मुख्यमंत्री धामी का बड़ा निर्देश — राशन कार्ड घोटाले की जाँच तेज, सभी जिलों में प्रशासनिक सख्ती बढ़ी

उत्तराखंड विशेष रिपोर्ट: मुख्यमंत्री धामी का बड़ा निर्देश — राशन कार्ड घोटाले की जाँच तेज, सभी जिलों में प्रशासनिक सख्ती बढ़ी
मुख्यमंत्री धामी का बड़ा निर्देश — राशन कार्ड घोटाले की जाँच तेज, सभी जिलों में प्रशासनिक सख्ती बढ़ी
दैनिक प्रभातवाणी | 7 अगस्त 2025
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उत्तराखंड में एक ओर जहां भारी बारिश और क्लाउडबर्स्ट जैसी प्राकृतिक आपदाएं चिंता का कारण बनी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार ने जन कल्याण योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ एक व्यापक अभियान छेड़ दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्पष्ट निर्देश के बाद राज्य भर में राशन कार्ड और जीएसटी पंजीकरणों की बड़े स्तर पर समीक्षा की जा रही है। अब तक की कार्रवाई में यह बात सामने आई है कि हजारों ऐसे राशन कार्डधारी हैं जो सरकारी योजना का लाभ झूठे दस्तावेज़ या अयोग्य पात्रता के आधार पर उठा रहे थे।
मुख्यमंत्री ने सभी ज़िलाधिकारियों (DMs) को निर्देशित किया है कि वे अपने-अपने जिलों में राशन कार्ड सत्यापन अभियान को पूरी गंभीरता से संचालित करें और अवैध रूप से जारी किए गए राशन कार्डों को तत्काल प्रभाव से रद्द करें। यही नहीं, ऐसे मामलों में ज़िम्मेदार कर्मचारियों और लाभार्थियों के विरुद्ध कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
बागेश्वर सबसे आगे, देहरादून और पौड़ी में भी खुली पोल
अभियान की शुरुआत के बाद से अब तक 9000 से अधिक राशन कार्ड रद्द किए जा चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले बागेश्वर ज़िले से सामने आए हैं जहाँ 5,307 राशन कार्ड निरस्त किए गए। देहरादून में 3,332 और पौड़ी में 961 राशन कार्ड रद्द किए गए हैं। यह आँकड़ा साफ दर्शाता है कि योजना का लाभ लेने वाले कई ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो वास्तव में इसके हकदार नहीं थे।
बागेश्वर जैसे अपेक्षाकृत शांत और सीमांत ज़िले में इतनी बड़ी संख्या में राशन कार्ड रद्द होने से प्रशासन की निष्क्रियता और निगरानी तंत्र की कमजोरी पर भी सवाल उठते हैं। देहरादून, जो कि राज्य की राजधानी और प्रशासनिक केंद्र है, वहाँ भी हजारों की संख्या में गड़बड़ियाँ पकड़ी गई हैं, जिससे पूरे राज्य में निगरानी प्रणाली की गुणवत्ता पर पुनः मंथन शुरू हो गया है।
मुख्यमंत्री धामी का सख्त संदेश: जनता के हक पर डाका बर्दाश्त नहीं
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने निर्देश में साफ कहा है कि “सरकार की योजनाएँ गरीबों, जरूरतमंदों और वंचित वर्गों के लिए हैं। इन योजनाओं को छलपूर्वक हथियाना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह समाज के प्रति अपराध भी है।” मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी, जो इन गड़बड़ियों में लिप्त पाया जाएगा, उस पर सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
मुख्यमंत्री का यह रुख उन लोगों के लिए स्पष्ट चेतावनी है जो अब भी गलत दस्तावेजों के ज़रिए किसी सरकारी योजना का लाभ ले रहे हैं या देने में लिप्त हैं। यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि इस तरह के मामलों की शिकायतों पर तेज़ गति से जांच हो और ज़मीनी स्तर तक जवाबदेही तय की जाए।
क्या है राशन कार्ड सत्यापन अभियान?
उत्तराखंड में संचालित यह सत्यापन अभियान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत आने वाले लाभार्थियों के दस्तावेजों की बारीकी से जांच करने की एक प्रशासनिक पहल है। इसके अंतर्गत देखा जा रहा है कि:
लाभार्थी वास्तव में BPL या APL श्रेणी में आता है या नहीं।
क्या उसका नाम दो जगह दर्ज है?
क्या वह मृत व्यक्ति के नाम पर राशन ले रहा है?
क्या राशन कार्ड में नाम, पता या परिवार के सदस्य फर्ज़ी हैं?
क्या कोई व्यक्ति एक से अधिक राशन कार्ड धारक है?
