January 15, 2026

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश : हिमालयी राज्यों में बाढ़–भूस्खलन पर सरकारें जवाबदेह, ग्रीन नॉर्म्स उल्लंघन पर होगी सख़्त कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश : हिमालयी राज्यों में बाढ़–भूस्खलन पर सरकारें जवाबदेह, ग्रीन नॉर्म्स उल्लंघन पर होगी सख़्त कार्रवाई
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नई दिल्ली, 5 सितंबर।

देश के पर्वतीय इलाकों में लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाओं – विशेषकर बाढ़ और भूस्खलन – ने अब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींच लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र और राज्य सरकारों को कठोर शब्दों में चेतावनी दी और कहा कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले सालों में आपदा की भयावहता और भी बढ़ेगी। अदालत ने साफ़ कर दिया कि इस बार केवल रिपोर्ट या सर्वेक्षण से बात नहीं बनेगी, बल्कि ज़मीनी स्तर पर कार्ययोजना लागू करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि अवैध वृक्ष कटाई, अनियंत्रित खनन और हिमालयी क्षेत्रों में ग्रीन नॉर्म्स की लगातार अनदेखी इस संकट की सबसे बड़ी वजह है। अदालत का कहना था कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट और बेतहाशा निर्माण कार्यों ने पारिस्थितिकी संतुलन को गहरी चोट पहुँचाई है, और इसी कारण हर साल मानसून के दौरान उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और पूर्वोत्तर राज्यों में तबाही का मंजर देखने को मिलता है।


अवैध वृक्ष कटाई बनी सबसे बड़ी समस्या

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जंगल केवल लकड़ी या इमारती सामग्री का स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। पिछले एक दशक में बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान ने नदियों के प्रवाह और मिट्टी की स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित किया है। जब भी भारी बारिश होती है, पहाड़ों की सतह दरकने लगती है और नदी का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। इससे न केवल पुल और सड़कें टूटते हैं बल्कि गाँव–कस्बों में जनहानि भी होती है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के हवाले से अदालत ने कहा कि यदि वृक्ष कटाई पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई और पुनर्वनीकरण अभियान तेज़ नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में पहाड़ी क्षेत्र रहने योग्य नहीं रहेंगे।


सड़क और निर्माण परियोजनाओं पर सख़्त नज़र

हिमालयी राज्यों में हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में सड़क और हाइड्रो प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। चारधाम ऑल वेदर रोड से लेकर बुलेट ट्रेनों और सुरंग परियोजनाओं तक, इन योजनाओं में ग्रीन नॉर्म्स की अनदेखी को लेकर कई बार आपत्ति दर्ज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विकास ज़रूरी है, लेकिन यदि विकास की आड़ में पर्यावरण की बलि दी गई तो उसका खामियाज़ा पूरी पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा।

अदालत ने कहा कि निर्माण कार्यों से पहले और बाद में पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र आकलन होना चाहिए और इस रिपोर्ट को सार्वजनिक भी किया जाना चाहिए। अदालत ने साफ़ कहा कि यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया गया तो जिम्मेदार एजेंसी और ठेकेदारों पर दंडात्मक कार्रवाई होगी।


बाढ़–भूस्खलन : हर साल दोहराई जाने वाली त्रासदी

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के पीछे बीते सालों की भयावह घटनाएँ भी हैं। उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा ने हजारों लोगों की जान ली थी। इसके बाद 2021 में चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से आई बाढ़ में कई सौ लोग लापता हुए। हाल ही में 2023 और 2024 के मानसून में हिमाचल और उत्तराखंड के कई जिलों में भारी तबाही हुई, पुल टूटे, गाँव बह गए और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ।

अदालत ने कहा कि यह चिंताजनक है कि हर साल आपदाएँ दोहराई जाती हैं, लेकिन सरकारें केवल राहत पैकेज और मुआवज़े तक सीमित रह जाती हैं। अगर मूल कारणों – जैसे अवैध खनन, वृक्ष कटाई और ग्रीन नॉर्म्स उल्लंघन – पर अंकुश नहीं लगाया गया तो राहत राशि भी आने वाले समय में बेकार साबित होगी।


केंद्र और राज्यों से माँगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से अगली सुनवाई तक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में केवल योजनाएँ नहीं, बल्कि अब तक किए गए वास्तविक काम और भविष्य की ठोस कार्ययोजना शामिल होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र को एक राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण नीति तैयार करनी चाहिए जिसमें हिमालयी राज्यों की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों का विशेष ध्यान रखा जाए।


विशेषज्ञों की राय और चेतावनी

पर्यावरणविदों का मानना है कि हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है और इसकी भौगोलिक संरचना बेहद नाजुक है। यदि यहाँ भारी मशीनरी, सुरंगों और चौड़ी सड़कों का दबाव बढ़ाया गया तो भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएँ आम हो जाएँगी। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि नदियों के किनारे हो रहे अंधाधुंध खनन से नदी की धारा और तटबंध अस्थिर हो गए हैं, जिससे अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है।


भविष्य की कार्ययोजना और उम्मीदें

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप ऐसे समय आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में भी तेज़ी से बदलाव हो रहा है। हिमालयी राज्यों में मानसून का दबाव बढ़ रहा है और बर्फ पिघलने की गति तेज़ हो गई है। ऐसे में अदालत का संदेश केवल चेतावनी नहीं बल्कि सरकारों के लिए कार्ययोजना बनाने का सीधा आदेश है।

यदि केंद्र और राज्य सरकारें समय रहते सख़्त नीतियाँ लागू करती हैं, वृक्ष कटाई और खनन पर अंकुश लगाती हैं तथा विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता लाती हैं तो आपदा प्रबंधन की दिशा में बड़ा सुधार हो सकता है। अन्यथा आने वाले वर्षों में आपदा का पैमाना और भी बड़ा होगा।


दैनिक प्रभातवाणी

सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा संदेश केवल न्यायिक टिप्पणी नहीं बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने का अंतिम अवसर भी है। अदालत ने जो सवाल उठाए हैं, वे केवल उत्तराखंड या हिमाचल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत और गंगा–ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों से जुड़े हैं। यदि पहाड़ सुरक्षित नहीं रहेंगे तो नदियाँ भी सुरक्षित नहीं होंगी और करोड़ों लोगों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश को किस गंभीरता से लेती हैं और कितनी जल्दी ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाती हैं।