उत्तराखंड सरकार ने मदरसा एक्ट को निरस्त कर, अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं को देगा समान दर्जा

देहरादून, 18 अगस्त 2025
उत्तराखंड सरकार ने मदरसा एक्ट को निरस्त कर, अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थाओं को देगा समान दर्जा
उत्तराखंड सरकार ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए प्रदेश में वर्ष 2007 से लागू मदरसा एक्ट को निरस्त करने की घोषणा की है। राज्य सरकार का कहना है कि मदरसा एक्ट की जगह अब एक नया विधेयक ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक, 2025’ लाया जाएगा, जो सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को समान दर्जा प्रदान करेगा। इस नए विधेयक के लागू होने से सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी समुदायों के विद्यालय और शिक्षण संस्थान भी अब अल्पसंख्यक संस्थाओं की श्रेणी में शामिल होंगे। यह विधेयक आगामी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा।
सरकार के इस निर्णय को शिक्षा जगत और अल्पसंख्यक समुदायों ने स्वागत योग्य कदम के रूप में देखा है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य में सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को समान अवसर और संरक्षण प्रदान करना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि केवल मदरसों तक विशेषाधिकार सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों की शैक्षिक संस्थाओं को समान दर्जा मिलना चाहिए।
मदरसा एक्ट
उत्तराखंड में मदरसा एक्ट वर्ष 2007 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य मदरसों को राज्य मान्यता देना और उनके पाठ्यक्रम, शिक्षक नियुक्ति, और प्रशासनिक ढांचे को सुव्यवस्थित करना था। इस एक्ट के तहत मदरसों को अल्पसंख्यक संस्थाओं का विशेष दर्जा प्राप्त था, जिससे उन्हें सरकारी अनुदान और विभिन्न सुविधाओं का लाभ मिलता था।
हालांकि, समय के साथ यह देखा गया कि केवल मदरसों तक इस विशेषाधिकार को सीमित रखने से अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों में असंतोष पैदा हुआ। सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों के संस्थान समान सुविधाओं के लिए लगातार सरकार के समक्ष मांग करते रहे।
नया विधेयक: उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक, 2025
उत्तराखंड सरकार अब इस असमानता को दूर करने के लिए एक नया विधेयक लेकर आ रही है। ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक, 2025’ के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
समान दर्जा: मदरसों के समान, अब सभी अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को भी अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान किया जाएगा।
सरकारी अनुदान और सहायता: इन संस्थानों को अब विभिन्न सरकारी योजनाओं और अनुदानों का लाभ मिलेगा।
प्रशासनिक स्वतंत्रता: संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम और प्रशासनिक ढांचे में अधिक स्वतंत्रता दी जाएगी, जबकि शिक्षा के मानक सुनिश्चित किए जाएंगे।
पारदर्शिता और निगरानी: अल्पसंख्यक संस्थानों के संचालन में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए विशेष प्रावधान होंगे।
समावेशिता: यह विधेयक सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समेटने वाला है और किसी भी समुदाय के प्रति पक्षपात नहीं करेगा।
शिक्षा जगत और सामाजिक प्रतिक्रिया
शिक्षा विशेषज्ञों ने इस कदम को स्वागत योग्य बताया है। प्रोफेसर राधिका शुक्ला, शिक्षा नीति विशेषज्ञ, ने कहा, “उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय अल्पसंख्यक समुदायों के बीच समानता और अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे समाज में सामंजस्य और एकता को भी बल मिलेगा।”
सिख समुदाय के प्रतिनिधि गुरविंदर सिंह ने कहा, “हमारे स्कूलों को मदरसों जैसी सुविधा मिलना शिक्षा के क्षेत्र में हमारे बच्चों के लिए नए अवसर खोलेगा। यह निर्णय हमारे लिए ऐतिहासिक है।” इसी प्रकार जैन और बौद्ध समुदायों के प्रतिनिधियों ने भी इस कदम का स्वागत किया और इसे न्यायसंगत बताया।
राजनीतिक दृष्टिकोण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय न केवल सामाजिक न्याय की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आगामी चुनावों में अल्पसंख्यक मतदाताओं का विश्वास जीतने का भी एक रणनीतिक कदम हो सकता है। विपक्ष ने फिलहाल इस निर्णय पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की है, बल्कि इसे सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में सुधार की दिशा में पहल की है।
विधेयक के लागू होने के प्रभाव
नए विधेयक के लागू होने से राज्य के शिक्षा ढांचे में कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार: अल्पसंख्यक संस्थानों को सरकारी मान्यता और सहायता मिलने से उनकी शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार होगा।
असमानता का अंत: अब केवल मदरसों तक विशेषाधिकार सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को समान दर्जा मिलेगा।
छात्रों के लिए अवसर: छात्रों को बेहतर संसाधन, आधुनिक शिक्षण उपकरण और वित्तीय सहायता मिलेगी, जिससे उनकी शिक्षा में सुधार होगा।
समाज में सौहार्द्र: सभी अल्पसंख्यक समुदायों के बीच समानता होने से समाज में सहयोग और सौहार्द्र की भावना बढ़ेगी।
सरकार का संदेश
मुख्यमंत्री ने कहा, “शिक्षा किसी भी समाज का सबसे बड़ा स्तंभ है। हमारा उद्देश्य है कि हर बच्चे को शिक्षा के समान अवसर मिले। इस विधेयक के माध्यम से हम अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षिक संस्थानों को समान अधिकार दे रहे हैं। यह केवल सरकारी पहल नहीं, बल्कि समाज में समानता और न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
आलोचनात्मक दृष्टिकोण
हालांकि इस निर्णय का स्वागत अधिकांश समुदायों ने किया है, कुछ शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून लाकर समानता नहीं लाई जा सकती। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि नए विधेयक के लागू होने के बाद सभी संस्थान समान रूप से लाभान्वित हों और इसका वास्तविक प्रभाव छात्रों तक पहुंचे।
डॉ. अरविंद कुमार, शिक्षा नीति विश्लेषक, कहते हैं, “कानून तो केवल एक ढांचा है। इसका वास्तविक मूल्य तभी समझ में आएगा जब संसाधन, शिक्षक प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम में सुधार के माध्यम से छात्रों तक इसका लाभ पहुंचे।”
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड में मदरसा एक्ट को निरस्त कर और नया ‘अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान विधेयक, 2025’ लाकर सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। इस कदम से न केवल मदरसों के साथ अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों की असमानता समाप्त होगी, बल्कि राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर और गुणवत्ता बढ़ेगी।
आने वाले समय में विधानसभा में इस विधेयक के पारित होने के बाद शिक्षा क्षेत्र में नए सुधार और सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं। सरकार का यह कदम स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि उत्तराखंड में हर समुदाय के बच्चों के लिए शिक्षा एक समान अधिकार है और कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय पीछे नहीं रहेगा।
इस निर्णय को न केवल उत्तराखंड के अल्पसंख्यक समुदायों ने स्वागत किया है, बल्कि शिक्षा नीति विशेषज्ञ, समाजसेवी और राजनीतिक विश्लेषक इसे शिक्षा क्षेत्र में एक सकारात्मक और न्यायसंगत बदलाव मान रहे हैं।