सोशल मीडिया का सितारा, पंचायत चुनाव में फीका क्यों पड़ा? — जब ‘वायरल’ चेहरे ज़मीन पर टिक न सके

दैनिक प्रभातवाणी
विशेष रिपोर्ट | 2 अगस्त 2025
सोशल मीडिया का सितारा, पंचायत चुनाव में फीका क्यों पड़ा? — जब ‘वायरल’ चेहरे ज़मीन पर टिक न सके
देहरादून।
उत्तराखंड के हालिया पंचायत चुनावों में एक नई और चौंकाने वाली प्रवृत्ति सामने आई है — सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स बटोरने वाले यूट्यूबर्स और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स जब चुनावी मैदान में उतरे, तो उन्हें आमजन ने नकार दिया। इन ‘वायरल’ चेहरों को न केवल हार का सामना करना पड़ा, बल्कि कुछ प्रत्याशियों को तो 100 वोट भी नसीब नहीं हुए। इससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि डिजिटल लोकप्रियता और जमीनी राजनीति दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं, जिनमें से एक कैमरे के आगे चमकती है, और दूसरी गांव की चौपालों और खेतों के रास्तों से निकलती है।
फॉलोअर्स लाखों, वोट सैकड़ों — चुनाव में सोशल सितारों का गिरता ग्राफ
पौड़ी, चंपावत, बागेश्वर, नैनीताल और टिहरी जैसे जिलों में पंचायत चुनाव के मैदान में उतरे कुछ यूट्यूबरों और फेसबुक रील क्रिएटर्स को करारी हार का सामना करना पड़ा। इनमें से कई ऐसे थे जिनके सोशल मीडिया पर 2 लाख से ज़्यादा फॉलोअर्स हैं। इनके पोस्ट्स पर हजारों लाइक और शेयर मिलते हैं, लेकिन गांव की वोटिंग मशीन में इनके नाम के सामने पड़े आंकड़े शर्मिंदगी का कारण बन गए।
टिहरी के एक ब्लॉक में चुनाव लड़ने वाले यूट्यूबर को मात्र 55 वोट मिले, जबकि उनका दावा था कि उन्होंने “सोशल मीडिया पर लोगों के दिल जीते हैं।” वहीं चंपावत जिले में एक रील-स्टार, जो फेसबुक पर हर महीने लाखों व्यूज बटोरता था, पंचायत चुनाव में अपनी ज़मानत तक नहीं बचा सका।
सोशल मीडिया बनाम ज़मीनी राजनीति — अंतर क्यों?
इस पराजय का बड़ा कारण यह है कि सोशल मीडिया की दुनिया ‘वर्चुअल’ यानी आभासी है, जबकि राजनीति ‘जमीनी’ यानी वास्तविक। कोई रील्स में गांव का हितैषी बनने की एक्टिंग कर सकता है, लेकिन ग्रामीण मतदाता सिर्फ अभिनय से प्रभावित नहीं होते।
गांव की जनता को सिर्फ वायरल क्लिप नहीं चाहिए, उन्हें बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, इलाज और अपने दुख-दर्द में खड़े होने वाला प्रतिनिधि चाहिए। वे देखना चाहते हैं कि उनका नेता उनके दुखों में साथ है या नहीं, कोई पर्व-त्योहार में शामिल होता है या नहीं, अस्पताल के बाहर खड़ा होता है या नहीं — और यही सब बातें किसी कैमरा फ्रेम में नहीं आतीं।
“वीडियो बनाते बनाते असलियत से दूर हो गए” – एक बुजुर्ग मतदाता की टिप्पणी
टिहरी के पास एक गांव में वोट डालने आए 72 वर्षीय खड़क सिंह ने कहा,
“हम जानते हैं कि ये लड़का फेसबुक पर वीडियो डालता है, नाचता है, गाता है, कभी गांव के मंदिर के बारे में बोलता है, कभी नदी-नालों पर। लेकिन चुनाव का मतलब मनोरंजन नहीं होता बेटा। गाँव का प्रधान जिम्मेदारी का काम है।”
ऐसी ही भावना उत्तरकाशी के भटवाड़ी ब्लॉक में भी देखने को मिली, जहां एक इंस्टाग्राम इनफ्लुएंसर को मात्र 89 वोट मिले, जबकि उनके फॉलोअर्स की संख्या 3 लाख से ऊपर थी।
चुनाव से पहले वायरल विडियोज़ — लेकिन ज़मीन पर कोई असर नहीं
पंचायत चुनाव से ठीक पहले इन सोशल मीडिया प्रत्याशियों ने अपनी रील्स और वीडियो से प्रचार करना शुरू किया था। कुछ ने “मेरा गांव, मेरी जिम्मेदारी” जैसे हैशटैग चलाए, तो कुछ ने वादों की झड़ी लगा दी।
