February 21, 2026

घर मिलेगा या 4 करोड़ रुपये’, एलीमनी केस में महिला को डांटते हुए बोले CJI बीआर गवई: “नौकरी ढूंढो और खुद कमाओ”

‘घर मिलेगा या 4 करोड़ रुपये’, एलीमनी केस में महिला को डांटते हुए बोले CJI बीआर गवई: "नौकरी ढूंढो और खुद कमाओ"
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‘घर मिलेगा या 4 करोड़ रुपये’, एलीमनी केस में महिला को डांटते हुए बोले CJI बीआर गवई: “नौकरी ढूंढो और खुद कमाओ”

दैनिक प्रभातवाणी | नई दिल्ली | 22 जुलाई 2025

सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक दिलचस्प और बहस को जन्म देने वाला मामला सामने आया, जहाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई ने एक महिला द्वारा मांगे गए 12 करोड़ रुपये के एलीमनी (गुज़ारा भत्ता) पर नाराज़गी जताते हुए उसे कड़ी फटकार लगाई। सीजेआई गवई ने कहा, “तुम्हें या तो घर मिलेगा या फिर 4 करोड़ रुपये… अब नौकरी ढूंढो और खुद कमाकर खाओ।” अदालत में दिए गए इस स्पष्ट और कठोर संदेश ने सोशल मीडिया और न्यायिक गलियारों दोनों में बहस को तेज कर दिया है।


 मामला क्या था?

यह केस एक अमीर व्यवसायी और उसकी पत्नी के बीच तलाक और गुज़ारा भत्ता (एलीमनी) से जुड़ा हुआ था। महिला ने अदालत से 12 करोड़ रुपये के एकमुश्त एलीमनी की मांग की, यह दावा करते हुए कि वह उसी जीवन स्तर को बनाए रखना चाहती है जो उसे शादी के दौरान मिला था।

लेकिन इस मांग पर सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच, जिसकी अध्यक्षता CJI गवई कर रहे थे, ने कड़ा रुख अपनाया। महिला को पहले ही एक आलीशान घर, कार, और कुछ नकद भुगतान मिल चुका था। इसके बावजूद जब महिला ने और अधिक धन की मांग की, तो CJI ने नाराजगी व्यक्त की।


 CJI गवई ने क्या कहा?

CJI बीआर गवई ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा:

“हम पहले ही 4 करोड़ रुपये या घर देने को तैयार हैं। लेकिन आपकी ओर से की गई 12 करोड़ की मांग अत्यधिक और अनुचित है। अब बहुत हो गया। आप शिक्षित हैं, सक्षम हैं — तो अब नौकरी ढूंढिए और खुद कमाकर खाइए।”

इस बयान ने कोर्टरूम में मौजूद सभी को चौंका दिया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जज आमतौर पर इतने सीधे शब्दों में अपनी राय कम ही रखते हैं। लेकिन CJI गवई का यह रवैया उस तेजी से बदलते सामाजिक परिदृश्य को दर्शाता है, जहाँ महिलाएं सिर्फ गुज़ारे की मांग पर निर्भर न रहकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने को प्रोत्साहित की जा रही हैं।


 न्यायिक संतुलन की मिसाल

CJI का यह फैसला इस बात की मिसाल है कि कोर्ट केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, तथ्यों और न्यायिक तर्कों पर फैसला करती है। अदालत ने माना कि:

  • महिला को पहले से पर्याप्त भौतिक सुविधा मिल चुकी है।

  • वह पढ़ी-लिखी और सक्षम है, इसलिए पूरी तरह से आर्थिक रूप से निर्भर नहीं मानी जा सकती।

  • पति की ओर से पेश किए गए दस्तावेज़ों में उसकी आमदनी पर भी सवाल खड़े नहीं हुए।

इसलिए अदालत ने 4 करोड़ रुपये या घर में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया और महिला से कहा कि अब वह अपने जीवन को खुद अपने दम पर संवारें


 सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

यह मामला जैसे ही सामने आया, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। ट्विटर (अब X), फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लोगों ने इस फैसले को लेकर दो तरह की राय रखी:

एक वर्ग का कहना है कि कोर्ट ने सही किया — क्योंकि महिला शिक्षित थी, और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए उसे प्रोत्साहन दिया गया।

दूसरा वर्ग इसे महिला अधिकारों पर चोट मान रहा है, और कह रहा है कि विवाह के बाद महिला को अपने जीवनस्तर को बनाए रखने का पूरा अधिकार है।

हालांकि, अधिकांश लोगों ने CJI गवई की साफगोई और न्यायप्रियता की सराहना की है।


 महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर संदेश

CJI गवई की टिप्पणी “नौकरी ढूंढो और खुद कमाकर खाओ” सिर्फ एक कानूनी टिप्पणी नहीं थी — यह एक सामाजिक संदेश भी था। भारत जैसे देश में जहां अक्सर तलाक के बाद महिलाएं केवल गुज़ारे के पैसे पर निर्भर रहती हैं, यह बयान उन महिलाओं को प्रेरणा देने वाला है जो खुद को सक्षम और शिक्षित होते हुए भी अदालत से अधिकतम रकम की मांग करती हैं।


 कानूनी विशेषज्ञों की राय

वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य के मामलों के लिए एक अहम उदाहरण बनेगा।

  • यह दिखाता है कि अदालतें अब सिर्फ लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता, जरूरत और न्यायसंगतता के आधार पर फैसला कर रही हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता भावना देसाई का कहना है,

“यह फैसला दिखाता है कि महिला-पुरुष दोनों को अब न्याय व्यवस्था में बराबरी से देखा जाएगा — ना पक्षपात, ना सहानुभूति — सिर्फ न्याय।”


अब समय है खुद पर भरोसा करने का

भारत की न्यायिक व्यवस्था धीरे-धीरे नए युग की ओर बढ़ रही है। जहां तलाक के बाद महिलाओं को सुरक्षा की ज़रूरत होती है, वहीं आत्मनिर्भरता और आत्म-सम्मान भी महत्वपूर्ण हैं। CJI गवई का यह फैसला उसी संतुलन की मिसाल है।

इस मामले ने ये स्पष्ट कर दिया है कि अब अदालतें किसी एक पक्ष की पूरी बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करेंगी — चाहे वह पुरुष हो या महिला।

अब वक्त है कि हम भी समझें — समानता का मतलब है अधिकार और जिम्मेदारी दोनों