प्रतिरूप परीक्षा भ्रष्टाचार पर मुख्यमंत्री की चेतावनी: “नकल जिहादियों” की कुचालना होगी — UKSSSC घोटाले की निष्पक्ष SIT जांच का ऐलान
ajaysemalty98 September 26, 2025
देहरादून (उत्तराखंड), 26 सितंबर 2025
उत्तराखंड की राजनीति में परीक्षा व्यवस्था को शुद्ध करने की लड़ाई अब और तेज हुई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज एक सख्त संदेश जारी करते हुए राज्य में सक्रिय कोचिंग माफियाओं और नकल साजिशकर्ताओं को ‘नकल जिहाद’ कहकर चेतावनी दी। उनके अनुसार, ऐसे घनघोर अपराधियों को मिट्टी में मिला देने का काम किया जाएगा। इसके साथ ही, उन्होंने UKSSSC परीक्षा मामला उठाया और सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (SIT) की ज़िम्मेदारी का ऐलान किया, जो एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में जांच करेगा।
धामी के आक्रामक रवैये के पीछे यह कोशिश स्पष्ट है — परीक्षा प्रणाली से धांधली और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना। ऐसा कदम प्रदेश की युवा पीढ़ी की उम्मीदों का सम्मान करने का प्रयास है। लेकिन सवाल यह है: क्या सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त तैयारी की है, और क्या कांग्रेस या अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को राजनीति की आंच में ले जाएंगे?
कोचिंग-नकल माफिया पर निशाना: “नकल जिहादियों को मिट्टी में मिला देंगे”
मुख्यमंत्री धामी का यह बयान सिर्फ शब्दों का निवास नहीं है — यह एक निर्णायक अग्रिम युद्ध का संकेत है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब राज्य सरकार नकल साज़िश रचने वालों पर पूरी कड़ी कार्रवाई करेगी। उनके अनुसार, ये वे लोग हैं जो कोचिंग माफियाओं के साथ मिलकर युवाओं का भविष्य बर्बाद करना चाहते हैं।
धामी ने यह दावा भी किया कि अब तक 100 से अधिक आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है। यह संख्या यदि सत्य है, तो यह बताती है कि सरकार गंभीरता से इस मुद्दे पर कार्रवाई कर रही है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है — गड़बड़ करने वालों के खिलाफ आगे और कदम उठाए जाएंगे।
उनका संदेश साफ था: “नकल जिहादियों को मिट्टी में मिलाया जाएगा।” सरल शब्दों में, जो लोग शिक्षा व्यवस्था को भ्रष्ट करने की कोशिश करेंगे, सरकार उन्हें बख़्शने की मूड में नहीं है।
UKSSSC परीक्षा घोटाले: SIT जांच की बानगी
धामी ने UKSSSC (उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) परीक्षा मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने विशेष जांच दल (SIT) गठित किया है। इस दल की निगरानी एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की जाएगी, ताकि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हो सके।
SIT गठन का उद्देश्य यही है कि परीक्षा प्रक्रिया में लगे दोषियों का खुलासा हो, और आगे ऐसी गड़बड़ियों को रोकने की सर्वोत्तम व्यवस्था हो। धामी ने यह भी कहा कि इस जांच में किसी प्रकार का दबाव नहीं चलेगा — न्यायिक आदेशों के अनुरूप कार्रवाई होगी।
शिक्षा व्यवस्था की दशा: दोषी कौन और क्या सुधार संभव है?
