देहरादून की 26 किमी सड़क परियोजना पर मचा बवाल: विकास बनाम पर्यावरण की जंग
ajaysemalty98 September 26, 2025
देहरादून (उत्तराखंड), 26 सितंबर 2025, दैनिक प्रभातवाणी —
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून एक बार फिर विकास और पर्यावरण के टकराव का केंद्र बन गई है। राज्य सरकार ने शहर में यातायात दबाव कम करने के उद्देश्य से 26 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजना का प्रस्ताव रखा है। यह सड़क रीस्पाना और बिंदल नदियों के ऊपर तथा किनारों से होकर बनाई जानी है। सरकार का दावा है कि यह परियोजना देहरादून के बढ़ते ट्रैफिक को राहत देगी और शहर की कनेक्टिविटी को नया आयाम देगी। लेकिन जैसे ही इस योजना की जानकारी सार्वजनिक हुई, स्थानीय निवासियों, पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने इसे “प्राकृतिक संतुलन पर बड़ा हमला” बताते हुए जोरदार विरोध शुरू कर दिया।
परियोजना का स्वरूप और सरकारी तर्क
सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, यह सड़क रीस्पाना और बिंदल नदियों के किनारों और कई हिस्सों में सीधे उनके ऊपर बने पथ से गुज़रेगी। परियोजना का मुख्य उद्देश्य शहर के भीतर एक वैकल्पिक मार्ग तैयार करना है जिससे राजपुर रोड, हरिद्वार रोड और अन्य प्रमुख मार्गों पर यातायात का दबाव कम हो सके। राजधानी बनने के बाद से देहरादून की जनसंख्या और वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण शहर की सड़कों पर रोज़ाना लंबे जाम लगते हैं।
शहरी विकास विभाग का कहना है कि 26 किमी की यह सड़क न केवल ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान पेश करेगी, बल्कि नए व्यावसायिक और आवासीय इलाकों को भी शहर के मुख्य मार्गों से जोड़ने में मदद करेगी। अधिकारियों का तर्क है कि परियोजना को पर्यावरणीय मानकों के अनुसार तैयार किया जाएगा और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को कोई नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
विरोध की लहर: पर्यावरणीय संकट की आशंका
सरकार के दावों के बावजूद, परियोजना ने देहरादून के नागरिकों और पर्यावरणविदों को चिंतित कर दिया है। विरोध करने वालों का कहना है कि यह सड़क रीस्पाना और बिंदल नदियों की पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। ये दोनों नदियाँ न केवल देहरादून की जल-धारा प्रणाली का अहम हिस्सा हैं, बल्कि शहर के भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और प्राकृतिक जल निकासी के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
1. बाढ़ और जलभराव का खतरा
रीस्पाना और बिंदल नदियाँ पहले ही मानसून के दौरान उफान पर रहती हैं। नदियों के ऊपर सड़क निर्माण से उनके प्राकृतिक प्रवाह में रुकावट आएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बारिश के मौसम में बाढ़ और शहरी जलभराव का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। नदी के किनारों पर पहले से हो रहा अतिक्रमण भी इस जोखिम को और बढ़ा देगा।
2. पारिस्थितिक संतुलन को नुकसान
दोनों नदियों के किनारे बड़ी संख्या में पेड़-पौधे, पक्षी, मछलियाँ और अन्य जलजीव निवास करते हैं। सड़क निर्माण के दौरान भारी मशीनों और कंक्रीट संरचनाओं के कारण इन जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो सकते हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह परियोजना देहरादून की जैव विविधता को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकती है।
3. भूजल स्तर पर असर
रीस्पाना और बिंदल नदियाँ देहरादून के भूजल पुनर्भरण का प्रमुख स्रोत हैं। इनके ऊपर पक्की संरचना बनने से जल का स्वाभाविक रिसाव रुक सकता है, जिससे भूजल स्तर गिरने का खतरा है। पहले से ही तेज़ शहरीकरण और लगातार बढ़ते बोरवेल के कारण देहरादून के कई इलाकों में जलस्तर गिर रहा है। यह परियोजना इस समस्या को और गहरा सकती है।
4. हरियाली और वायु प्रदूषण
सड़क निर्माण के लिए नदी किनारे की हरियाली और पेड़ों की कटाई लगभग तय है। इससे शहर में प्रदूषण बढ़ेगा और गर्मी के दिनों में तापमान में बढ़ोतरी हो सकती है। स्थानीय निवासी पहले ही वायु गुणवत्ता में गिरावट को लेकर चिंतित हैं।
जनता का विरोध: आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार
