January 15, 2026

धराली में ज़मीन में क्यों समा गया था कल्प केदार मंदिर? – प्राचीन आपदा की गवाही देता शिवधाम

धराली में ज़मीन में क्यों समा गया था कल्प केदार मंदिर? – प्राचीन आपदा की गवाही देता शिवधाम
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दैनिक प्रभातवाणी विशेष रिपोर्ट

धराली में ज़मीन में क्यों समा गया था कल्प केदार मंदिर? – प्राचीन आपदा की गवाही देता शिवधाम

धराली में ज़मीन में क्यों समा गया था कल्प केदार मंदिर? – प्राचीन आपदा की गवाही देता शिवधाम
धराली में ज़मीन में क्यों समा गया था कल्प केदार मंदिर? – प्राचीन आपदा की गवाही देता शिवधाम

उत्तरकाशी/धराली, 6 अगस्त 2025
धराली गांव, जो इस समय 5 अगस्त की भीषण प्राकृतिक आपदा के कारण राष्ट्रीय चर्चा में है, उसी धरती के नीचे एक ऐसा रहस्य छिपा है जो न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि प्राचीन समय में हुई महाआपदाओं का भी मूक साक्षी है। हम बात कर रहे हैं — कल्प केदार मंदिर की, जो आज भी आधा ज़मीन में दबा हुआ है।


कल्प केदार – एक दबी हुई किंवदंती, एक जिंदा इतिहास

धराली गांव के समीप स्थित यह मंदिर भगवान शिव के 108 केदारों में से एक माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, यह मंदिर सदियों पहले किसी महाप्रलय, बर्फीले तूफान या ग्लेशियर जनित आपदा के कारण पूरी तरह मलबे में दब गया था। समय बीतने के साथ यह मंदिर गांववासियों की स्मृति और किंवदंतियों में सिमटता चला गया।

हाल के वर्षों में जब क्षेत्र की धार्मिक और पुरातात्विक रुचियों को समझते हुए खुदाई की गई, तो लोगों की आंखें फटी रह गईं — मंदिर का ऊपरी हिस्सा लगभग 12 फुट गहराई में दबा मिला। केवल आधा मंदिर ही अब सतह पर दिखाई देता है, बाकी का ढांचा आज भी धरती के भीतर दफन है।


क्या 2025 की आपदा उस प्राचीन घटना की पुनरावृत्ति है?

5 अगस्त 2025 को जो भयानक बाढ़ और फ्लैश फ्लड धराली में आई, उसने न केवल 20 से अधिक घर, होटल और दुकानें बहा दीं, बल्कि कल्प केदार मंदिर के आसपास की ज़मीन को भी हिला दिया

स्थानीय बुज़ुर्ग बताते हैं कि इस स्थान पर हर बार जब कोई बड़ी प्राकृतिक विपत्ति आई है, तब-तब कल्प केदार मंदिर किसी न किसी रूप में चेतावनी देता रहा है


धार्मिक महत्व और चेतावनी का प्रतीक

“यह कोई सामान्य मंदिर नहीं है,” — ऐसा कहते हैं स्थानीय निवासी पंडित नरेश भट्ट, जो कई पीढ़ियों से इस मंदिर से जुड़े हुए हैं।
उनका मानना है कि —

“भगवान शिव यहाँ ‘कल्पों’ से विराजमान हैं। इस मंदिर का दब जाना, और अब आपदा से इसका दोबारा चर्चा में आना, यह इशारा करता है कि प्रकृति कुछ बताना चाहती है।”


ग्लेशियर गतिविधि, जलवायु परिवर्तन और आपदा का संबंध

विशेषज्ञों के अनुसार, धराली क्षेत्र में स्थित खीरगंगा और सुक्की ग्लेशियरों की गतिविधियों में हाल के वर्षों में असामान्य बढ़ोतरी देखी गई है।
2025 की बाढ़ और भूस्खलन को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
मंदिर का दबना सिर्फ आस्था का विषय नहीं, बल्कि ग्लेशियर आधारित आपदा इतिहास का भी प्रमाण हो सकता है।


मंदिर का पुनरुद्धार या संरक्षण? सरकार और पुरातत्व विभाग की चुप्पी

हैरानी की बात यह है कि कल्प केदार जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को अब तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने सूचीबद्ध नहीं किया है। न ही इसके संरक्षण की दिशा में कोई ठोस प्रयास किए गए हैं।

स्थानीय लोगों की मांग है कि—

  • मंदिर को पूरी तरह खुदाई कर निकाला जाए

  • संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन हो

  • इसे धार्मिक पर्यटन और आपदा चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जाए


क्या आने वाली पीढ़ियाँ कल्प केदार का पूरा स्वरूप देख पाएंगी?

आज जब धराली एक बार फिर मलबे में डूबा है, तब यह प्रश्न और गहराता जा रहा है —
क्या हम कल्प केदार जैसे स्थलों की चेतावनियों को सुन पा रहे हैं?
या फिर ये मंदिर आने वाले समय में भी बार-बार मलबे के नीचे दबकर हमें प्रकृति की नाराज़गी दिखाते रहेंगे?


दैनिक प्रभातरवाणी:

कल्प केदार मंदिर आज सिर्फ एक धार्मिक धरोहर नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आपदा चेतावनी का ऐतिहासिक स्रोत बनता जा रहा है।
धरती में दबा यह मंदिर हमें बार-बार याद दिला रहा है कि हम पहाड़ों की गोद में रहते हैं — जहाँ प्रकृति जब जागती है, तो उसका संकेत हजारों साल पहले ही हमारे पूर्वजों ने दर्ज कर दिया था।


रिपोर्ट: दैनिक प्रभातवाणी टीम, उत्तरकाशी
स्थानीय साक्षात्कार, भूगर्भ वैज्ञानिक रिपोर्ट, ग्रामीण जनश्रुति