उत्तराखंड के 100+ डैम्स पर GLOF का खतरा: हिमालय में जल-आपदा की चेतावनीदैनिक प्रभातवाणी | देहरादून, 24 जुलाई 2025उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों में स्थित 100 से अधिक डैम्स को लेकर केंद्र सरकार की एक हालिया समीक्षा ने गहरी चिंता खड़ी कर दी है। इस रिपोर्ट में इन बांधों को Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs) यानी ‘हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली विनाशकारी बाढ़ों’ के ख़तरे की दृष्टि से अति संवेदनशील बताया गया है। सरकार द्वारा यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब मानसून की वर्षा, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं ने पहाड़ी राज्यों में तबाही मचा रखी है। इससे डैम इंफ्रास्ट्रक्चर, नदियों के बहाव मार्ग और स्थानीय आबादी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।हिमालयी डैम्स: विकास और विनाश के बीच संतुलनउत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जलविद्युत परियोजनाओं का केंद्र बन चुके हैं। अकेले उत्तराखंड में 100 से अधिक डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट कार्यरत हैं या निर्माणाधीन हैं। इन डैम्स से बिजली उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई और जलप्रबंधन की व्यवस्था भी की जाती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण और पर्यावरणीय असंतुलन ने इन संरचनाओं को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है।सरकारी रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के कई डैम ऐसे इलाकों में स्थित हैं जहां उपरि हिमनदीय झीलें बन चुकी हैं। जैसे ही ग्लेशियर पिघलते हैं, झीलों का आकार बढ़ता है और जब उनका जलस्तर खतरे के निशान को पार करता है, तब एक झील अचानक फट सकती है। यह घटना “ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड” कहलाती है।क्या होती है GLOF आपदा?GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो तब घटित होती है जब कोई ग्लेशियर या हिमनदीय झील अचानक टूट जाती है और उसका विशाल जलराशि नीचे की ओर बहती है। यह बहाव इतना तेज़ और बलशाली होता है कि यह रास्ते में आने वाले पुल, सड़कें, गांव, और यहां तक कि डैम जैसी मजबूत संरचनाओं को भी ध्वस्त कर देता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की ऋषिगंगा आपदा ऐसे ही घटनाओं की चेतावनी थीं, जिनमें GLOF की भूमिका मानी गई।सरकार की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अब तक भारत में हिमालयी क्षेत्र में करीब 3200 हिमनदीय झीलें चिन्हित की जा चुकी हैं, जिनमें से 150 से अधिक “संभावित रूप से खतरनाक” मानी गई हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में पाई जाती है।उत्तराखंड में GLOF का बढ़ता ख़तराउत्तराखंड की भूगर्भीय संरचना अत्यंत जटिल है। यहां की अधिकांश नदियाँ – जैसे अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी, टौंस और धौलीगंगा – ग्लेशियरों से उत्पन्न होती हैं और इनके ऊपरी क्षेत्रों में कई ग्लेशियल लेक स्थित हैं। गर्मियों और मानसून के दौरान जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो इन झीलों का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है।सरकार की रिपोर्ट में अलकनंदा बेसिन में विशेष खतरे का संकेत दिया गया है। यहां विष्णुगढ़ परियोजना, टपवन डैम, पीपलकोटी डैम और अन्य जलविद्युत परियोजनाएं संभावित खतरे की जद में आती हैं। इन क्षेत्रों में पहले भी फ्लैश फ्लड और मलबा बहाव की घटनाएं हुई हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कोई सतर्कता नहीं बरती गई, तो भविष्य में ऋषिगंगा जैसी घटनाएं फिर से दोहराई जा सकती हैं – और तब नुक़सान की कल्पना भी भयावह होगी।बर्फीले संकट की सरकारी चेतावनीकेंद्रीय जल आयोग (CWC), आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और रक्षा मंत्रालय की सैटेलाइट यूनिट्स ने मिलकर यह रिपोर्ट तैयार की है। इसमें खासतौर पर उन डैम्स की सूची दी गई है जो GLOF के सीधा प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि अभी अधिकांश बांधों के पास GLOF अलर्ट सिस्टम, बर्फ की निगरानी व्यवस्था और इमरजेंसी निकासी प्लान मौजूद नहीं हैं।रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि कई पुराने डैम्स को जलवायु परिवर्तन के वर्तमान मानकों के अनुसार अपडेट नहीं किया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि वे संरचनाएं आज के खतरों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।स्थानीय समुदाय और पर्यावरणीय असंतुलनउत्तराखंड के स्थानीय निवासियों ने भी कई बार आशंका जताई है कि बड़े डैम्स के कारण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ा है। बांधों के कारण नदियों का प्राकृतिक बहाव बाधित होता है, जिससे नीचे के क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति घटती है, और भू-जल स्तर पर भी असर पड़ता है। इसके अलावा, डैम निर्माण के लिए हो रहे पहाड़ी कटान, सुरंगों की खुदाई, और भारी मशीनरी का उपयोग स्थानीय भूस्खलन को भी बढ़ावा देता है।गांवों में रहने वाले लोग बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों में उनके क्षेत्र में भूमि धंसाव, पानी के स्रोतों का सूखना और अचानक आई बाढ़ों की संख्या बढ़ी है। यह सब पर्यावरणीय असंतुलन की ओर इशारा करता है – और इसमें जलविद्युत परियोजनाओं की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।जलवायु परिवर्तन और पर्वतीय क्षेत्र की नाज़ुकतावैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन से सबसे तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) की रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय के ग्लेशियर पिछले 20 वर्षों में 30% तक सिकुड़ चुके हैं। इससे ग्लेशियल झीलें तेजी से बन रही हैं और उनका आकार लगातार बढ़ रहा है।ग्लेशियरों के पिघलने का एक अन्य परिणाम यह है कि लंबे समय में नदियों में जल प्रवाह घटेगा, जिससे डैम्स की उपयोगिता और उत्पादन भी प्रभावित होगी। ऐसे में डैम निर्माण पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।समाधान और नीति विकल्पGLOF जैसे संकट से निपटने के लिए सरकार को बहुआयामी कदम उठाने होंगे:GLOF चेतावनी सिस्टम: हर संवेदनशील डैम के पास बर्फ और जल स्तर की निगरानी के लिए रियल-टाइम सेंसर्स और अलर्ट सिस्टम लगाना अनिवार्य हो।इकोलॉजिकल Zoning: उन क्षेत्रों में डैम निर्माण पर रोक लगाई जाए जहां पारिस्थितिक असंतुलन और भूस्खलन की संभावना अधिक हो।स्थानीय समुदायों का प्रशिक्षण: गांवों और कस्बों में आपदा प्रबंधन की जानकारी और इमरजेंसी प्लानिंग पर ध्यान दिया जाए।पुराने डैम्स का रिट्रोफिटिंग: मौजूदा डैम्स की डिज़ाइन और संरचना को आधुनिक मानकों के अनुसार अपडेट किया जाए।पारदर्शी पर्यावरणीय मूल्यांकन: नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले विस्तृत अध्ययन और जनसुनवाई सुनिश्चित की जाए।राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएंसरकार ने रिपोर्ट जारी तो कर दी है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट कार्ययोजना सामने नहीं आई है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए केंद्र और राज्य सरकार से “तत्काल कार्रवाई” की मांग की है। सोशल मीडिया पर भी इस खबर को लेकर लोग सरकार की पर्यावरण नीति पर सवाल उठा रहे हैं।वहीं, राज्य के कुछ अधिकारियों का कहना है कि NDMA और SDRF के माध्यम से कुछ क्षेत्रों में मॉक ड्रिल और अलर्ट सिस्टम का ट्रायल किया जा रहा है, लेकिन यह व्यापक स्तर पर लागू नहीं है।निष्कर्ष: खतरे की घंटी और भविष्य की दिशाउत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों में डैम्स और ग्लेशियल लेक्स का मेल आने वाले वर्षों में जल संकट और आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा। सरकार को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को सिर्फ चेतावनी न मानकर, कार्रवाई का दस्तावेज बनाए।हिमालयी क्षेत्र की नाज़ुकता को ध्यान में रखते हुए विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना अब सिर्फ एक नीतिगत विकल्प नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है। उत्तराखंड को बचाने के लिए जल्द, सटीक और वैज्ञानिक कदमों की जरूरत है — वरना अगली त्रासदी सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि हमारे सामने खड़ी होगी। Post Views: 67 Post navigationकांवड़ यात्रा में करंट लगने से दर्दनाक हादसा – श्रद्धालुओं की आस्था पर टूटा बिजली का कहर पंचायत चुनाव 2025: पहले चरण में लोकतंत्र का पर्व, दोपहर तक 45% से अधिक मतदान | मुख्यमंत्री धामी ने खटीमा में डाला वोट