77 साल बाद जंगल गांवों में जागा लोकतंत्र: टोंगिया समुदाय को मिला वोट देने का अधिकार
ajaysemalty98 July 13, 2025
दैनिक प्रभातवाणी | 13 जुलाई 2025
देहरादून के टोंगिया समुदाय को पहली बार मिला मतदान का अधिकार
(बदलाव की नई सुबह)
देहरादून, उत्तराखंड।
उत्तराखंड के देहरादून जिले में निवास करने वाले टोंगिया समुदाय के लोगों के लिए यह वर्ष किसी उत्सव से कम नहीं है। दशकों से जंगलों में बसे इस समुदाय को अब पहली बार लोकतंत्र की सबसे अहम ताक़त – वोट डालने का अधिकार मिला है। आज़ादी के 77 वर्षों बाद यह एक ऐतिहासिक क्षण बना, जब 1300 से अधिक टोंगिया नागरिकों को आधिकारिक रूप से मतदाता सूची में शामिल किया गया।
कौन हैं टोंगिया लोग?
टोंगिया समुदाय के लोग ब्रिटिश शासन काल से जंगलों में रहकर वृक्षारोपण, जंगलों की सफाई और देखभाल जैसे कार्यों में संलग्न रहे हैं। इन्हें “वन मजदूर” के रूप में पहचाना गया, लेकिन वर्षों तक सरकारों ने इन्हें कानूनी मान्यता और नागरिक अधिकारों से वंचित रखा।
इनकी बस्तियां राजाजी टाइगर रिज़र्व और वन क्षेत्रों के समीप बनी रहीं, परंतु इन्हें राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं मिल सका, जिससे यह समुदाय कई मूलभूत सुविधाओं और संवैधानिक अधिकारों से अब तक वंचित था।
वे गांव जिन्हें अधिकार मिला
आशारोड़ी (Asharodi)
मोहंड (Mohand)
रामगढ़ (Ramgarh)
इन तीन प्रमुख जंगल गांवों में रह रहे परिवारों को अब मतदाता के रूप में मान्यता दी गई है। इन्हें न केवल मतदान करने का अधिकार मिला है, बल्कि इससे जुड़ी अन्य सरकारी सुविधाएं भी धीरे-धीरे इनकी पहुंच में आने लगी हैं।
बदलाव की मुख्य बातें:
पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज
आधार कार्ड, राशन कार्ड, बैंक खाता खुलवाने में सहूलियत
सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा (PM Awas, Ayushman आदि)
स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और बिजली जैसी सुविधाओं की उम्मीद
राजस्व ग्राम की मान्यता मिलने की प्रक्रिया शुरू
ग्रामीणों की प्रतिक्रिया:
गांव की एक बुजुर्ग महिला ने वोटर कार्ड हाथ में थामते हुए कहा:
“जिंदगी में पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि हम भी भारत के नागरिक हैं। अब हमारी बात भी सुनी जाएगी।”
छात्रों और युवाओं में भी भारी उत्साह है। अब वे शिक्षा व नौकरी के अवसरों में बराबरी की उम्मीद कर रहे हैं।
अधिकारियों की टिप्पणी:
देहरादून के जिला निर्वाचन अधिकारी ने कहा:
“यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। प्रशासन का प्रयास है कि इन गांवों को जल्द ही राजस्व ग्राम में परिवर्तित किया जाए।”
वन विभाग, पंचायत विभाग और राजस्व प्रशासन ने समन्वय से यह कदम उठाया है।
पृष्ठभूमि और संघर्ष
1980 के दशक में टोंगिया लोगों ने स्थायी निवास और नागरिक अधिकारों की मांग शुरू की थी।
लेकिन इन्हें ‘अवैध अतिक्रमणकर्ता’ माना जाता रहा।
सामाजिक संगठनों, जनआंदोलनों और न्यायालयों के हस्तक्षेप से यह मुद्दा वर्षों तक सुर्खियों में बना रहा।
अंततः सरकार ने इन गांवों को मान्यता देने और इन्हें लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल करने का निर्णय लिया।
दृश्य कल्पना:
“रामगढ़ गांव के प्राथमिक विद्यालय में लगी मतदाता सूची देखकर किशोर बच्चों की आंखों में सपने चमक उठे। वहां दीवार पर लिखा था – ‘हम भी करेंगे वोट’।”
दैनिक प्रभातवाणी
टोंगिया समुदाय को मिला यह अधिकार सिर्फ एक कागज़ी पहचान नहीं, बल्कि सम्मान, समानता और गरिमा की ओर बढ़ा पहला ठोस कदम है। उत्तराखंड में लोकतंत्र की यह जीत आने वाले समय में हजारों वंचित परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है।