January 15, 2026

Heavy Rainfall Crisis: हर्सिल वैली में Apple Harvest ठप, Farmers को भारी नुकसान

Heavy Rainfall Crisis: हर्सिल वैली में Apple Harvest ठप, Farmers को भारी नुकसान
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हर्सिल घाटी, उत्तरकाशी । 20 सितंबर 2025 । दैनिक प्रभातवाणी । 

भारी मानसून और जंगली हमलों से हर्सिल घाटी के सेब किसान बिखराव के कगार पर

हर्सिल घाटी के सेब बागान इस मौसम एक गहरा संकट झेल रहे हैं। अचानक से बढ़ी बरसात, खराब मौसम, और नरभक्षियों के लगातार हमले—इन तमाम परिस्थितियों ने इस बार के कटान (harvest) को लगभग ठप कर दिया है। किसान और स्थानीय बासिंदे भारी आर्थिक हानि की आशंका जता रहे हैं, जबकि सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग बढ़ गई है।


मौसम की मार: बरसात और कटान का अटका पहिया

मानसून इस बार बहुत देर से आया, लेकिन जब आया तो भारी और लगातार बरसात लेकर आया। खेतों और बागों तक जाने वाले मार्ग की कीचड़, भूस्खलन, और ड्रेनेज की खराब स्थिति ने कटान की प्रक्रिया को लगभग बंद कर दिया है। बागों में सेब तो तैयार हैं, लेकिन उन्हें तोड़ कर बाजार भेजने का काम नहीं हो पा रहा है।

शहरों से आने वाले ठेकेदार भी बागों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं क्योंकि रास्तों की हालत बदतर हो गई है। घाटी के कई हिस्सों में सड़कें फिसलन और कीचड़ से असुरक्षित हो गई हैं, कई पुलों और पगडंडियों पर पानी भर जाने से पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है। इस वजह से श्रम शक्ति भी या तो सुरक्षित स्थिति की प्रतीक्षा कर रही है या कटानी कार्य स्थगित कर दिया गया है।


बाजार ठेकेदार नहीं आए – किसानों को पड़ी खोल

इसी बीच, बाजार से ठेकेदार (apple buyers / market contractors) नहीं आ रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति ने किसान की बेचैनी को बढ़ा दिया है क्योंकि कटायी नहीं होने वाले सेब बागों में अपने आप खराब होने लगे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मौसम के हालात स्पष्ट हैं लेकिन ठेकेदारों की कमी ने स्थिति को और खराब कर दिया है। पेड़ों पर लटके सेब, जब मौसम सुधरने की बजाय बरसात जारी रहती है, तो फफूंदी लगने, सड़ने, और जंगली जानवरों के निशाने पर आने लगते हैं।


नरभक्षी हमलों से फसल की तबाही

बड़ी समस्या यह है कि कटान न होने के कारण सेब पेड़ों पर लंबे समय तक लटक रहे हैं, और ये फलों को जंगली जानवरों के लिए आसान लक्ष्य बना देते हैं।

  • भालू रात के समय बागों में घुसकर पेड़ों पर लटके फलों को तोड़ देते हैं, और नीचे गिरने या नष्ट होने का बहुमत वहीं होता है।

  • तोते (और अन्य पक्षी) दिन के समय फलों की ऊपरी सतह पर चोट करते हैं, छेद करते हैं, जिससे फल जल्दी से खराब हो जाते हैं या बीमारी लग जाती है।

स्थानीय लोगों ने बताया है कि जो किसान अभी तक कुछ फल सुरक्षित बचा रहे थे, वे भी अब इन नरभक्षी हमलों से चिंतित हैं कि कल-परसों तक उनकी छोटी-छोटी बची फसल भी समाप्त न हो जाए।

वन विभाग ने इन शिकायतों पर ध्यान दिया है, और कुछ इलाकों में रात की पैदल-पेट्रोलिंग (night patrolling) बढ़ाने की पहल की है। लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि यह पर्याप्त नहीं है।


सेब की सपोर्ट प्राइस: पिछले दशक की मांग

किसानों ने यह भी आरोप लगाया है कि सेब की मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP / समर्थन मूल्य), जो कि सरकारी स्तर पर किसानों की लागत और लाभ सुनिश्चित करने के लिए लागू है, सबसे हाल में 2013 में तय की गयी थी और तब से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।

जब लागत-वृद्धि, मजदूरी, परिवहन खर्च, कंटेनर, किराया, और अन्य इनपुट लागतों का आंकलन किया जाए, तो वर्तमान समर्थन मूल्य किसान के लिए लाभहीन स्थिति उत्पन्न कर रहा है।

स्थानीय पंचायत और ग्राम प्रधानों ने राज्य सरकार से मांग की है कि या तो समर्थन मूल्य को तत्काल बढ़ाया जाए, या कटान और परिवहन में सहायता (subsidy / राहत पैकेज) दी जाए।


आर्थिक एवं सामाजिक प्रभाव

इस संकट का असर सिर्फ कृषि तक ही सीमित नहीं है:

  • आय का नुकसान: अधिकांश किसानों के लिए सेब की बिक्री प्रकृति की महत्वपूर्ण आय स्रोत है। कटान न हो पाने पर आय पूरी तरह से रुक सकती है या बहुत कम रह सकती है।

