January 15, 2026

ऑनलाइन गेमिंग की लत से दो बेटियों की मौत: उत्तराखंड में एक खतरनाक ट्रेंड का इशारा

ऑनलाइन गेमिंग की लत से दो बेटियों की मौत: उत्तराखंड में एक खतरनाक ट्रेंड का इशारा
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ऑनलाइन गेमिंग की लत से दो बेटियों की मौत: उत्तराखंड में एक खतरनाक ट्रेंड का इशारा

ऑनलाइन गेमिंग की लत से दो बेटियों की मौत: उत्तराखंड में एक खतरनाक ट्रेंड का इशारा

हल्द्वानी / रुद्रपुर | 3 अगस्त 2025

उत्तराखंड के दो प्रमुख शहरों – हल्द्वानी और रुद्रपुर – हाल ही में दो हृदय विदारक घटनाओं के साक्षी बने। दोनों घटनाओं में किशोर और युवा छात्राओं ने ऑनलाइन गेमिंग की लत और उससे जुड़े भारी आर्थिक नुकसान के चलते आत्महत्या कर ली। यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक बढ़ते हुए सामाजिक खतरे का स्पष्ट संकेत है, जिससे हजारों युवा देशभर में प्रभावित हो रहे हैं।

हल्द्वानी की छात्रा ने लूडो गेम में ₹5 लाख हारकर दी जान

हल्द्वानी के बानियाकुली क्षेत्र की रहने वाली 21 वर्षीय युवती, जो बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा थी, ने 2 अगस्त को अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि युवती कई महीनों से अपने मोबाइल फोन में एक इंस्टॉल किए गए ऑनलाइन लूडो गेम पर अत्यधिक समय बिता रही थी। यह साधारण खेल धीरे-धीरे उसकी लत में तब्दील हो गया।

माता-पिता ने बताया कि शुरुआत में यह खेल एक सामान्य मनोरंजन जैसा ही प्रतीत होता था, लेकिन जब लड़की ने “कैश मोड” में पैसे लगाकर खेलने की शुरुआत की, तब उसका व्यवहार बदलने लगा। उसने पहले खुद के पैसे लगाए, फिर रिश्तेदारों से उधार लेकर और ऐप के जरिए ऑनलाइन लोन लेकर करीब 4–5 लाख रुपये तक दांव पर लगा दिए।

जिस दिन उसने आत्महत्या की, उस सुबह भी वह बेहद परेशान दिखी थी। शाम को जब परिवार के लोग कुछ समय के लिए बाहर गए, तो उसने कमरे में खुद को बंद कर लिया और फांसी लगा ली। पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट मिला है जिसमें लिखा है:

“मैं हार बर्दाश्त नहीं कर पा रही। मैंने कोशिश की, लेकिन अब मुझसे नहीं होगा। पापा-मम्मी मुझे माफ करना।”

रुद्रपुर की छात्रा ने अप्रैल 2024 में ज़हर खाकर आत्महत्या की थी

यह पहली बार नहीं है जब ऑनलाइन गेमिंग की लत ने एक जान ले ली हो। अप्रैल 2024 में रुद्रपुर में एक 18 वर्षीय छात्रा ने ऑनलाइन गेमिंग में भारी कर्ज में फंसकर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि छात्रा ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से उधारी लेकर मोबाइल गेम्स में दांव लगाया था। जब वह लगातार हारती रही और रकम बढ़ती गई, तो उसे सामाजिक शर्म और आर्थिक दबाव ने मानसिक रूप से तोड़ दिया।

उसकी मां ने कहा:

“हमने समझा था वह पढ़ाई में व्यस्त है, लेकिन हमें नहीं पता था कि वह मोबाइल पर घंटों गेम खेल रही है और लोन ले रही है। हमें उसकी पीड़ा तब समझ आई जब वह हमारे सामने तड़पती हुई गिरी और उसकी मौत हो गई।”

ऑनलाइन गेमिंग: एक मनोरंजन या जानलेवा लत?

जब से मोबाइल इंटरनेट का विस्तार हुआ है, तब से युवाओं में ऑनलाइन गेमिंग की पहुंच और लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। पहले यह मनोरंजन का साधन था, लेकिन अब यह कई लोगों के लिए एक आदत और फिर एक नशे की तरह बन चुका है। खासकर वे ऐप्स जो “रिवार्ड्स” और “कैश गेम्स” की सुविधा देते हैं, वे किशोरों और छात्रों को आसान पैसे की लालच में फंसा देते हैं।

भारत में Dream11, MPL, Winzo, Zupee जैसे प्लेटफॉर्म्स का प्रचार बड़े क्रिकेटर्स और सेलिब्रिटीज़ द्वारा किया जाता है। इससे इन ऐप्स को एक तरह की वैधता और प्रामाणिकता मिलती है, जो किशोरों को भ्रमित करती है। जब वे इन ऐप्स में हारते हैं, तो नुकसान को छिपाने और पैसे वापस पाने की कोशिश में वे और अधिक फंसते चले जाते हैं।

