January 13, 2026

उत्तराखंड का नया सपना: “डिजिटल वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” से गांवों में बसेगा भविष्य

उत्तराखंड का नया सपना: “डिजिटल वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” से गांवों में बसेगा भविष्य
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दैनिक प्रभातवाणी
विशेष रिपोर्ट | 25 जुलाई 2025
स्थान: देहरादून/हल्द्वानी | उत्तराखंड


उत्तराखंड का नया सपना: “डिजिटल वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” से गांवों में बसेगा भविष्य

उत्तराखंड सरकार ने एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी पहल की है, जिसका उद्देश्य न केवल गांवों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाना है, बल्कि शहरी आबादी का बोझ भी संतुलित करना है। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने देहरादून और हल्द्वानी के पास दो गांवों को ‘डिजिटल नोमैड विलेज’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव पारित किया है। इस पहल को “वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” नीति के तहत अमल में लाया जा रहा है।

वर्तमान में जहां दुनिया हाइब्रिड और रिमोट वर्क मॉडल को अपनाकर शहरी केंद्रों पर निर्भरता कम कर रही है, वहीं उत्तराखंड सरकार की यह योजना देश में एक मॉडल राज्य के रूप में उसकी पहचान को मजबूत करती है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य न केवल युवाओं को शहरी भागदौड़ से राहत देना है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा और गति देना भी है।


क्या है डिजिटल वर्क‑फ्रॉम‑विलेज योजना?

“डिजिटल वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” का मतलब है कि अब लोग गांवों में रहकर हाई-स्पीड इंटरनेट की सहायता से वहीं से अपने कार्यालयीय या स्वतंत्र पेशेवर (freelance) कार्य कर सकेंगे। यह मॉडल दुनिया के कई देशों जैसे जापान, इंडोनेशिया, पुर्तगाल और स्पेन में पहले से सफलतापूर्वक लागू हो चुका है। उत्तराखंड इसे भारत के पहले पहाड़ी राज्य के रूप में विकसित करने जा रहा है।

देहरादून के पास मसूरी मार्ग पर स्थित भिटियाणी गांव और हल्द्वानी के पास पहाड़ी खाल गांव को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चुना गया है। इन गांवों को पूरी तरह से फाइबर इंटरनेट, सह-कार्य (co-working) सुविधाओं, हाउसिंग, और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस किया जा रहा है।


राज्य सरकार की रणनीति और सहयोग

उत्तराखंड सरकार ने इस योजना को निजी निवेश और CSR (Corporate Social Responsibility) मॉडल से जोड़कर लागू करने का खाका तैयार किया है। टाटा ट्रस्ट्स, HCL फाउंडेशन, और कुछ निजी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियाँ इस योजना में शुरुआती रुचि दिखा चुकी हैं। मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है:

“उत्तराखंड का भविष्य गांवों से जुड़ेगा। तकनीक को गांवों तक पहुंचाना हमारी प्राथमिकता है। यह योजना हमारे युवाओं को अपने ही राज्य में रहकर काम करने का अवसर देगी।”


योजना के पांच मुख्य स्तंभ

  1. डिजिटल कनेक्टिविटी:
    प्रत्येक चयनित गांव में 100 Mbps या उससे अधिक स्पीड वाला इंटरनेट उपलब्ध कराया जाएगा। भारत नेट परियोजना के तहत OFC (Optical Fiber Cable) पहले ही इन क्षेत्रों तक पहुँच चुकी है।

  2. को-वर्किंग स्पेस:
    गाँवों में आधुनिक ऑफिस स्पेस विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें बैठक कक्ष, इंटरनेट, प्रिंटर, स्कैनर, UPS, जनरेटर और कैफेटेरिया जैसी सुविधाएँ होंगी।

  3. सस्ता और शांत आवास:
    सरकार लोक निर्माण विभाग के पुराने गेस्ट हाउसों को वर्क-फ्रॉम-होम प्रोटोकॉल के अनुसार रिनोवेट कर रही है। इसके अलावा स्थानीय घरों को भी हॉमस्टे पॉलिसी के तहत जोड़ा जाएगा।

  4. स्थानीय रोजगार और प्रशिक्षण:
    युवाओं को डिजिटल मार्केटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग, ग्राहक सेवा, ई-कॉमर्स सपोर्ट जैसे स्किल्स में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे भी रिमोट वर्क कर सकें।

  5. पर्यावरण और जीवन गुणवत्ता:
    गांवों में हरियाली, स्वच्छ हवा, कम ट्रैफिक, शुद्ध भोजन और शांत वातावरण से रिमोट वर्क करने वालों को मानसिक और शारीरिक राहत मिलेगी।


