January 14, 2026

उत्तराखंड में भारी बारिश से डेंगू का खतरा बढ़ा: जनस्वास्थ्य पर गहराता संकट

उत्तराखंड में भारी बारिश से डेंगू का खतरा बढ़ा: जनस्वास्थ्य पर गहराता संकट
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दैनिक प्रभातवाणी | विशेष रिपोर्ट
(रिपोर्ट: 26 जुलाई 2025 | लंबाई: लगभग 2000 शब्द)

उत्तराखंड में भारी बारिश से डेंगू का खतरा बढ़ा: जनस्वास्थ्य पर गहराता संकट

उत्तराखंड, जहाँ एक ओर चारधाम यात्रा और मानसून की वर्षा धार्मिक और कृषि जीवन के लिए वरदान मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर यही वर्षा अब राज्य में डेंगू और अन्य जलजनित बीमारियों के रूप में अभिशाप बनती जा रही है। जुलाई 2025 के दूसरे पखवाड़े में भारी बारिश के चलते डेंगू के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। खासकर देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, ऊधमसिंहनगर और पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में हालात चिंताजनक बने हुए हैं। राज्य के कई शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जलजमाव, साफ-सफाई की कमी और अनियंत्रित मच्छर प्रजनन से डेंगू वायरस के प्रसार को बल मिला है।


डेंगू के बढ़ते आँकड़े: स्वास्थ्य महकमे की नींद उड़ी

राज्य स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2025 में अब तक डेंगू के 1,732 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से अकेले देहरादून जिले में 587 केस, हरिद्वार में 421, नैनीताल में 293, ऊधमसिंहनगर में 261 और पौड़ी गढ़वाल में 170 से अधिक मामलों की पुष्टि हुई है। यह आंकड़े पिछले साल की तुलना में 38% अधिक हैं, जो संकेत करते हैं कि डेंगू इस वर्ष पहले से अधिक आक्रामक रूप में फैल रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, डेंगू फैलाने वाला Aedes aegypti मच्छर दिन में काटता है और साफ़ पानी में पनपता है। भारी बारिश के कारण खुले कंटेनर, जलजमाव, कूड़ा स्थलों पर पानी भरने जैसी स्थितियाँ उसकी संख्या को तेजी से बढ़ा रही हैं।


भारी बारिश से उत्पन्न हुईं गंभीर स्थितियाँ

उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में पिछले दो सप्ताह से लगातार हो रही मूसलधार बारिश से सामान्य जनजीवन प्रभावित है। देहरादून, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी जिलों में जगह-जगह भूस्खलन, सड़कें बंद, और पेयजल स्रोत दूषित होने की खबरें आई हैं। जलभराव ने जहां आवाजाही में कठिनाई पैदा की है, वहीं यही पानी मच्छरों के लिए breeding ground बन चुका है।

गांवों से लेकर शहरों तक की जल निकासी व्यवस्था असफल सिद्ध हो रही है। कई अस्पतालों और स्कूलों तक में पानी भर गया है। देहरादून के पटेलनगर, प्रेमनगर और नेहरू कॉलोनी जैसी घनी बस्तियों में हालात बेहद गंभीर हैं।


गॉरिकुंड और चारधाम मार्ग पर बिगड़े हालात

गौरिकुंड, जो केदारनाथ यात्रा का प्रमुख पड़ाव है, वहां भी भारी भीड़ और अधूरी सीवेज व्यवस्थाओं ने संक्रमण फैलने की संभावनाएं बढ़ा दी हैं। हाल ही में परीक्षणों में गॉरिकुंड के नाले के पानी में फेकल कोलिफॉर्म का स्तर 4.9 मिलियन MPN/100ml पाया गया, जो कि केंद्रीय मानकों (2500 MPN/100ml) से हज़ारों गुना ज़्यादा है। यह स्थिति तीर्थयात्रियों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए खतरे की घंटी है।

चारधाम मार्ग की कटाई और निर्माण कार्यों से उपजे भूस्खलन, मलबा जमाव, और अस्थायी जलजमाव की स्थिति ने डेंगू की समस्या को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 80% से ज़्यादा लैंडस्लाइड्स हाईवे के 100 मीटर के भीतर हुई हैं, जिससे पर्यावरणीय अस्थिरता बढ़ी है।