इन सभी पहलुओं की पुष्टि के लिए जिलों में घर-घर जाकर सर्वे किया जा रहा है, साथ ही डिज़िटल रजिस्ट्रेशन की भी क्रॉस-वेरिफिकेशन की जा रही है। कई जगहों पर तो यह भी सामने आया कि राशन डीलरों की मिलीभगत से फर्ज़ी कार्ड बनाए गए थे।
ज़मीनी सच्चाई: गरीबी में जीते असली पात्र पीछे छूटे
सरकार की सख्ती और कार्यवाही उचित है, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल भी उठता है — क्या अब तक इस प्रणाली का दुरुपयोग करने वालों की वजह से असली हकदार वंचित नहीं रह गए? राज्य के विभिन्न जनपदों से ऐसी खबरें आ रही हैं जहाँ वाकई में गरीब परिवारों को राशन नहीं मिल पा रहा था क्योंकि उनका नाम सूची में नहीं था, जबकि उनके ही गांव में समृद्ध व्यक्ति योजनाओं का लाभ उठा रहा था।
एक महिला (नाम गोपनीय) जो उत्तरकाशी ज़िले के एक दूरस्थ गांव में रहती हैं, बताती हैं —
“मेरे पति का निधन COVID काल में हो गया था। मेरे पास आय का कोई ज़रिया नहीं है। मैंने राशन कार्ड के लिए तीन बार आवेदन किया लेकिन नाम नहीं आया। जबकि गांव के प्रधान का परिवार, जो खेती के साथ-साथ टैक्सी भी चलाता है, सब्सिडी का राशन उठा रहा है।”
जीएसटी पंजीकरण पर भी सरकार की पैनी नजर
राशन कार्डों के समानांतर, उत्तराखंड सरकार अब जीएसटी पंजीकरण और व्यापारिक करों की जांच पर भी गंभीरता से ध्यान दे रही है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ व्यापारिक संस्थानों ने फर्ज़ी पते, कागज़ी व्यवसाय, या ट्रांजिट फर्म दिखाकर पंजीकरण करवा रखा था। अब इन्हें चिन्हित कर कड़ी कर समीक्षा प्रक्रिया के लिए कहा गया है।
वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, “अब हम जीएसटी रजिस्ट्रेशन का फिजिकल वेरिफिकेशन करवा रहे हैं। जो व्यवसाय जमीन पर मौजूद नहीं हैं या जिनका कारोबार कागज़ों तक सीमित है, उन्हें नोटिस देकर रद्द किया जाएगा।”
प्रशासनिक जागरूकता और सुधारात्मक पहल
इस व्यापक जांच अभियान के अंतर्गत प्रत्येक जिले में विशेष जांच टीमों का गठन किया गया है। टीमों को निर्देश दिया गया है कि वे दो सप्ताह के भीतर समस्त संदिग्ध राशन कार्डों की सूची बनाकर रिपोर्ट दें और आवश्यकता अनुसार कार्यवाही करें।
इसके अलावा, ग्राम पंचायत स्तर पर भी सचिवों को निर्देश दिए गए हैं कि वे ग्रामीण स्तर पर सत्यापन में सहयोग करें। डिजिटल पोर्टल पर उपलब्ध डेटा को मैनुअल सर्वे से मिलान किया जा रहा है। साथ ही, “जन-सुनवाई” पोर्टल पर भी आम लोगों को अपील का अधिकार दिया गया है, ताकि जो वास्तविक लाभार्थी छूटे हैं वे आवेदन कर सकें।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और जनता की अपेक्षा
राज्य सरकार की इस पहल की विपक्ष ने भी सतर्क निगरानी की मांग की है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने बयान में कहा कि, “सत्यापन ज़रूरी है लेकिन इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि प्रशासनिक मनमानी के चलते वाकई में ज़रूरतमंदों के कार्ड रद्द कर दिए जाएँ।”
जनता की अपेक्षा है कि यह अभियान केवल दिखावटी कार्रवाई बनकर न रह जाए, बल्कि इसके ज़रिए व्यवस्था को वास्तविक रूप से दुरुस्त किया जाए। लोग चाहते हैं कि जनधन और NFSA जैसी योजनाओं का लाभ केवल उन्हीं को मिले जो वाकई इसके पात्र हैं, और भ्रष्टाचारियों को दंड मिले।
दैनिक प्रभातवाणी : उत्तराखंड प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
उत्तराखंड सरकार ने जन कल्याण योजनाओं में पारदर्शिता और पात्रता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री धामी की पहल निश्चित रूप से एक लोकप्रिय लेकिन चुनौतीपूर्ण निर्णय है, जिसमें जनता की भलाई के साथ-साथ प्रशासन की जवाबदेही को भी कसने का प्रयास है।
जहां एक ओर बाढ़ और आपदा जैसी प्राकृतिक घटनाओं से राज्य जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक प्रशासनिक स्वच्छता की यह मुहिम आने वाले दिनों में लोकतांत्रिक शासन की नींव को और मजबूत कर सकती है। यदि इसे ईमानदारी से और ज़मीनी स्तर पर निष्पक्षता के साथ लागू किया गया, तो यह उत्तराखंड के कल्याणकारी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।