January 15, 2026

उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग पर बलात्कार का मामला खारिज, परस्पर सहमति संबंध मानते हुए कार्यवाही रद्द

उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग पर बलात्कार का मामला खारिज, परस्पर सहमति संबंध मानते हुए कार्यवाही रद्द

उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग पर बलात्कार का मामला खारिज, परस्पर सहमति संबंध मानते हुए कार्यवाही रद्द

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दैनिक प्रभातवाणी
1 अगस्त 2025 | विशेष न्यायिक रिपोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग पर बलात्कार का मामला खारिज, परस्पर सहमति संबंध मानते हुए कार्यवाही रद्द

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बेहद संवेदनशील और कानूनी दृष्टिकोण से पेचीदा मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक नाबालिग लड़के पर लगे बलात्कार के आरोप को खारिज कर दिया। यह मामला एक वयस्क और विवाहित महिला द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़ा था, जिसे अदालत ने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर परस्पर सहमति से बना संबंध मानते हुए दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला ना सिर्फ कानूनी दृष्टि से बल्कि सामाजिक और नैतिक विमर्श के स्तर पर भी गहरी छाप छोड़ने वाला है।

मामले की पृष्ठभूमि: आरोप और प्रारंभिक जांच

वर्ष 2023 के मध्य में उत्तराखंड के एक कस्बे से एक गंभीर मामला सामने आया, जहाँ एक विवाहित महिला ने अपने से उम्र में छोटे, मात्र 17 वर्षीय नाबालिग लड़के पर बलात्कार का आरोप लगाया। महिला ने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराते हुए यह आरोप लगाया कि उक्त किशोर ने उसे धोखे और दबाव में रखकर यौन संबंध स्थापित किए। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), साथ ही POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।

प्रथम दृष्टया यह मामला काफी जटिल प्रतीत हुआ, क्योंकि इसमें नाबालिग स्वयं आरोपी था, और पीड़िता एक वयस्क, विवाहित महिला थी। प्रारंभिक जांच में दोनों पक्षों के बयान और आपसी संपर्क की जानकारी सामने आने लगी, जिसने मामले को एक नए मोड़ पर ला दिया।

अदालती कार्यवाही और सुनवाई का विस्तार

मामला सत्र न्यायालय से होता हुआ उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा, जहाँ इसने न्यायपालिका और जनमानस दोनों का ध्यान खींचा। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई की। जांच रिपोर्ट, कॉल डिटेल्स, सोशल मीडिया संवाद, और दोनों की मेडिकल रिपोर्ट्स को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

अदालत के सामने यह स्पष्ट होने लगा कि यह संबंध लंबे समय से चल रहा था और इसमें दोनों पक्षों की संलिप्तता स्वैच्छिक थी। महिला के सोशल मीडिया संदेशों और कॉल रिकॉर्ड से संकेत मिले कि वह नाबालिग से भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई थी और कई बार उसने खुद संपर्क साधा।

हाईकोर्ट की गहन टिप्पणी

उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में बेहद संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। न्यायालय ने कहा:

“मामले की सभी परिस्थितियों, डिजिटल साक्ष्यों और दोनों पक्षों के बयानों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह शारीरिक संबंध जबरन नहीं थे, बल्कि परस्पर सहमति से बने संबंध थे। आरोपी की उम्र नाबालिग अवश्य है, लेकिन महिला की उम्र, वैवाहिक स्थिति और सामाजिक अनुभव को देखते हुए यह स्वीकार करना कठिन है कि वह किसी मानसिक या शारीरिक दबाव में रही होगी।”

“POCSO जैसे कानूनों का उद्देश्य बालकों की रक्षा है, न कि उन्हें ऐसे मामलों में दंडित करना जहाँ वे स्वयं सामाजिक या भावनात्मक रूप से भ्रमित अवस्था में हों।”

न्यायालय ने इस आधार पर पूरे मुकदमे, एफआईआर और आगे की समस्त कार्यवाहियों को रद्द करते हुए नाबालिग को दोषमुक्त घोषित कर दिया।

POCSO कानून की सीमाएं और व्याख्या

यह मामला इस ओर भी संकेत करता है कि POCSO जैसे कड़े कानूनों में भी परिस्थितियों के अनुसार व्याख्या और विवेक की आवश्यकता है। कानून में यह स्पष्ट है कि नाबालिग की ‘सहमति’ को वैध नहीं माना जा सकता, परंतु जब पीड़िता स्वयं वयस्क और विवाहित हो, तो क्या वह पूरी तरह से दोषमुक्त हो सकती है?

इस निर्णय ने विधिक हलकों में यह बहस छेड़ दी है कि क्या ऐसे मामलों के लिए POCSO अधिनियम में एक अलग उपवर्ग या प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए, जहाँ नाबालिग आरोपी हो और पीड़ित पक्ष वयस्क हो।

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आयाम

यह मामला केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत जैसे देश में जहाँ नाबालिगों को प्रायः ‘निर्दोष’ और ‘अपरिपक्व’ माना जाता है, वहीं इस प्रकार के मामलों में वे अचानक अपराधी के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि आज की डिजिटल दुनिया में किशोरों के बीच भावनात्मक और यौन संबंधों का स्वरूप काफी बदल चुका है। ऐसे में केवल उम्र के आधार पर आरोप और दंड तय करना न्याय के व्यापक सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।

न्यायिक विवेक की मिसाल

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक विवेक, मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह निर्णय दिखाता है कि कानूनों की व्याख्या केवल किताबों में नहीं, बल्कि समाज की बदलती वास्तविकताओं के अनुसार भी होनी चाहिए।

प्रतिक्रियाएं और विमर्श

इस फैसले पर कानूनविदों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और बाल संरक्षण विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आई है। जहां कुछ इसे न्याय के हित में एक साहसिक फैसला मानते हैं, वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में कुछ मामलों में असमंजस और गलत मिसालें बन सकती हैं।

हालांकि, अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि इस निर्णय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक चर्चा की नींव रखी है, जिसे आने वाले समय में नीति निर्माण और कानून संशोधन के स्तर पर गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

दैनिक प्रभातवाणी की टिप्पणी

यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हर नाबालिग दोषी होता है, या कभी-कभी वह भी समाज की जटिलताओं का शिकार होता है? क्या कानून केवल दंड का उपकरण है, या सुधार और विवेक का माध्यम भी होना चाहिए? उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला एक दिशा दिखाता है – एक ऐसी दिशा जो नाबालिगों को अंधेरे से बाहर निकालकर उन्हें न्याय और मानवता की रोशनी में लाने का प्रयास करती है।

यह निर्णय न केवल कानून की व्याख्या का उदाहरण है, बल्कि उस सामाजिक बदलाव का संकेत भी है जिसकी वर्तमान भारत को ज़रूरत है।