Spread the loveहरियाणा-उत्तराखंड मिलकर करेंगे सरस्वती नदी पुनरुद्धार, टौंस नदी से जल लाने की तैयारीचंडीगढ़/हरिद्वार। प्राचीन Saraswati River के पुनरुद्धार को लेकर Haryana और Uttarakhand सरकार ने संयुक्त रूप से बड़ा कदम उठाया है। हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन धूमन सिंह किरमच ने बताया कि उत्तराखंड सरकार के सहयोग से सरस्वती नदी पुनर्जीवन परियोजना पर तेजी से कार्य किया जा रहा है। इस संबंध में उन्होंने मन्नू गौड़ से Haridwar में मुलाकात कर विस्तृत खाका तैयार किया है।धूमन सिंह किरमच ने कहा कि सरस्वती नदी का प्राचीन इतिहास उत्तराखंड से जुड़ा हुआ है और वैज्ञानिक संस्थाओं के अनुसार इसका उद्गम हिमालयी क्षेत्र से माना जाता है। Indian Space Research Organisation और Geological Survey of India के वैज्ञानिकों के अनुसार सरस्वती नदी का स्रोत Bandarpunch Glacier को माना जाता है, जहां से Ganga River और Yamuna River की तरह जलधाराएं निकलती हैं। इसी आधार पर अब सरस्वती नदी के पवित्र जल को हरियाणा तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है।उन्होंने बताया कि इस परियोजना के तहत हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने उत्तराखंड सरकार को पत्र भेजकर सहयोग मांगा था, जिस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। इसके बाद दोनों राज्यों ने संयुक्त रूप से इस परियोजना को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।परियोजना के तहत उत्तराखंड की प्रमुख Tons River तथा इसकी सहायक नदियों के जल को हरियाणा तक लाने की योजना बनाई गई है। धूमन सिंह किरमच के अनुसार टौंस नदी गंगा के बाद बारहमासी जल प्रवाह वाली प्रमुख नदी मानी जाती है और इसे वैदिक सरस्वती का स्वरूप भी माना जाता है। यह नदी Paonta Sahib के पास यमुना में मिलती है और आगे हरियाणा की दिशा में प्रवाह करती है।उन्होंने कहा कि सरस्वती पुनरुद्धार परियोजना के तहत टौंस नदी के अलावा अन्य छोटी सहायक नदियों और जल स्रोतों को भी जोड़ने की योजना बनाई जा रही है, ताकि सरस्वती नदी के ऐतिहासिक स्वरूप को पुनर्जीवित किया जा सके।इस परियोजना को वैज्ञानिक आधार देने के लिए IIT Roorkee और Wadia Institute of Himalayan Geology के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों से परामर्श लेकर परियोजना को तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जा रहा है।धूमन सिंह किरमच ने पौराणिक संदर्भ देते हुए बताया कि टौंस नदी और इसके आसपास का क्षेत्र महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पांडव स्वर्गारोहण के दौरान इसी मार्ग से गुजरे थे और आज भी इस क्षेत्र में लोग पांडवों की पूजा करते हैं। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए सरस्वती नदी पुनर्जीवन परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है।दोनों राज्यों ने इस परियोजना को जल संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो इससे न केवल प्राचीन सरस्वती नदी के पुनर्जीवन को गति मिलेगी, बल्कि जल संकट के समाधान और धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। Post Views: 3 Post navigationअप्रैल में लौटी सर्दी: पहाड़ों में बर्फबारी, मैदानी इलाकों में बारिश, चारधाम यात्रा पर असर हल्द्वानी में निजी स्कूलों पर प्रशासन का शिकंजा, 46 स्कूलों को नोटिस जारी