डेंगू की वजह से अस्पतालों में दबाव

राज्य के प्रमुख अस्पतालों जैसे AIIMS ऋषिकेश, दून मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी बेस हॉस्पिटल और जिला अस्पतालों में डेंगू के मरीजों की भीड़ लग गई है। कई मरीजों को बेड उपलब्ध नहीं हो पा रहे। स्वास्थ्य विभाग ने अतिरिक्त बेड्स और डेंगू वार्ड्स तैयार किए हैं, लेकिन संसाधनों की कमी सामने आ रही है।

AIIMS ऋषिकेश के एक वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अनिल पुंडीर के अनुसार, “इस बार डेंगू के मरीजों में ब्लड प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट, तेज़ बुखार, और त्वचा पर चकत्ते जैसी गंभीर लक्षण देखे जा रहे हैं, जो कि वायरस की म्यूटेशन या दूसरी स्ट्रेन की ओर इशारा करते हैं।”


स्कूलों में एहतियात, लेकिन जोखिम बना हुआ

राज्य सरकार ने प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों को निर्देश जारी किए हैं कि कक्षाओं में मच्छररोधी उपाय जैसे मच्छरदानी, स्प्रे और बच्चों के लिए लंबी आस्तीन के कपड़े पहनना सुनिश्चित करें। कई स्कूलों ने पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में बच्चों को सुबह खाली पेट बाहर न भेजने और पर्याप्त पानी पीने की सलाह दी है।

लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में न तो उचित सफाई है, न मच्छर-रोधी साधन। ऐसे में बच्चों में डेंगू फैलने का खतरा बना हुआ है।


सरकार और प्रशासन के प्रयास

डेंगू नियंत्रण के लिए राज्य सरकार ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  1. डेंगू नियंत्रण सेल का गठन: हर जिले में स्थानीय अधिकारियों की निगरानी में।

  2. फॉगिंग और एंटी-लार्वा स्प्रे अभियान: नगर निगमों को निर्देशित किया गया है।

  3. पेयजल स्रोतों की निगरानी: जल संस्थानों को क्लोरीन और साफ-सफाई सुनिश्चित करने के आदेश।

  4. जनजागरूकता अभियान: मच्छरदानी के प्रयोग, पानी जमाव न होने देने और शुरुआती लक्षणों पर तुरंत इलाज की अपील।

हालांकि, कई जगह ये अभियान केवल कागज़ों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि “फॉगिंग नाममात्र को होती है और मोहल्लों में गंदा पानी दिनों तक जमा रहता है।”


विशेषज्ञों की राय

AIIMS ऋषिकेश, वाडिया इंस्टीट्यूट और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जल-जमाव, सीवेज की विफलता, और अनियंत्रित शहरीकरण डेंगू की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदलने से मच्छर का प्रजनन काल लंबा हो गया है।

WHO और ICMR की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर राज्यों में डेंगू अब केवल शहरी नहीं, बल्कि ग्रामीण समस्या बन चुका है। यह एक नई चेतावनी है।


जनता क्या करे: सावधानी ही बचाव

डेंगू से बचाव के लिए निम्नलिखित उपायों को अपनाना जरूरी है:

  • पानी जमा न होने दें – कूलर, गमले, ड्रम आदि को खाली रखें या ढकें।

  • पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें।

  • मच्छरदानी और रिपेलेंट्स का नियमित प्रयोग करें।

  • तेज बुखार, सिरदर्द, आँखों के पीछे दर्द, उल्टी जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत जांच करवाएं।

  • प्लेटलेट काउंट पर ध्यान दें और डॉक्टर से परामर्श लें।


निष्कर्ष: सतर्कता ही समाधान

डेंगू की वर्तमान स्थिति उत्तराखंड के लिए केवल एक मौसमी स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह राज्य की प्राकृतिक आपदा, जलवायु परिवर्तन, और नगरीय अव्यवस्था का साझा नतीजा है। यदि तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या जनस्वास्थ्य संकट में बदल सकती है।

राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय निकाय और आम जनता को मिलकर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। मानसून के बाकी बचे महीनों में डेंगू का खतरा और भी बढ़ सकता है – ऐसे में सावधानी ही सुरक्षा है।