January 13, 2026

उत्तराखंड के युवक की यूपी जेल में हत्या: बिजनौर जेल में साथी विचाराधीन कैदी ने की नृशंस वारदात

उत्तराखंड युवक की यूपी जेल में हत्या: बिजनौर जेल में साथी कैदी ने ली जान
Spread the love

दैनिक प्रभातवाणी | 21 जुलाई 2025
बिजनौर/देहरादून। उत्तराखंड के एक युवक की उत्तर प्रदेश की बिजनौर जिला जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में हत्या हो गई है। मृतक एक विचाराधीन कैदी था, जिसकी मौत उसके ही बैरक में बंद एक अन्य साथी कैदी द्वारा की गई बताई जा रही है। यह मामला अब उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश तक की जेल व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

घटना का संक्षिप्त विवरण

मृतक युवक की पहचान 26 वर्षीय रवि सिंह (परिवर्तित नाम) के रूप में हुई है, जो उत्तराखंड के कोटद्वार का निवासी था। वह कुछ सप्ताह पूर्व ही एक आपराधिक मामले में बिजनौर जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में बंद किया गया था। जेल प्रशासन के अनुसार, 20 जुलाई की रात को बैरक में बंद रवि का किसी बात को लेकर साथी विचाराधीन कैदी से विवाद हुआ था, जो देखते ही देखते मारपीट में बदल गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, झगड़े के दौरान दूसरे कैदी ने रवि पर धारदार वस्तु से वार कर दिया, जिससे उसकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। जेल प्रशासन ने रवि को तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

हत्या की पृष्ठभूमि: क्या था झगड़े की वजह?

सूत्रों के अनुसार, झगड़ा मामूली कहासुनी से शुरू हुआ था। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह सामने आया है कि रवि और आरोपी कैदी के बीच पिछले कुछ दिनों से आपसी तनाव था, जिसका कारण बैरक में वर्चस्व की लड़ाई, खाना बांटने को लेकर विवाद या आपसी बदतमीज़ी हो सकती है। हालांकि, अभी तक पुलिस ने इस बात की पुष्टि नहीं की है कि हत्या किन परिस्थितियों में और किन हथियारों से हुई।

जेल प्रशासन की भूमिका पर सवाल

यह घटना एक बार फिर यूपी की जेलों में कैदियों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं को बढ़ा रही है। बिजनौर जेल के अधीक्षक का कहना है कि “घटना अप्रत्याशित थी, और जेलकर्मियों ने तुरंत हस्तक्षेप किया। मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।”

वहीं, मृतक के परिजनों का कहना है कि रवि की जान की पहले से ही धमकी मिल रही थी और उन्होंने जेल प्रशासन को इसकी जानकारी दी थी, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई।

उत्तराखंड में शोक और आक्रोश

रवि सिंह के गांव कोटद्वार में शोक की लहर फैल गई है। परिवार के लोगों का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता बलबीर सिंह ने मीडिया को बताया, “हमारा बेटा कोई अपराधी नहीं था। वह एक झूठे मुकदमे में फंस गया था। हमें न्याय चाहिए। जेल में हत्या सुरक्षा तंत्र की विफलता है।”

स्थानीय सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले में सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।

मानवाधिकार आयोग की नजर

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश शासन और जेल विभाग से रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने कहा कि यह घटना कैदियों की सुरक्षा और जेलों में मानवाधिकारों की स्थिति पर सवाल उठाती है।

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

यह कोई पहली घटना नहीं है जब किसी विचाराधीन कैदी की जेल में हत्या हुई हो। पिछले 5 वर्षों में उत्तर प्रदेश और बिहार की जेलों में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जहाँ कैदी आपसी झगड़े या साजिश के तहत मारे गए। इन घटनाओं ने देश की जेल व्यवस्था पर गहरी चिंता जताई है।

कुछ प्रमुख सवाल:

  • जेल में विचाराधीन कैदी के पास धारदार वस्तु कैसे पहुँची?

  • बैरक में मौजूद अन्य कैदी या प्रहरी क्या कर रहे थे?

  • पहले से शिकायत होने के बावजूद कोई सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए गए?

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने इस घटना को उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर धब्बा बताते हुए कहा, “अगर जेल में भी कोई सुरक्षित नहीं है, तो राज्य में आम आदमी की क्या सुरक्षा होगी?” उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मांग की है कि वह यूपी सरकार से इस घटना पर जवाब लें।

उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। जिलाधिकारी ने घटना स्थल का निरीक्षण किया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट की समीक्षा की जा रही है।

कानूनविदों की राय

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव रावत कहते हैं, “भारत में विचाराधीन कैदी को तब तक दोषी नहीं माना जाता जब तक अदालत से सजा न हो जाए। ऐसे में जेल प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह कैदी की सुरक्षा सुनिश्चित करे। यदि कैदी की हत्या होती है, तो जेल प्रशासन भी जवाबदेह है। इस मामले में IPC की धारा 302 के साथ-साथ धारा 304A (लापरवाही) भी लगाई जा सकती है।”

दैनिक प्रभातवाणी

बिजनौर जेल में हुई यह घटना महज़ एक हत्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की असफलता का प्रतीक है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे कारागार केवल सज़ा काटने की जगह हैं या फिर वहाँ भी इंसान की जान की कोई कीमत नहीं बची?

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि ऐसे मामलों में जल्द से जल्द न्याय सुनिश्चित करें और जेलों में कैदियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। साथ ही, जेल सुधारों की प्रक्रिया को गंभीरता से लागू किया जाए।