जैसे-जैसे परियोजना की जानकारी सामने आई, देहरादून के विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज़ होने लगे हैं। सामाजिक संगठनों और छात्रों ने नदियों के किनारे मानव शृंखला बनाकर प्रतीकात्मक विरोध किया। कई स्थानों पर स्थानीय लोग धरने पर बैठे और “नदी बचाओ, शहर बचाओ” जैसे नारे लगाए।
रीस्पाना संरक्षण समिति के सदस्य संजय थपलियाल ने दैनिक प्रभातवाणी से कहा, “सरकार विकास के नाम पर हमारी नदियों को बलि चढ़ा रही है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र का विनाश होगा। सरकार को पहले ट्रैफिक प्रबंधन सुधारने और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।”
विरोध करने वालों का यह भी कहना है कि सरकार ने इस परियोजना को लेकर अभी तक कोई खुली जनसुनवाई नहीं की है। उनका आरोप है कि लोगों की राय लिए बिना परियोजना को आगे बढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
सरकार की सफाई: “परियोजना को हरित मानकों पर बनाया जाएगा”
राज्य सरकार का कहना है कि सड़क परियोजना पर काम अभी शुरुआती चरण में है। शहरी विकास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि “विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) तैयार किए जा रहे हैं। निर्माण तभी शुरू होगा जब सभी आवश्यक मंजूरियाँ और जनसुनवाई पूरी हो जाएगी।”
मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी बयान जारी कर कहा कि परियोजना को राष्ट्रीय पर्यावरण नियमों के अनुसार तैयार किया जाएगा। “जनता की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए डिजाइन में बदलाव संभव है, ताकि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को कोई नुकसान न पहुंचे,” बयान में कहा गया।
विशेषज्ञों की राय: विकास के लिए वैकल्पिक रास्ते
पर्यावरणविदों और शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि देहरादून की यातायात समस्या का हल नई सड़कें बनाना नहीं है। उनके अनुसार, शहर में पहले से मौजूद मार्गों का चौड़ीकरण, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, और इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देना अधिक टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
पर्यावरण कार्यकर्ता और भूजल विशेषज्ञ डॉ. रेखा रावत का कहना है, “यदि सरकार ने भूजल पुनर्भरण और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को नुकसान पहुँचाया, तो आने वाले समय में जल संकट और बाढ़ दोनों की समस्या गंभीर हो जाएगी। सड़क निर्माण से अल्पकालिक राहत मिलेगी, लेकिन दीर्घकालिक संकट बढ़ेगा।”
शहर के इतिहास से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा
रीस्पाना और बिंदल नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि देहरादून की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। पुराने समय में ये नदियाँ शहर की जीवनरेखा मानी जाती थीं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इन नदियों का पानी कभी इतना साफ था कि लोग पीने तक के लिए इस्तेमाल करते थे। आज शहरी कचरे और सीवेज के कारण इनका जल पहले ही प्रदूषित हो चुका है। अब अगर इनके ऊपर पक्की सड़क बना दी गई, तो भविष्य में इन नदियों को पुनर्जीवित करने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी।
दैनिक प्रभातवाणी : संतुलित विकास की जरूरत
देहरादून की 26 किमी सड़क परियोजना केवल एक सड़क निर्माण योजना नहीं है, बल्कि यह विकास और संरक्षण के बीच खड़े जटिल प्रश्न को सामने लाती है। एक ओर सरकार यातायात समस्या का समाधान और आर्थिक विकास का तर्क दे रही है, तो दूसरी ओर पर्यावरणविद यह चेतावनी दे रहे हैं कि यह परियोजना शहर के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थायी घाव छोड़ सकती है।
दैनिक प्रभातवाणी का मानना है कि सरकार को इस योजना को आगे बढ़ाने से पहले व्यापक जनसुनवाई, स्वतंत्र पर्यावरणीय अध्ययन और दीर्घकालिक शहरी नियोजन पर जोर देना चाहिए। विकास तभी सार्थक है जब वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संपदाओं को सुरक्षित रख सके। यदि जल्दबाजी में यह परियोजना लागू की गई, तो यह देहरादून ही नहीं, पूरे उत्तराखंड के पर्यावरणीय भविष्य को खतरे में डाल सकती है।
सरकार के सामने चुनौती साफ है—क्या वह शहर की भीड़भाड़ कम करने के लिए नदियों को बलि चढ़ाएगी, या कोई ऐसा रास्ता चुनेगी जिससे विकास और पर्यावरण, दोनों साथ चल सकें? यही फैसला आने वाले समय में देहरादून की पहचान और उसके प्राकृतिक अस्तित्व को तय करेगा।