February 21, 2026

उत्तराखंड पेपर लीक कांड: अब सीबीआई करेगी जांच, युवाओं को न्याय की उम्मीद

उत्तराखंड पेपर लीक कांड: अब सीबीआई करेगी जांच, युवाओं को न्याय की उम्मीद
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देहरादून,1अक्टूबर2025/दैनिक प्रभातवाणी 

देहरादून। उत्तराखंड में पिछले दो वर्षों से भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक कांड ने प्रदेश की राजनीति, समाज और विशेषकर बेरोजगार युवाओं की ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षाओं में लगातार आ रहे धांधली के आरोपों ने जहां प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए, वहीं हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य अंधेरे में डाल दिया। इस पूरे प्रकरण में अब एक बड़ा मोड़ आया है, जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कोर्ट की निगरानी में काम कर रही विशेष जांच टीम (SIT) की जांच को बंद कर पूरे मामले की जिम्मेदारी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने की घोषणा कर दी। यह कदम उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण साबित हो सकता है, जो लंबे समय से इस घोटाले के दोषियों को सज़ा दिलाने की मांग कर रहे थे।

पेपर लीक कांड की शुरुआत 2022 में तब हुई जब स्नातक स्तर की भर्ती परीक्षा का पेपर सोशल मीडिया और दलालों के पास मिलने की खबरें सामने आईं। देखते ही देखते यह मामला तूल पकड़ता गया और सैकड़ों अभ्यर्थियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। सरकार ने तत्कालीन स्थिति को संभालने के लिए एसआईटी गठित की और मामले की जांच शुरू की। कई नकल माफिया, दलाल और आयोग से जुड़े कर्मचारी गिरफ्तार किए गए, जिनमें कुछ सरकारी अधिकारी भी शामिल थे। इसके बावजूद अभ्यर्थियों और विपक्षी दलों का आरोप था कि जांच आधी-अधूरी की जा रही है और असली गुनहगारों को बचाया जा रहा है।

एसआईटी की कार्रवाई से शुरुआती स्तर पर कई खुलासे जरूर हुए, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, लोगों का विश्वास इस पर डगमगाने लगा। अभ्यर्थियों का कहना था कि इस पूरे नेटवर्क में बड़े राजनेताओं और अफसरों की मिलीभगत रही है, लेकिन एसआईटी की जांच केवल निचले स्तर के लोगों तक सीमित रह गई। अभ्यर्थियों का यह भी आरोप था कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले मुख्य दोषियों तक जांच नहीं पहुंच रही है। इसी असंतोष के चलते युवाओं ने राजधानी देहरादून से लेकर हल्द्वानी, हरिद्वार और पौड़ी तक प्रदर्शन किए और लगातार सीबीआई जांच की मांग उठाई।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर विपक्षी दलों और युवाओं का दबाव बढ़ता गया। आखिरकार उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर बड़ा निर्णय लेते हुए घोषणा की कि अब पेपर लीक कांड की जांच सीबीआई करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार युवाओं के भविष्य के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि दोषियों को किसी भी कीमत पर छोड़ा न जाए। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार इस जांच में सीबीआई को पूरा सहयोग देगी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीबीआई जांच किस दिशा में जाएगी। सीबीआई देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी है और उसके पास न सिर्फ अनुभवी अधिकारी होते हैं बल्कि आधुनिक तकनीक और नेटवर्क की सुविधा भी होती है। इसलिए यह उम्मीद जताई जा रही है कि एजेंसी इस घोटाले की परत-दर-परत जांच करेगी और उन चेहरों को भी बेनकाब करेगी जो अब तक परदे के पीछे सुरक्षित हैं।

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा असर बेरोजगार युवाओं पर पड़ा है। प्रदेश में लाखों युवा वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कई अभ्यर्थियों ने अपने परिवार की उम्मीदों और आर्थिक साधनों को दांव पर लगाकर तैयारी की, लेकिन जब उन्हें पता चला कि परीक्षाओं में पैसे लेकर पेपर बेचे जा रहे हैं, तो उनका विश्वास तंत्र से पूरी तरह हिल गया। यही कारण है कि जब भी पेपर लीक का मुद्दा उठा, तो पूरे राज्य के युवाओं में आक्रोश फैल गया। वे न सिर्फ सरकार पर भरोसा खो बैठे बल्कि प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार और तंत्र की विफलता को लेकर भी सवाल उठाने लगे।

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो पेपर लीक कांड ने सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि सरकार इस मामले में आधे-अधूरे कदम उठा रही है और असली दोषियों को बचाया जा रहा है। कांग्रेस और अन्य दलों ने विधानसभा से लेकर सड़क तक सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा। ऐसे में मुख्यमंत्री धामी का सीबीआई जांच का फैसला राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वह विपक्ष के हमलों को रोकने के साथ-साथ युवाओं के बीच एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि, यह भी एक सच्चाई है कि सीबीआई जांच अक्सर लंबा समय लेती है। देश में कई बड़े घोटाले सीबीआई के पास हैं, जिनकी फाइलें वर्षों से खुली पड़ी हैं और उनमें ठोस नतीजे सामने आने में बहुत देर हो रही है। इसलिए कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सीबीआई जांच से युवाओं का विश्वास तुरंत बहाल नहीं होगा। उन्हें तभी भरोसा मिलेगा जब जांच तेज गति से होगी और दोषियों को जल्द से जल्द सज़ा मिलेगी।

इस पूरे प्रकरण ने राज्य में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर चयन आयोग जैसी संस्था में ही भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसी घटनाएं होती रहेंगी, तो फिर युवाओं के लिए मेहनत और योग्यता का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यही कारण है कि अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि राज्य सरकार को परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार करने चाहिए। इसमें तकनीकी माध्यमों से प्रश्नपत्र तैयार करना, सुरक्षित ढंग से उनकी छपाई और वितरण करना और परीक्षा केंद्रों की सख्त निगरानी जैसे कदम शामिल हैं।

पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि उत्तराखंड में पेपर लीक कांड सिर्फ एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है बल्कि यह पूरे समाज के विश्वास से जुड़ा मुद्दा है। जब एक राज्य का युवा मेहनत करके भी न्याय नहीं पा सकता और पैसे व भ्रष्टाचार के बल पर नौकरी हासिल की जाती है, तो यह केवल अभ्यर्थियों के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरे समाज के साथ धोखा है। यही वजह है कि अब लोग इस मामले की जांच से सिर्फ दोषियों की गिरफ्तारी ही नहीं बल्कि व्यवस्था में व्यापक सुधार की भी उम्मीद कर रहे हैं।

अब जबकि मामला सीबीआई के पास जा चुका है, तो यह देखना होगा कि जांच किस तेजी से आगे बढ़ती है और किन-किन चेहरों को बेनकाब करती है। फिलहाल, इतना तय है कि इस घोषणा ने युवाओं को राहत और उम्मीद जरूर दी है। लेकिन जब तक दोषियों को कड़ी सज़ा और पारदर्शी भर्ती प्रणाली स्थापित नहीं की जाती, तब तक यह घोटाला प्रदेश की राजनीति और समाज दोनों में एक गहरे घाव की तरह बना रहेगा।