January 13, 2026

ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट में सामने आया 200 करोड़ का घोटाला: चमोली और रुद्रप्रयाग सेक्शन की सीबीआई जांच शुरू

ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट में सामने आया 200 करोड़ का घोटाला: चमोली और रुद्रप्रयाग सेक्शन की सीबीआई जांच शुरू
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दैनिक प्रभातवाणी | उत्तराखंड, 23 जुलाई 2025

उत्तराखंड की बहुचर्चित और बहुप्रतिक्षित परियोजना — ऑल वेदर रोड (चारधाम महामार्ग विकास परियोजना) — एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। इस बार मुद्दा किसी तकनीकी देरी या प्राकृतिक आपदा से जुड़ा नहीं, बल्कि 200 करोड़ रुपये के एक बड़े भ्रष्टाचार और घोटाले से जुड़ा है, जिसकी सीबीआई ने औपचारिक जांच शुरू कर दी है। यह जांच विशेष रूप से चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों में निर्मित सड़कों के सेक्शन से संबंधित है, जहां निर्माण की गुणवत्ता, खर्च और तकनीकी मानकों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

क्या है ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट?

‘ऑल वेदर रोड’ या ‘चारधाम महामार्ग विकास परियोजना’ को केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर शुरू किया था। इस योजना का उद्देश्य उत्तराखंड के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों – बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री – को हर मौसम में सुरक्षित और तेज़ यातायात सुविधा से जोड़ना था। कुल 889 किलोमीटर लंबे इस सड़क नेटवर्क पर लगभग ₹12,000 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था।

इस परियोजना को शुरू करते समय सरकार ने दावा किया था कि इससे न केवल तीर्थयात्रियों को सुविधा मिलेगी बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना की आवाजाही और रणनीतिक दृष्टि से भी मदद मिलेगी। लेकिन जिस परियोजना को विकास की मिसाल बनना था, आज वही भ्रष्टाचार का पर्याय बनती दिख रही है।

कैसे सामने आया घोटाला?

घोटाले की शुरुआत उस समय हुई जब केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के पास एक अज्ञात शिकायतकर्ता ने चमोली और रुद्रप्रयाग सेक्शन में हुई वित्तीय अनियमितताओं की विस्तृत जानकारी भेजी। शिकायत में उल्लेख था कि ठेकेदारों और कुछ उच्चस्तरीय PWD अधिकारियों ने मिलकर निर्माण कार्यों में बड़ी हेराफेरी की है। आरोप है कि नकली बिलिंग, घटिया सामग्री, मापदंडों की अनदेखी और ई-मेजरमेंट सिस्टम में हेरफेर कर सरकारी खजाने को लगभग ₹200 करोड़ का नुकसान पहुँचाया गया।

CVC ने प्रारंभिक जांच के बाद मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया, जिन्होंने तुरंत कार्रवाई करते हुए दोनों जिलों में कई ठिकानों पर छापेमारी की और महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए।

ई-मेजरमेंट रिकॉर्ड में अनियमितता

सीबीआई की प्राथमिक जांच में पाया गया है कि ई-मेजरमेंट प्रणाली — जिसे पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल रूप से निर्माण की माप और भुगतान के लिए लागू किया गया था — में व्यापक रूप से हेराफेरी की गई है। फील्ड से जुड़े फोटो, लोकेशन टैग, माप रिकॉर्ड और भुगतान फाइलों को डिजिटल रूप से संशोधित किया गया है। कई मामलों में ऐसे स्ट्रक्चरल कामों का भुगतान दर्शाया गया जो कभी किए ही नहीं गए थे।

सीबीआई अधिकारियों ने ई-मेजरमेंट से जुड़ी करीब 500 से अधिक प्रविष्टियों की जांच की, जिसमें कम से कम 180 मामलों में बड़ी वित्तीय गड़बड़ियों के संकेत मिले हैं। इन रिकॉर्ड्स को जब्त कर, फॉरेंसिक डेटा विश्लेषकों को भेजा गया है ताकि सटीक समय, स्थान और डेटा परिवर्तन की पुष्टि की जा सके।

