टिहरी झील क्षेत्र में पर्यटन विकास के लिए एशियाई विकास बैंक और भारत सरकार का ऋण समझौता

टिहरी, 13 सितम्बर | दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड का टिहरी झील क्षेत्र अब अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) की दिशा में एक नई पहचान बनाने जा रहा है। एशियाई विकास बैंक (ADB) और भारत सरकार के बीच ₹1,100 करोड़ के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत टिहरी झील और आसपास के इलाकों में पर्यावरण-अनुकूल और जलवायु-सहिष्णु पर्यटन अवसंरचना विकसित की जाएगी। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देना, रोजगार के अवसर सृजित करना और पर्यटन को लंबे समय तक टिकाऊ एवं संतुलित ढंग से बढ़ावा देना है।
ऋण समझौते का महत्व
एशियाई विकास बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह निवेश केवल पर्यटन के विकास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके जरिए ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर, बेहतर परिवहन सुविधाएँ, स्वच्छ ऊर्जा आधारित सेवाएँ और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियाँ भी लागू की जाएँगी। भारत सरकार का मानना है कि टिहरी झील क्षेत्र में सतत पर्यटन का विकास होने से यह क्षेत्र न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन का मॉडल बन सकता है।
भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि यह समझौता एक ऐसे समय पर हुआ है जब हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार संवेदनशील होता जा रहा है। टिहरी झील क्षेत्र का विकास केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है।
टिहरी झील: एक अप्रयुक्त संभावना
टिहरी झील का निर्माण टिहरी बांध परियोजना के बाद हुआ था और आज यह एशिया की सबसे बड़ी मानव-निर्मित झीलों में से एक है। हालांकि अब तक यह क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता से पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित नहीं हो पाया है। झील की प्राकृतिक खूबसूरती, शांत वातावरण और साहसिक खेलों की संभावनाएँ यहाँ मौजूद हैं, लेकिन अवसंरचना, निवेश और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण यह क्षेत्र पर्यटन के बड़े नक्शे पर अभी भी पीछे है।
ADB और भारत सरकार का यह समझौता इस कमी को दूर करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। अब झील के आसपास आधुनिक पर्यटन सुविधाएँ विकसित होंगी, जिससे यह क्षेत्र देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा।
पर्यावरण-अनुकूल और जलवायु-सहिष्णु परियोजना
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह सतत विकास की अवधारणा पर आधारित किया गया है।
पर्यटन ढांचे में सौर ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग होगा।
जल प्रबंधन और कचरा निस्तारण की आधुनिक तकनीक अपनाई जाएगी।
जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीन जोन बनाए जाएँगे।
जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों को ध्यान में रखते हुए आपदा-रोधी अवसंरचना खड़ी की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल टिहरी ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए सतत पर्यटन का मार्ग प्रशस्त करेगी।
स्थानीय लोगों की उम्मीदें
टिहरी झील क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से पर्यटन विकास की मांग कर रहे थे। उनका कहना है कि बांध बनने के बाद हजारों परिवार विस्थापित हुए और उन्हें नई जगह बसाया गया। कई लोगों की खेती की जमीन और पारंपरिक आजीविका खत्म हो गई। ऐसे में पर्यटन को विकसित करना उनके लिए नई आर्थिक संभावनाएँ खोल सकता है।
इस ऋण समझौते की घोषणा के बाद स्थानीय युवाओं में उत्साह देखा जा रहा है। उन्हें उम्मीद है कि साहसिक पर्यटन, होमस्टे, बोटिंग, वॉटर स्पोर्ट्स और पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलने से रोजगार के अवसर मिलेंगे और पलायन रुकेगा।
विशेषज्ञों की राय
पर्यटन और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कैसे लागू किया जाता है। यदि इसमें केवल कंक्रीट ढांचा खड़ा करने पर जोर दिया गया तो यह प्राकृतिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है। लेकिन यदि परियोजना में स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक स्थापत्य और पर्यावरणीय संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए आदर्श साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि झील के आसपास ईको-टूरिज्म सर्किट बनाया जाए, जिसमें ट्रेकिंग, कैम्पिंग, नेचर वॉक और स्थानीय भोजन व हस्तशिल्प का अनुभव शामिल हो। इससे पर्यटक केवल घूमने नहीं, बल्कि स्थानीय जीवन से जुड़ने का अनुभव भी प्राप्त करेंगे।
आर्थिक दृष्टि से लाभ
परियोजना के लागू होने के बाद टिहरी क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। पर्यटन विभाग का अनुमान है कि अगले पाँच वर्षों में यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो सकती है। इसका सीधा फायदा स्थानीय व्यापारियों, होटल संचालकों, ट्रांसपोर्टरों और कारीगरों को मिलेगा।
उत्तराखंड सरकार का दावा है कि इससे न केवल प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को आय का स्रोत मिलेगा। खासकर महिलाएँ और युवा इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकेंगे।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
हालांकि इस परियोजना से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं, लेकिन चुनौतियाँ भी गंभीर हैं। सबसे बड़ी चुनौती है – प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना। अगर पर्यटन अत्यधिक व्यावसायिक हो गया तो इससे झील और आसपास के पर्यावरण को नुकसान पहुँच सकता है।
दूसरी चुनौती है – स्थानीय समुदाय की भागीदारी। यदि विकास योजनाओं में स्थानीय लोगों की राय और ज़रूरतों को शामिल नहीं किया गया, तो इससे असंतोष और विवाद पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा, परियोजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण भी आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह राशि गलत हाथों में चली गई तो विकास के बजाय अव्यवस्था और प्रदूषण बढ़ सकता है।
भविष्य की तस्वीर
अगर यह परियोजना सही दिशा में लागू होती है, तो टिहरी झील न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए सतत पर्यटन का आदर्श मॉडल बन सकती है। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहसिक पर्यटन और इको-टूरिज्म का केंद्र बनेगा। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि उत्तराखंड की छवि भी एक जिम्मेदार और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन स्थल के रूप में बनेगी।
दैनिक प्रभातवाणी
एशियाई विकास बैंक और भारत सरकार के बीच हुआ यह ₹1,100 करोड़ का ऋण समझौता टिहरी झील क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है। यह समझौता केवल धन का लेन-देन नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्रयास है जो पर्यावरण, संस्कृति और अर्थव्यवस्था तीनों को साथ लेकर चलता है।
स्थानीय जनता की उम्मीदें, विशेषज्ञों की चेतावनियाँ और सरकार की योजनाएँ – इन सबका संतुलन साधना ही इस परियोजना की असली परीक्षा होगी। अगर यह पहल सफल हुई तो यह कहना गलत नहीं होगा कि टिहरी झील क्षेत्र आने वाले वर्षों में न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए सतत पर्यटन का चमकता हुआ प्रतीक बन जाएगा।