  • उधार और खर्च: किसान पहले से ही बगीचों की देखभाल, खाद-उर्वरक, मजदूरी आदि पर खर्च कर चुके हैं। अगर बिक्री न हो, तो ये खर्च बोझ बन जाएंगे।

  • आने वाले मौसम की चिंता: मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में बारिश जारी रहने की संभावना जताई है। इससे फसल और परिवहन दोनों पर असर संभावित है।


सरकारी एवं प्रशासनिक प्रतिक्रिया

स्थानीय प्रशासन और वन विभाग ने कुछ कदम उठाने शुरू किये हैं:

  1. वन विभाग ने रात की गश्त बढ़ाई है ताकि भालू और अन्य जंगली जानवरों से फसल की सुरक्षा हो सके।

  2. स्थानीय पंचायतों ने सरकार से टेलीफोन और अभियान के माध्यम से संपर्क कर तत्काल राहत कार्य की माँग की है।

  3. मौसम विभाग की चेतावनियाँ जारी हैं कि मानसून अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है; बारिश की भविष्यवाणी बनी हुई है।

हालाँकि, किसानों का कहना है कि ये कदम पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें चाहिए:

  • कटान के लिए सहायक संसाधन जैसे ट्रॉली, सामान उठाने के साधन, मजदूरों की उपलब्धता आदि।

  • परिवहन मार्गों की मरम्मत और रास्तों की स्थिति सुधारना।

  • समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि।

  • जंगली हमलों से बचाव के उपाय जैसे बाड़-फेंसिंग, त्रिपाल लगाना, जागरूकता कार्यक्रम आदि।


नज़रिया: क्या यह एकल घटना है?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि हर्सिल की यह समस्या आज की नहीं है, बल्कि मौसमी परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन, और हिमालयी क्षेत्र में मौसम पैटर्न में बदलाव के कारण वर्षों से भारी होती जा रही है। पिछले कुछ सालों में:

  • जाड़ों और ठंड का समय घटा है, जिससे ‘चिलिंग आवर्स’ कम हो रही हैं, जो सेब के फूल तथा फल दोनों के विकास के लिए जरूरी होते हैं।

  • अप्रत्याशित हिमपात, ओलावृष्टि, और मौसम की अनियमितता ने फल-फूल की स्थिति और उपज को प्रभावित किया है।

इसलिए, जो परेशानी आज हर्सिल में दिख रही है, वह स्थानीय मौसम की अनियमितताओं और लंबे समय से चली आ रही आवासीय, आर्थिक एवं कृषि संबंधी नीतियों की खामियों का संगम है।


क्या समाधान संभव है?

किसानों और विशेषज्ञों ने जो सुझाव दिए हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • तत्काल राहत पैकेज और मुआवजा: सरकार को किसानों को लागत के आधार पर मुआवजा देना चाहिए ताकि वे इस साल की हानि से उबर सकें।

  • MSP पुनरीक्षण: सेब के समर्थन मूल्य को पुनः मूल्यांकन करना चाहिए ताकि वह आज की मजदूरी, परिवहन लागत, खाद-खर्च आदि से संतुलित हो।

  • सड़क एवं बुनियादी ढाँचे की सुधार: कटान से पहले और दौरान बागों से बाजार तक की सड़कों, बाँध पुल, रास्तों की मरम्मत एवं पानी निकास प्रणाली का ठीक होना आवश्यक है।

  • जंगली जानवरों के नियंत्रण के उपाय: बाड़-फेंसिंग, जागरूकता, वन विभाग की गश्त बढ़ाना, और किसानों को बचाव के उपकरण उपलब्ध कराना।

  • मौसम-अनुकूल खेती की तकनीकें: जैसे कि मौसम पूर्वानुमान का अधिक उपयोग करना, ओलावृष्टि या अधिक बारिश की संभावना से बचाव हेतु नेट कवर, सूखा/अधिक नमी पर्यावरण में फल सड़ने से रोकने वाले संरक्षण उपाय।


दैनिक प्रभातवाणी

हर्सिल घाटी के सेब किसान इस समय गहरी चुनौती में हैं। मौसम की क्रूरता, जंगली हमले और सबल आर्थिक नीतियों की कमी ने खतरा खड़ा कर दिया है कि इस क्षेत्र की पारंपरिक सेब खेती ही संकटग्रस्त हो जाए। किसानों की मेहनत बरबाद हो सकती है, और खेतों में तैयार फल पेड़ों पर ही सड़ सकते हैं अगर सरकार और प्रशासन समय पर कारगर कदम न उठा सके।

लेकिन उम्मीद अभी भी बची है। यदि राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, वन विभाग और किसान मिलकर संगठित प्रयास करें, त्वरित राहत उपलब्ध कराएँ, नीतियों में सुधार करें और मौसम अनुकूल उपाय अपनाएं, तो इस संकट से उभरा जा सकता है। हर्सिल घाटी की सेब बगिया न सिर्फ घाटी की आर्थिक रीढ़ हैं, बल्कि हिमालयी जैव विविधता, संस्कृति और पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं—इसलिये इन्हें बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।