मनोवैज्ञानिकों की राय: यह मानसिक बीमारी का रूप ले चुका है

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे एक तरह का “डिजिटल जुआ” (Digital Gambling Disorder) मानते हैं। डॉ. रश्मि जोशी, (काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट, देहरादून) कहती हैं:

“जब कोई व्यक्ति जीतता है, तो उसके दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जिससे उसे उत्साह और सफलता का आभास होता है। यह प्रक्रिया उसी तरह होती है जैसे ड्रग्स या शराब लेने के बाद महसूस होता है। यह रासायनिक प्रतिक्रिया धीरे-धीरे एक व्यक्ति को लत की ओर ले जाती है।”

वे यह भी बताती हैं कि जो युवा आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, उनके लिए यह हार असहनीय बन जाती है और वे सामाजिक शर्मिंदगी के डर से चुप रहकर आत्महत्या जैसा निर्णय ले लेते हैं।

परिवारों की भूमिका: सतर्कता और संवाद की ज़रूरत

इन दोनों घटनाओं के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि माता-पिता को अब बच्चों के मोबाइल उपयोग और मानसिक स्थिति के प्रति अधिक सतर्क रहना होगा। केवल मोबाइल छीनना समाधान नहीं, बल्कि जरूरी है कि:

  • बच्चों के साथ नियमित संवाद किया जाए
  • उनका डिजिटल बिहेवियर समझा जाए
  • गेमिंग ऐप्स और उनकी शर्तों की जानकारी ली जाए
  • हर सप्ताह डिजिटल डिटॉक्स डे रखा जाए
  • ऑनलाइन खर्च की सीमा तय की जाए

सरकार और प्रशासन की चुप्पी: चिंता का विषय

उत्तराखंड में ऑनलाइन गेमिंग को लेकर कोई स्पष्ट नीति या नियंत्रण तंत्र नहीं है। जबकि राज्य में नशा मुक्ति अभियान और साइबर अपराध प्रकोष्ठ सक्रिय हैं, परंतु डिजिटल गेमिंग से जुड़ी लत और आर्थिक धोखाधड़ी को लेकर कोई सघन अभियान अब तक नहीं चलाया गया है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने 2023 में सभी राज्यों को पत्र लिखकर ऑनलाइन गेमिंग की लत पर चिंता जताई थी और कहा था कि स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अब तक बहुत कम काम हुआ है।

कानूनी पहलू: क्या ऑनलाइन गेमिंग पर रोक संभव है?

भारत में ऑनलाइन गेमिंग को लेकर स्थिति काफी धुंधली है। सुप्रीम कोर्ट और कई हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अगर कोई गेम “स्किल बेस्ड” (Skill-based) है, तो उसे जुआ नहीं माना जा सकता। इसी कारण कई कंपनियाँ अपने गेम्स को स्किल बेस्ड बताकर कानूनी सुरक्षा का दावा करती हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में कुछ राज्यों ने ऑनलाइन रमी, पबजी जैसे ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। केंद्र सरकार ने भी 2023 में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन कर कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें “ऑनलाइन रियल मनी गेम्स” को विनियमित करने की बात कही गई थी।

समाधान क्या हो सकते हैं?

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, निम्न कदम जरूरी हैं:

  1. स्कूल-कॉलेज स्तर पर साइबर हेल्थ शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
  2. गेमिंग कंपनियों को विज्ञापन में पारदर्शिता और चेतावनी देना अनिवार्य किया जाए।
  3. डिजिटल वॉलेट/UPI पर उम्र सीमा और खर्च नियंत्रण की व्यवस्था की जाए।
  4. अभिभावकों को डिजिटल प्रशिक्षण दिया जाए जिससे वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी कर सकें।
  5. 24×7 मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन को जिलों तक सुलभ बनाया जाए।

मीडिया और समाज की भूमिका

सोशल मीडिया, YouTube और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर गेमिंग को “शानदार करियर”, “तेजी से पैसा कमाने का ज़रिया” बताकर जो प्रचार हो रहा है, उसने युवाओं के मन में भ्रम और लालच पैदा किया है। अब जरूरत है कि मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी निभाए और ऐसे प्लेटफॉर्म्स का बहिष्कार करे जो गलत मार्ग दिखा रहे हैं।

अंतिम संदेश: जिंदगी की कोई रीस्टार्ट बटन नहीं होती

हल्द्वानी और रुद्रपुर की बेटियों की मौतें केवल व्यक्तिगत घटनाएँ नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी हैं। समय आ गया है जब हमें डिजिटल स्वतंत्रता को संयम और विवेक से जोड़ना होगा। ऑनलाइन गेम्स केवल खेल नहीं – वे धीरे-धीरे मानसिक और आर्थिक विनाश की ओर ले जा सकते हैं।

युवाओं को यह समझना होगा कि हार जीवन का हिस्सा है, लेकिन जिंदगी से बड़ा कोई गेम नहीं। और माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों के मन की हलचल को अनदेखा करना, भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।


रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी विशेष संवाददाता
संपर्क: info@dainikprbhatvani.com | वेबसाइट: www.dainikprbhatvani.com