवारें, भूस्खलन प्रभावित इलाकों में रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज सिस्टम और सुरक्षित पुनर्वास योजनाएं शामिल हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि यदि केंद्र सरकार यह पैकेज तुरंत स्वीकृत कर देती है तो राज्य न केवल मौजूदा आपदा से उबर पाएगा, बल्कि भविष्य में आने वाली चुनौतियों का भी मजबूती से सामना कर सकेगा।
राजनीतिक और सामाजिक दबाव
आपदा राहत को लेकर राज्य सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि राहत और बचाव कार्यों में पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई गई और कई गांव अब भी मदद का इंतजार कर रहे हैं। दूसरी ओर सामाजिक संगठनों और स्थानीय जनता की भी मांग है कि प्रभावित परिवारों को मुआवजे की राशि जल्द से जल्द दी जाए।
केंद्र से अपेक्षाएँ
केंद्र सरकार ने फिलहाल उत्तराखंड सरकार के प्रस्ताव पर विचार करने की बात कही है। वित्त और गृह मंत्रालय की संयुक्त टीम राज्य का दौरा कर नुकसान का आकलन करेगी। इसके बाद राहत पैकेज को अंतिम मंजूरी दी जाएगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह राशि समय पर मिलती है, तो राज्य की टूटी-बिखरी संरचना को फिर से खड़ा करने में मदद मिलेगी। अन्यथा पहाड़ के ये जख्म भरने में वर्षों लग सकते हैं।
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ उसे हमेशा आपदा की जद में रखती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार केवल राहत राशि से समस्या का हल निकल सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है, जब आपदा प्रबंधन को राज्य की विकास नीति का मुख्य हिस्सा बनाया जाए। उत्तराखंड सरकार द्वारा केंद्र से मांगी गई यह ₹5,702 करोड़ की राहत राशि सिर्फ पुनर्निर्माण का साधन नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा के लिए भी अहम निवेश साबित हो सकती है।