उत्तराखंड आपदा रिपोर्ट: बारिश और भूस्खलन से भारी तबाही, नुकसान ₹3,000 करोड़

उत्तराखंड आपदा रिपोर्ट: बारिश और भूस्खलन से भारी तबाही, नुकसान ₹3,000 करोड़
उत्तराखंड आपदा रिपोर्ट: बारिश और भूस्खलन से भारी तबाही, नुकसान ₹3,000 करोड़
देहरादून, 31 अगस्त (दैनिक प्रभातवाणी)
उत्तराखंड इस साल के मानसून की मार से कराह रहा है। पहाड़ों में लगातार हो रही भारी बारिश, भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ (फ्लैश फ्लड) ने राज्य की रफ़्तार थाम दी है। आपदा प्रबंधन विभाग की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि अब तक राज्य को करीब ₹3,000 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा है। इस तबाही ने न केवल सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को चपेट में लिया है, बल्कि गाँवों, खेतों और इंसानी ज़िंदगियों पर भी गहरी चोट की है।
मौत और लापता लोगों का आंकड़ा
रिपोर्ट के अनुसार, मानसून की अब तक की आपदाओं में:
75 लोगों की मौत हो चुकी है।
107 लोग घायल हैं।
95 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्य की भौगोलिक संरचना भूस्खलन और अचानक बाढ़ के लिए बेहद संवेदनशील है। हर साल की तरह इस बार भी बारिश ने कई परिवारों को बेसहारा कर दिया है।
सबसे ज़्यादा नुकसान बुनियादी ढांचे को
आर्थिक नुकसान का सबसे बड़ा हिस्सा सरकारी विभागों और योजनाओं को झेलना पड़ा है।
पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD): लगभग ₹554 करोड़ की क्षति।
ऊर्जा क्षेत्र: करीब ₹448 करोड़ का नुकसान।
सिंचाई विभाग: लगभग ₹445 करोड़ की हानि।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY): लगभग ₹415 करोड़ की क्षति।
राज्य के पहाड़ी हिस्सों में कई पुल बह गए हैं, सड़कें जगह-जगह धंस गई हैं और बिजली आपूर्ति ठप पड़ी है। दूरस्थ गाँवों का संपर्क अब भी कटा हुआ है।
आम जनता पर सीधी चोट
यह आपदा केवल सरकारी ढांचे तक सीमित नहीं रही।
1,828 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए।
229 मकान पूरी तरह ढह गए।
193 हेक्टेयर कृषि भूमि बर्बाद हो चुकी है।
गाँवों में कई परिवार बेघर हो गए हैं। किसानों की धान और मक्के की फसल बहकर चली गई है। सब्ज़ियों की खेती करने वाले भी पूरी तरह तबाह हो चुके हैं।
प्रशासन की चुनौतियाँ
आपदा की इस भयावह तस्वीर के बीच सरकार और प्रशासन के सामने राहत और पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती है।
SDRF और NDRF की टीमें प्रभावित इलाक़ों में लगातार तलाश और बचाव अभियान चला रही हैं।
मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता और घायलों के इलाज की व्यवस्था की जा रही है।
कई इलाक़ों में अस्थायी राहत शिविर खोले गए हैं, जहाँ भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था की गई है।
लेकिन पहाड़ी इलाक़ों में लगातार हो रही बारिश राहत कार्यों को मुश्किल बना रही है।
विशेषज्ञों की राय: जलवायु परिवर्तन की मार
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में ऐसी आपदाएँ केवल प्राकृतिक नहीं हैं, बल्कि बदलते जलवायु पैटर्न का भी परिणाम हैं।
मानसून का दबाव पहले से अधिक और अचानक होता जा रहा है।
ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों में जलस्तर अचानक बढ़ता है।
अनियोजित निर्माण और नदी-नालों के मार्ग में अतिक्रमण आपदा की तीव्रता बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि पर्यावरणीय संतुलन और निर्माण कार्यों में सावधानी नहीं बरती गई, तो आने वाले वर्षों में नुकसान की तीव्रता और बढ़ सकती है।
लोगों की पीड़ा और उम्मीद
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में हर गाँव आज अपने घाव गिन रहा है।
किसान कह रहे हैं —
“फसल बह गई, घर ढह गया, अब जीने के लिए सहारा सरकार से ही है।”
ग्रामीण महिलाएँ राहत शिविरों में बच्चों को संभाल रही हैं, बुज़ुर्ग मंदिरों में शरण ले रहे हैं और रोज़गार के लिए बाहर गए लोग अपने गाँव लौटकर मदद करने की कोशिश कर रहे हैं।
इन हालात में, लोगों की निगाहें अब सरकार और आपदा प्रबंधन एजेंसियों पर टिकी हैं।
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड की यह आपदा केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। यह दिखाती है कि पहाड़ी इलाक़े कितने संवेदनशील हैं और यहाँ विकास के नाम पर की जाने वाली लापरवाहियाँ किस कदर खतरनाक हो सकती हैं।
लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन ने साबित कर दिया है कि आपदा प्रबंधन की केवल घोषणा नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर तैयारी ज़रूरी है।
राज्य सरकार को चाहिए कि वह न केवल राहत और मुआवज़े की घोषणाएँ करे, बल्कि भविष्य के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनाए — ताकि “देवभूमि” उत्तराखंड हर साल मानसून की मार से कराहने के बजाय सुरक्षित और मज़बूत खड़ा हो सके।