एक यूट्यूबर ने तो गांव के नालों और शौचालयों की सफाई पर रील बनाकर खुद को “परिवर्तन का वाहक” बताया। लेकिन यह सब प्रदर्शन अधिक था, न कि समाधान। मतदाता समझते हैं कि एक रील या यूट्यूब वीडियो में कट-पेस्ट से तो चमक लाई जा सकती है, लेकिन गांव की समस्याएं ऐसे एडिट नहीं होतीं।
चुनाव के दौरान शराब और नकद वितरण की अफवाहें — लोकतंत्र पर धब्बा
कुछ क्षेत्रों से यह भी खबरें आईं कि चुनाव से एक रात पहले कुछ प्रत्याशियों ने शराब और नकद बांटने का प्रयास किया। हालांकि पुलिस और प्रशासन ने सतर्कता दिखाई और कुछ स्थानों पर धरपकड़ भी हुई, लेकिन अफवाहों का बाज़ार गर्म रहा।
इस मुद्दे पर राज्य निर्वाचन आयोग ने भी चिंता व्यक्त की और कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दूषित करने वाले किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
स्थानीयता और जनसंपर्क बना निर्णायक कारक
जो प्रत्याशी ग्रामीण क्षेत्र में सक्रिय रहे, जिन्होंने ग्राम सभाओं में लगातार भाग लिया, स्थानीय मसलों पर खुले संवाद किए — वही उम्मीदवार जनता का भरोसा जीत पाए।
एक तरफ सोशल मीडिया स्टार्स थे जो विडियो में किसानों के मुद्दों पर बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ वास्तविक किसान नेता थे जो पिछले 5 वर्षों से हर सीजन में गांव वालों के साथ खेतों में खड़े थे। जनता ने इन्हीं को चुना।
अल्मोड़ा के एक नव-निर्वाचित प्रधान, जिनके पास सोशल मीडिया अकाउंट तक नहीं है, ने कहा,
“हम मोबाइल पर कम और लोगों के साथ ज्यादा रहते हैं। शायद यही कारण रहा कि लोगों ने हमें चुना।”
युवा मतदाताओं ने भी दिखाई जागरूकता
अक्सर कहा जाता है कि युवा पीढ़ी सोशल मीडिया से बहुत प्रभावित होती है, लेकिन इस चुनाव में युवाओं ने साबित कर दिया कि वे केवल दिखावे की राजनीति नहीं चाहते।
टिहरी के एक इंटर कॉलेज के छात्र नेता ने बताया,
“हम भी इंस्टाग्राम और फेसबुक पर इन लोगों को देखते हैं, लेकिन जब गांव के स्कूल में ब्लैकबोर्ड टूटा होता है और ये लोग वीडियो बनाने बाहर होते हैं — तो हमें समझ आता है कि ये नेता नहीं हो सकते।”
क्या यह रुझान भविष्य के लिए एक सबक है?
उत्तराखंड के पंचायत चुनाव में जो परिणाम सामने आए हैं, वे सिर्फ स्थानीय स्तर की राजनीति तक सीमित नहीं हैं। यह एक बड़ा संकेत है उस ट्रेंड के लिए, जो आने वाले समय में देशभर की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
सोशल मीडिया एक शक्तिशाली माध्यम है, लेकिन यदि उसका उपयोग सिर्फ खुद को चमकाने और दिखावा करने के लिए हो, तो उसकी उम्र सीमित हो जाती है। जनता अब जागरूक है, और वह सिर्फ स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे नहीं, बल्कि उनके पीछे के काम देखती है।
राजनीति में प्रवेश का मतलब है सेवा, न कि सिर्फ शोहरत
गांव की राजनीति सबसे मूलभूत स्तर की राजनीति होती है, जहां सीधा संपर्क, विश्वास और सेवा ही मुख्य आधार होते हैं। यहां ‘बायो में लिखा लीडर’ नहीं चलता, यहां ‘सालों की सेवा’ चलती है।
डिजिटल दुनिया से राजनीति में आने वालों को यह समझना होगा कि यहां कैमरे का फ्रेम नहीं, विश्वास का दायरा काम करता है।
दैनिक प्रभातवाणी : पंचायत चुनाव ने दिया स्पष्ट संदेश
उत्तराखंड पंचायत चुनाव के नतीजों से यह स्पष्ट है कि
सोशल मीडिया लोकप्रियता और वोट बैंक के बीच सीधा संबंध नहीं है।
जनता अब अभिनय और असल सेवा में फर्क करने लगी है।
ग्राम राजनीति में परंपरागत जुड़ाव और जमीन से तालमेल अभी भी सर्वोच्च है।
सोशल मीडिया प्रभावी माध्यम हो सकता है, लेकिन वह भरोसे का विकल्प नहीं है।
और सबसे बड़ी बात — लोकतंत्र अब पहले से अधिक जागरूक है।
रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी संवाददाता, देहरादून
तिथि: 2 अगस्त 2025
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