Spread the loveदेहरादून, 16 मार्च | दैनिक प्रभातवाणीदेहरादून में रविवार को सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का ऐतिहासिक मिलन समारोह आयोजित किया गया। शहर के मिलन गार्डन में हुए इस भव्य आयोजन में समाज के सैकड़ों लोग एकत्र हुए और अपनी प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया। इस अवसर पर समाज के वरिष्ठ सदस्यों, बुद्धिजीवियों और युवा पीढ़ी ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और सरोला ब्राह्मण समाज की पहचान तथा अधिकारों से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा की।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सुरेंद्र मैठाणी उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में टिहरी के राजपरिवार से जुड़े भवानी प्रताप शाह ने समारोह में भाग लेकर आयोजन की गरिमा बढ़ाई। सरोला गढ़वाली ब्राह्मण संगठन के अध्यक्ष विजय थपलियाल, सचिव सुरेंद्र प्रसाद डिमरी, कोषाध्यक्ष नरेंद्र बिजल्वाण और सहायक कोषाध्यक्ष सत्य प्रसाद खंडूड़ी सहित समाज के कई पदाधिकारी और वरिष्ठ सदस्य कार्यक्रम में मौजूद रहे। इसके अलावा सुशील नौटियाल, कुलदीप गैरोला, राजेंद्र मोहन नौटियाल समेत समाज के अनेक गणमान्य लोग इस आयोजन का हिस्सा बने। कार्यक्रम का संचालन जगदंबा प्रसाद डिमरी ने किया।इस सम्मेलन की सबसे विशेष बात यह रही कि लगभग 121 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का इस तरह का बड़ा अधिवेशन आयोजित किया गया। आयोजन में करीब साढ़े तीन सौ से अधिक सरोला ब्राह्मणों ने भाग लिया और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि इतने लंबे समय बाद एक मंच पर एकत्र होना अपने आप में ऐतिहासिक क्षण है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।सम्मेलन में वक्ताओं ने सरोला ब्राह्मण समाज के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि गढ़वाल क्षेत्र में इस समाज की एक विशिष्ट पहचान रही है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार सरोला ब्राह्मण प्रतिष्ठित और पौराणिक मंदिरों के गर्भगृह में पूजा-अर्चना करने के लिए अधिकृत माने जाते रहे हैं। इसके साथ ही मंदिरों में भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोग को तैयार करने की जिम्मेदारी भी परंपरागत रूप से इसी समाज के लोगों द्वारा निभाई जाती रही है।सरोला ब्राह्मणों द्वारा तैयार भोजन को समाज के सभी वर्गों द्वारा सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। विवाह समारोहों, धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक दैवीय आयोजनों में भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी भी इसी वर्ग के लोगों से जुड़ी रही है, जो इस समाज की सांस्कृतिक भूमिका और प्रतिष्ठा को दर्शाती है।कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यह भी कहा कि आधुनिक समय में सामाजिक संरचनाएं तेजी से बदल रही हैं और नई पीढ़ी का जीवनशैली भी पहले की तुलना में अलग हो गया है। ऐसे समय में सदियों पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखना समाज की एक बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से दूर होती चली गईं, तो सरोला ब्राह्मण समाज की विशिष्ट पहचान कमजोर पड़ सकती है।समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि सरोला ब्राह्मण होना एक जन्मिक पहचान मानी जाती है, जिसमें माता और पिता दोनों का सरोला वर्ग से होना आवश्यक समझा जाता है। इसी परंपरा के आधार पर समाज की विशिष्ट श्रृंखला और सांस्कृतिक पहचान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।इस अवसर पर गणेश सेमल्टी, विजय प्रकाश बिजल्वाण, उषा नौटियाल, शीला थपलियाल और विजय लक्ष्मी थपलियाल सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में समाज की एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के लिए सामूहिक रूप से संकल्प लिया गया। Post Views: 8 Post navigationपिथौरागढ़ में भीषण सड़क हादसा: गहरी खाई में गिरी कार, सेना के जवान समेत 3 युवकों की मौत, 1 गंभीर रूप से घायल ऋषिकेश में अंतरराष्ट्रीय योग महोत्सव का भव्य शुभारंभ, देश-विदेश से पहुंचे योग साधक