युवाओं और पेशेवरों को मिलेगा लाभ

दिल्ली, गुरुग्राम, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में रहने वाले हज़ारों IT पेशेवर, स्टार्टअप संस्थापक, कंटेंट क्रिएटर, ग्राफिक डिजाइनर और डेटा एनालिस्ट्स वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं, लेकिन भीड़, ट्रैफिक, प्रदूषण और महंगे किरायों के कारण वे तनावग्रस्त हैं। उत्तराखंड का यह पहल उन्हें एक सस्ता, शांत और प्राकृतिक वातावरण देगा जहाँ वे कम लागत में बेहतर जीवन जी सकेंगे।


गांवों में लौटेगा जीवन और अर्थव्यवस्था

डिजिटल वर्कफ्रॉमविलेज योजना केवल शहरों की भीड़ कम नहीं करेगी, बल्कि गांवों में ठहरा हुआ विकास भी गति पकड़ेगा। जैसे ही पेशेवर लोग गाँवों में रहकर काम करेंगे, स्थानीय बाजारों में गतिविधियाँ बढ़ेंगी — किराना, कैफे, टेक्निशियन, होमस्टे, परिवहन जैसी सेवाओं की मांग बढ़ेगी। इससे स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा।


पर्यटन से अलग एक नया मॉडल

उत्तराखंड पर्यटन पर लंबे समय से निर्भर रहा है, लेकिन वर्क-फ्रॉम-विलेज योजना एक स्थायी और स्थिर अर्थव्यवस्था तैयार करेगी, जिसमें लोग सिर्फ घूमने नहीं बल्कि लंबे समय तक रहने और काम करने के उद्देश्य से आएंगे। इससे राज्य को लगातार आय भी होगी और गांवों को अनियमित टूरिज्म से होने वाले नुकसान से राहत भी।


पर्यावरणीय लाभ: शहरों से दबाव घटेगा

शहरीकरण की रफ्तार जिस प्रकार जंगलों और जल स्रोतों पर दबाव डाल रही है, यह योजना उसे संतुलित कर सकती है। जब हजारों लोग गांवों में काम करेंगे, तो महानगरों पर बोझ घटेगा और ग्रीनहाउस गैसों में कमी आएगी। साथ ही, गांवों में सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और कचरा प्रबंधन जैसी प्रणालियों को भी योजनाबद्ध तरीके से जोड़ा जाएगा।


देशभर में बन सकती है मिसाल

यदि उत्तराखंड की यह पहल सफल होती है, तो यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण बनेगी। खासकर उत्तर-पूर्व, हिमाचल, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में इस मॉडल को अपनाया जा सकता है। डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे राष्ट्रीय अभियानों को इससे नई ऊर्जा मिलेगी।


चुनौतियाँ भी हैं — लेकिन समाधान भी हैं

हालांकि यह योजना जितनी सुनहरी दिखती है, उसमें उतनी ही जमीनी चुनौतियाँ भी हैं:

  • इंटरनेट स्पीड की निरंतरता

  • मौसम की अनिश्चितता (बर्फबारी, भूस्खलन)

  • ग्रामीणों के साथ पेशेवरों का सामंजस्य

  • बिजली और मोबाइल नेटवर्क की बाधाएँ

लेकिन सरकार का दावा है कि स्थानीय प्रशासन, IT कंपनियों और युवाओं की भागीदारी से ये सभी चुनौतियाँ पार की जा सकती हैं।


दैनिक प्रभातवाणी: एक पहाड़ी राज्य की डिजिटल छलांग

उत्तराखंड अपनी भौगोलिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक सुंदरता के साथ अब एक डिजिटल संभावनाओं वाला राज्य बनने की ओर अग्रसर है। “वर्क‑फ्रॉम‑विलेज” जैसी योजनाएँ दिखाती हैं कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो पहाड़ों में भी विकास की लहर दौड़ सकती है — वह भी बिना प्रकृति को नुकसान पहुँचाए।

यह योजना न केवल भविष्य के भारत का संकेत है, बल्कि उस भारत का स्वप्न भी है जहाँ गांव डिजिटल होंगे, युवा वहीं रोजगार पाएँगे और शहरी जीवन की जकड़न से मुक्ति मिलेगी। उत्तराखंड यह दिखा रहा है कि विकास केवल इमारतों से नहीं होता, वह संवेदनशील सोच और टिकाऊ मॉडल से होता है।