मुख्यमंत्री की धमकी और SIT गठन की पहल दोनों ही निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह भी सवाल उठता है कि शिक्षा और भर्ती परीक्षा व्यवस्था की मौजूदा संरचनाएँ किन कमजोरियों से जूझ रही हैं:
परीक्षा कंडक्टिंग एजेंसियों की पारदर्शिता: अक्सर परीक्षा प्रक्रिया में सेटिंग, स्कोरिंग, उत्तर-पुस्तिका मूल्यांकन आदि में दोष सामने आते हैं।
रोल मॉडल कमजोरियां: जिनों ने परीक्षा प्रणाली को बदला, उन्हें पकड़ने का तंत्र कमजोर है।
कोचिंग-ट्यूशन उद्योग का दबाव: कोचिंग माफिया का बड़ा नेटवर्क है, जो छात्रों को परीक्षा की रणनीति सिखाते हैं — कभी-कभी अनैतिक तरीकों से भी।
अनुशासन की कमी: शिक्षा विभाग और परीक्षा आयोगों में निगरानी तंत्र सुदृढ़ नहीं।
शिक्षार्थियों में निराशा: सही परीक्षा पद्धति न हो तो छात्रों का विश्वास टूटता है।
इन चुनौतियों को देखते हुए, कुछ सुधार सुझाव संभव हैं:
कड़ी निगरानी और अचानक निरीक्षण: परीक्षा हॉलों, केन्द्रों और मूल्यांकन केंद्रों पर अचूक और अचानक निरीक्षण।
तकनीकी हस्तक्षेप: OMR, सील बंद पैकेजिंग, AI और ब्लॉकचेन जैसे उपकरणों का उपयोग।
स्वतंत्र परीक्षा निगरानी मंच: न्यायपालिका या उच्च शिक्षाविदों के नियंत्रण में एक मंच ताकि परीक्षा सम्पादन निष्पक्ष हो।
कोंचिंग उद्योग पर नियंत्रण: कोचिंग केंद्रों के शिक्षा सामग्री और पद्धति की पारदर्शिता आवश्यक।
नियमित समीक्षा एवं लोक अभिपुष्टि: परीक्षा प्रक्रिया पर अभ्यर्थियों और समाज की प्रतिक्रिया लेना।
कड़ी दंड व्यवस्था: दोषियों के खिलाफ शिक्षा सेवाओं से परित्याग या आजीवन प्रतिबंध तक की सजा की व्यवस्था।
राजनीति और सामाजिक संघर्ष का पक्ष
धामी की कठोरता राजनीतिक रेखा पर भी एक बड़ी चुनौती है। विपक्षी दल जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टियाँ या अन्य राजनीतिक घटक इस मुद्दे को चुनावी हथियार बना सकते हैं। वे सरकार पर आरोप लगा सकते हैं कि यह दिखावटी कदम है, या जांच में पक्षपात हो सकता है।
साथ ही, समाज में यह बहस उभर सकती है कि “नकल जिहाद” शब्दावली उचित है या नहीं — क्या इस तरह की महिला पुरुष, धर्म या सामाजिक समूहों को निशाना बनाती है? ऐसे शब्दों का उपयोग संवेदनशील सामाजिक संदर्भ ले सकता है।
छात्र-संघ और अभ्यर्थी संगठन भी सक्रिय होंगे। यदि उन्हें कार्रवाई में न्याय न मिले, तो आंदोलन और प्रदर्शन की संभावना उच्च है।
निष्कर्ष: अभिनव प्रयास या बड़े दावे?
मुख्यमंत्री धामी की चेतावनी और SIT गठन — दोनों ही कदम राहत देने वाले हैं। वे यह संकेत देते हैं कि सरकार परीक्षा व्यवस्था को सुधारने और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए गंभीर है। लेकिन कदमों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी:
क्या जांच पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता से होगी?
क्या दोषियों को न्यायालयों द्वारा समय पर और कठोर सजा दी जाएगी?
क्या शिक्षा व्यवस्था में जड़ से सुधार हो सकेगा — सिर्फ दंडात्मक कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं।
यदि इन कारकों पर सरकार ठोस नीति और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ती है, तो उत्तराखंड का यह संघर्ष शिक्षा के भ्रष्टाचार पर विजय की दिशा में मील का पत्थर बन सकता है।
जैसे उत्तराखंड की वादियाँ धूप-साए में बदलती हैं, वैसे ही इस पहल की आलोचना और समर्थन दोनों छाँव बनाए रखेंगे। एक बात स्पष्ट है — आज की यह घोषणा, समय की कसौटी पर खड़ी होगी।