देहरादून, 16 मार्च | दैनिक प्रभातवाणीदेहरादून में रविवार को सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का ऐतिहासिक मिलन समारोह आयोजित किया गया। शहर के मिलन गार्डन में हुए इस भव्य आयोजन में समाज के सैकड़ों लोग एकत्र हुए और अपनी प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया। इस अवसर पर समाज के वरिष्ठ सदस्यों, बुद्धिजीवियों और युवा पीढ़ी ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और सरोला ब्राह्मण समाज की पहचान तथा अधिकारों से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा की।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि सुरेंद्र मैठाणी उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में टिहरी के राजपरिवार से जुड़े भवानी प्रताप शाह ने समारोह में भाग लेकर आयोजन की गरिमा बढ़ाई। सरोला गढ़वाली ब्राह्मण संगठन के अध्यक्ष विजय थपलियाल, सचिव सुरेंद्र प्रसाद डिमरी, कोषाध्यक्ष नरेंद्र बिजल्वाण और सहायक कोषाध्यक्ष सत्य प्रसाद खंडूड़ी सहित समाज के कई पदाधिकारी और वरिष्ठ सदस्य कार्यक्रम में मौजूद रहे। इसके अलावा सुशील नौटियाल, कुलदीप गैरोला, राजेंद्र मोहन नौटियाल समेत समाज के अनेक गणमान्य लोग इस आयोजन का हिस्सा बने। कार्यक्रम का संचालन जगदंबा प्रसाद डिमरी ने किया।इस सम्मेलन की सबसे विशेष बात यह रही कि लगभग 121 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद सरोला गढ़वाली ब्राह्मण समाज का इस तरह का बड़ा अधिवेशन आयोजित किया गया। आयोजन में करीब साढ़े तीन सौ से अधिक सरोला ब्राह्मणों ने भाग लिया और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने का संकल्प लिया। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि इतने लंबे समय बाद एक मंच पर एकत्र होना अपने आप में ऐतिहासिक क्षण है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।सम्मेलन में वक्ताओं ने सरोला ब्राह्मण समाज के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि गढ़वाल क्षेत्र में इस समाज की एक विशिष्ट पहचान रही है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार सरोला ब्राह्मण प्रतिष्ठित और पौराणिक मंदिरों के गर्भगृह में पूजा-अर्चना करने के लिए अधिकृत माने जाते रहे हैं। इसके साथ ही मंदिरों में भगवान को अर्पित किए जाने वाले भोग को तैयार करने की जिम्मेदारी भी परंपरागत रूप से इसी समाज के लोगों द्वारा निभाई जाती रही है।सरोला ब्राह्मणों द्वारा तैयार भोजन को समाज के सभी वर्गों द्वारा सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। विवाह समारोहों, धार्मिक अनुष्ठानों और सामूहिक दैवीय आयोजनों में भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी भी इसी वर्ग के लोगों से जुड़ी रही है, जो इस समाज की सांस्कृतिक भूमिका और प्रतिष्ठा को दर्शाती है।कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यह भी कहा कि आधुनिक समय में सामाजिक संरचनाएं तेजी से बदल रही हैं और नई पीढ़ी का जीवनशैली भी पहले की तुलना में अलग हो गया है। ऐसे समय में सदियों पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखना समाज की एक बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से दूर होती चली गईं, तो सरोला ब्राह्मण समाज की विशिष्ट पहचान कमजोर पड़ सकती है।समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि सरोला ब्राह्मण होना एक जन्मिक पहचान मानी जाती है, जिसमें माता और पिता दोनों का सरोला वर्ग से होना आवश्यक समझा जाता है। इसी परंपरा के आधार पर समाज की विशिष्ट श्रृंखला और सांस्कृतिक पहचान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।इस अवसर पर गणेश सेमल्टी, विजय प्रकाश बिजल्वाण, उषा नौटियाल, शीला थपलियाल और विजय लक्ष्मी थपलियाल सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में समाज की एकता, सांस्कृतिक संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से जोड़ने के लिए सामूहिक रूप से संकल्प लिया गया।