हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महिला अभियंता सरिता गुप्ता की बहाली, मिलेगा वेतन और वरिष्ठता का लाभ

नैनीताल, 5 सितम्बर 2025 (दैनिक प्रभातवाणी ब्यूरो)।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य की सेवा व्यवस्था और महिला अधिकारों से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पेयजल निगम की कार्यकारी अभियंता सरिता गुप्ता को बहाल करने का आदेश दिया है। वर्ष 2024 में महिला आरक्षण कोटे के तहत नियुक्त सरिता गुप्ता को डोमिसाइल विवाद के कारण नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ उन्होंने अदालत की शरण ली और अब हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि यह गलती अभियंता की नहीं, बल्कि विभागीय विज्ञापन की थी।
मामला क्या था
पेयजल निगम ने 2024 में महिला आरक्षण कोटे के तहत भर्ती प्रक्रिया चलाई थी। इसी के अंतर्गत सरिता गुप्ता की नियुक्ति कार्यकारी अभियंता पद पर हुई। लेकिन बाद में डोमिसाइल को लेकर विवाद उठा और विभाग ने यह कहते हुए उनकी सेवाएँ समाप्त कर दीं कि वे आरक्षण के पात्र नहीं थीं। इस फैसले से सरिता गुप्ता न केवल अपनी नौकरी से वंचित हो गईं बल्कि उनका भविष्य भी अधर में लटक गया।
अदालत का रुख
सरिता गुप्ता ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि गलती अभियंता की ओर से नहीं थी। न्यायालय ने कहा कि विभागीय विज्ञापन ही त्रुटिपूर्ण था, जिसके कारण यह विवाद खड़ा हुआ। अभियंता ने नियमों के अनुसार आवेदन किया था और उनकी नियुक्ति विधि सम्मत थी। ऐसे में नौकरी से बर्खास्त करना अन्यायपूर्ण है।
बहाली का आदेश और लाभ
न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने आदेश दिया कि सरिता गुप्ता को उनके पद पर बहाल किया जाए। साथ ही उन्हें न केवल बकाया वेतन दिया जाएगा बल्कि वरिष्ठता का लाभ भी मिलेगा। इसका सीधा अर्थ है कि उनकी सेवा अवधि में कोई व्यवधान नहीं माना जाएगा और पदोन्नति सहित अन्य लाभ भी उन्हें प्राप्त होंगे।
महिला अधिकारों के दृष्टिकोण से अहम फैसला
यह फैसला महिला आरक्षण और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े कई सवालों को नई दिशा देता है। महिला अधिकार संगठनों ने अदालत के इस आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अक्सर आरक्षण को लेकर नियमों की अस्पष्टता के कारण योग्य महिलाओं को नुकसान उठाना पड़ता है। हाईकोर्ट का यह निर्णय इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए संवेदनशील रुख अपनाए हुए है।
सरकार और विभाग पर सवाल
अदालत के आदेश ने विभागीय कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विज्ञापन में स्पष्टता होती तो यह विवाद पैदा ही नहीं होता। अब सरकार और विभाग को सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में भर्ती विज्ञापनों में पारदर्शिता और सटीकता बरती जाए, ताकि किसी भी उम्मीदवार को अनावश्यक रूप से कठिनाई न झेलनी पड़े।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट का यह फैसला केवल सरिता गुप्ता की व्यक्तिगत जीत नहीं है बल्कि यह उन तमाम महिलाओं के लिए मिसाल है जो सरकारी सेवा में आरक्षण और भर्ती से जुड़ी अस्पष्टताओं का सामना करती हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि गलती विभागीय स्तर पर है तो उसकी कीमत उम्मीदवार को नहीं चुकानी पड़ेगी।