कॉर्बेट घोटाला: ईडी ने ₹1.75 करोड़ की संपत्ति जब्त की, वन विभाग के अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप

दैनिक प्रभातवाणी | देहरादून | 12 जुलाई 2025
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व घोटाला: ईडी ने 1.75 करोड़ की संपत्ति जब्त की, वन विभाग के अधिकारियों पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
उत्तराखंड के विश्वप्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (Jim Corbett National Park) में अवैध निर्माण और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी को लेकर शुरू हुए चर्चित घोटाले में अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी ने घोटाले से जुड़े कथित आरोपियों की ₹1.75 करोड़ की संपत्ति को जब्त कर लिया है। यह कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत की गई है और इसमें राज्य के वन विभाग के कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
कॉर्बेट पार्क क्षेत्र में अवैध रूप से रिसॉर्ट, झोपड़ियां और पर्यटक सुविधाओं के निर्माण को लेकर वर्ष 2020 से ही गंभीर सवाल उठाए जा रहे थे। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्क के पाखरो रेंज में बिना अनुमति के निर्माण कार्य किए गए और इसके लिए जंगल की कटाई, नदी-नालों के मार्ग में बदलाव और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास से छेड़छाड़ तक की गई।
यह भी सामने आया कि इन कार्यों में वन विभाग के अधिकारियों की सीधी मिलीभगत थी। पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया।
ED की जांच का दायरा
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भारतीय वन अधिनियम, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दर्ज मामलों के आधार पर जांच शुरू की। उत्तराखंड एसटीएफ और सीबीआई की प्रारंभिक रिपोर्टों से मिले इनपुट पर ईडी ने आरोपियों की संपत्तियों की छानबीन की।
ईडी ने जिन संपत्तियों को जब्त किया है, उनमें रुड़की, हरिद्वार और देहरादून में स्थित रिहायशी और व्यावसायिक संपत्तियाँ शामिल हैं। इन संपत्तियों को वन विभाग से जुड़े ठेकेदारों, बिचौलियों और अधिकारियों ने कथित रूप से घोटाले से अर्जित धन से खरीदा था।
मनी ट्रेल और फर्जी बिलों का खुलासा
जांच में पाया गया कि कई फर्जी बिलों और कार्यादेशों के माध्यम से निर्माण कार्यों का व्यय बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। कई ऐसी फर्मों के नाम पर भुगतान हुआ, जो या तो अस्तित्व में ही नहीं थीं या जिनका निर्माण कार्य से कोई संबंध नहीं था।
जांच अधिकारियों ने बताया कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की मर्यादा और सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर भारी मात्रा में बजटीय धन को निजी संपत्तियों के रूप में निवेश किया गया। इसके लिए बैंक खातों की परतें, शेल कंपनियों के दस्तावेज़, और रियल एस्टेट सौदों की गहन जांच की गई।
मुख्य आरोपी कौन हैं?
इस मामले में उत्तराखंड वन विभाग के एक पूर्व प्रमुख वन संरक्षक (PCCF), एक तत्कालीन डीएफओ (वन क्षेत्राधिकारी), और निर्माण कार्यों में शामिल ठेकेदारों को प्रमुख आरोपी माना गया है। कुछ नाम इस प्रकार हैं (न्यायिक प्रक्रिया के तहत अभी इनकी पुष्टि बाकी है):
आर.के. तिवारी (पूर्व डीएफओ, कालागढ़)
एके मिश्रा (पूर्व चीफ इंजीनियर, निर्माण शाखा)
महेश चौहान (ठेकेदार)
अन्य निजी संस्थाओं के 4 प्रतिनिधि
ईडी सूत्रों के अनुसार, इन लोगों के खिलाफ अब प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 की धाराओं के तहत केस पंजीकृत है।
एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट भी कर चुके हैं सख्त टिप्पणी
इस अवैध निर्माण मामले को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) और सुप्रीम कोर्ट पहले ही उत्तराखंड सरकार और पर्यावरण मंत्रालय को कड़ी फटकार लगा चुके हैं। एनजीटी ने पूछा था कि एक संवेदनशील बाघ संरक्षण क्षेत्र में इस तरह का निर्माण किस आधार पर हुआ और किसने इसकी अनुमति दी।
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जांच एजेंसियों से समयबद्ध रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।
राजनीतिक हलकों में हलचल
जैसे ही ईडी की जब्ती की खबर सामने आई, राज्य की राजनीति में हलचल मच गई। विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ दल पर आरोप लगाया कि सरकार ने इस पूरे घोटाले को “राजकीय संरक्षण” दिया। कांग्रेस नेता प्रीतम सिंह ने कहा, “कॉर्बेट राष्ट्रीय धरोहर है, लेकिन भाजपा सरकार के कार्यकाल में इसकी आत्मा को कुचलने का प्रयास हुआ है। हम इस पर संसद और विधानसभा दोनों में आवाज उठाएंगे।”
वहीं, सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने कहा है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और कानून अपना काम करेगा।
आगे की कार्रवाई
ईडी अब आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया में है। साथ ही, अन्य संपत्तियों को चिन्हित करने और विदेशों में भेजी गई रकम की जांच भी शुरू हो चुकी है। जल्द ही आरोपियों की जांच पूछताछ के लिए हिरासत की मांग कोर्ट में की जा सकती है।
दैनिक प्रभातवाणी
कॉर्बेट घोटाला केवल एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के मूल सिद्धांतों के साथ विश्वासघात है। ₹1.75 करोड़ की संपत्ति की जब्ती इस बात की शुरुआत है कि अब कानून अपना कठोर चेहरा दिखाएगा। जनता को उम्मीद है कि इस ऐतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर को बचाने और दोषियों को सजा दिलाने में सरकार और न्यायालय दोनों सजग रहेंगे।