January 15, 2026

स्वास्थ्य प्रणाली की चीत्कार: सेना जवान का एक वर्षीय बेटा तड़पता रहा, पांच अस्पतालों में दौड़ता रहा परिवार – आखिरकार तोड़ दिया दम

स्वास्थ्य प्रणाली की चीत्कार: सेना जवान का एक वर्षीय बेटा तड़पता रहा, पांच अस्पतालों में दौड़ता रहा परिवार – आखिरकार तोड़ दिया दम
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स्वास्थ्य प्रणाली की चीत्कार: सेना जवान का एक वर्षीय बेटा तड़पता रहा, पांच अस्पतालों में दौड़ता रहा परिवार – आखिरकार तोड़ दिया दम

उत्तराखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियां एक बार फिर बेनकाब हो गईं, जब एक आर्मी जवान का मात्र एक साल का बेटा इलाज के अभाव में दम तोड़ बैठा। यह हृदयविदारक घटना सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि प्रदेश के चार जिलों की बदहाल मेडिकल व्यवस्था की तस्वीर पेश करती है।

चार जिलों, पांच अस्पतालों की दर–दर भटकती जिंदगी

सेना में कार्यरत जवान पिथौरागढ़ जिले के निवासी हैं। उनका एक वर्षीय पुत्र बीते सप्ताह अचानक गंभीर रूप से बीमार हो गया। परिजनों के अनुसार, बच्चे को पहले पिथौरागढ़ के ज़िला अस्पताल में ले जाया गया, जहां संसाधनों के अभाव में उसे हल्द्वानी रेफर कर दिया गया। हल्द्वानी में भी समुचित इलाज न मिलने पर उसे पहले नैनीताल और फिर काठगोदाम के निजी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन सभी जगह एक ही उत्तर मिला – “बच्चे की हालत गंभीर है, यहां सुविधाएं नहीं हैं।”

आखिर में जब परिजन बच्चे को लेकर देहरादून पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पांचवें अस्पताल में चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। जवान की पत्नी का रो–रो कर बुरा हाल है, जबकि परिवार और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है।

मुख्यमंत्री ने दिए उच्च स्तरीय जांच के आदेश

मामला तूल पकड़ता देख मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तत्काल जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। सीएम कार्यालय से बयान जारी कर कहा गया कि “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही पाई गई तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”

मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिए कि सभी ज़िलों के सीएमओ से अस्पतालों की रिपोर्ट तलब की जाए और एक विशेष समिति बनाकर 7 दिनों में पूरी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।

स्वास्थ्य प्रणाली पर उठे बड़े सवाल

इस घटना ने राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली को कठघरे में ला खड़ा किया है। सवाल यह है कि जब एक आर्मी जवान का बच्चा — जिसे प्राथमिकता से इलाज मिलना चाहिए था — तक इलाज से वंचित रहा, तो आम नागरिकों की स्थिति क्या होगी?

राज्य में लंबे समय से चिकित्सा सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपलब्धता, जीवन रक्षक उपकरणों की दयनीय स्थिति और रेफरल की कागजी प्रक्रिया ने लोगों की ज़िंदगियों को दांव पर लगा दिया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में अस्पतालों का केवल नाम होना काफी नहीं है। वहां आधुनिक इलाज की सुविधाएं, प्रशिक्षित डॉक्टरों और एम्बुलेंस सेवाओं की अनिवार्यता अब प्रशासन के लिए नैतिक प्रश्न बन चुकी है।

स्थानीय लोगों में उबाल

इस घटना के बाद पिथौरागढ़, नैनीताल और हल्द्वानी में आक्रोश फैल गया है। कई सामाजिक संगठनों और पूर्व सैनिकों ने जिलाधिकारियों को ज्ञापन सौंपे हैं, जिनमें राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने की मांग की गई है।

पिथौरागढ़ के पूर्व विधायक ने भी ट्वीट कर कहा, “यह एक बच्चा नहीं मरा, बल्कि राज्य की संवेदनहीन चिकित्सा व्यवस्था का शव सामने आया है।”

क्या होगी यह केवल जांचों में सिमटी घटना?

राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह भी एक ऐसी घटना होगी जो केवल ‘जांच के आदेश’ में सिमट जाएगी, या वाकई कुछ ठोस परिवर्तन होंगे?

2017 से अब तक उत्तराखंड के 13 ज़िलों में स्वास्थ्य संबंधी 80 से अधिक मौतें ऐसी हो चुकी हैं, जहाँ इलाज के अभाव या रेफर की देरी वजह बनी। लेकिन धरातल पर सुधार बहुत धीमी गति से हो रहा है।

क्या कहती है सरकार?

सरकार का दावा है कि राज्य में टेलीमेडिसिन केंद्रों की संख्या बढ़ाई जा रही है, और 2025 के अंत तक हर ब्लॉक में कम से कम एक ICU सुविधा युक्त अस्पताल होगा। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अभी तक कई ब्लॉकों में डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हैं।


दैनिक प्रभातवाणी की टिप्पणी

यह घटना उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को आईना दिखाती है। सेना जैसे प्रतिष्ठित विभाग के जवान का बेटा अगर इलाज के अभाव में दम तोड़ दे, तो यह पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी है। समय आ गया है कि सरकार न केवल जांच कराए, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस और टिकाऊ सुधारों को लागू करे — वरना अगला शिकार कौन होगा, कोई नहीं जानता।