ठेकेदारों और पूर्व अधिकारियों की भूमिका

अब तक की जांच में जिन ठेकेदारों को टेंडर दिए गए थे, उनमें से कई कंपनियों के दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियाँ पाई गई हैं। कई कंपनियां कागज़ों पर पंजीकृत थीं लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कोई इंफ्रास्ट्रक्चर या अनुभव नहीं था। ये कंपनियां टेंडर हासिल कर उप-ठेके के ज़रिए निर्माण करवा रही थीं और मुनाफा उठाकर गायब हो जाती थीं।

सीबीआई ने इस सिलसिले में लोक निर्माण विभाग (PWD) के कई पूर्व अधिकारियों से पूछताछ शुरू कर दी है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि इन्होंने निर्माण कार्यों के निरीक्षण के दौरान जानबूझकर अनदेखी की, फर्जी माप पास की और भुगतान की अनुमति दी।

कई वरिष्ठ अधिकारियों के बैंक खातों की जांच की जा रही है, जहां संदिग्ध ट्रांजेक्शन और आय से अधिक संपत्ति के प्रमाण मिल सकते हैं। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ अधिकारियों ने परिवार के सदस्यों के नाम पर अचल संपत्ति और शेयर बाजार में निवेश कर अपनी काली कमाई को छिपाने का प्रयास किया है।

पर्यावरण और भूगर्भीय रिपोर्ट की अनदेखी

इस घोटाले में केवल वित्तीय अनियमितताएं ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय और तकनीकी रिपोर्ट की अनदेखी भी सामने आई है। विशेषकर रुद्रप्रयाग और चमोली जैसे भूकंपीय संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्य बिना भूगर्भीय सर्वेक्षण और उचित ढलानों का ध्यान रखे किए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में इन सड़कों पर भूस्खलन, धंसाव और दरारों की घटनाएं तेजी से बढ़ीं।

सीबीआई की टीम इस पहलू की भी जांच कर रही है कि क्या जानबूझकर भूगर्भीय सुरक्षा रिपोर्ट्स को दबाया गया, और यदि हां, तो किन अधिकारियों की मिलीभगत से यह हुआ।

जनहित याचिका और उच्च न्यायालय की भूमिका

इस घोटाले के सामने आने के बाद, उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है कि पूरी चारधाम परियोजना की स्वतंत्र न्यायिक जांच हो। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि आज जांच सीमित रखी गई, तो ऐसे घोटाले पूरे राज्य के विकास को खोखला कर देंगे।

न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है और सीबीआई से अपनी कार्रवाई की स्थिति रिपोर्ट 4 सप्ताह में प्रस्तुत करने को कहा है।

जनता का आक्रोश और राजनीतिक प्रतिक्रिया

ऑल वेदर रोड को लेकर उत्तराखंड की जनता में वर्षों से आशा और गर्व की भावना रही है। लेकिन अब जब यह प्रोजेक्ट ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता दिख रहा है, तो जनता का गुस्सा साफ नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर “#CharDhamScam” ट्रेंड कर रहा है, और कई स्थानीय सामाजिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए हैं।

राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह सब केंद्र और राज्य सरकार की मिलीभगत से हुआ, जबकि सत्ताधारी दल का कहना है कि जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम कर रही हैं और दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।

आगे की राह

अब जब जांच प्रारंभिक दौर से आगे बढ़ चुकी है, तो यह आवश्यक हो गया है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। CBI की टीम अगले चरण में दिल्ली, देहरादून और हैदराबाद स्थित कंपनियों के ऑफिसों पर भी छापेमारी की तैयारी कर रही है। साथ ही, केंद्र सरकार से मांग की जा रही है कि भविष्य में इस प्रकार की परियोजनाओं के लिए एक स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय मॉनिटरिंग एजेंसी गठित की जाए।

इस बीच राज्य सरकार ने दावा किया है कि वह जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग दे रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। परियोजना से जुड़े अधिकारियों को फिलहाल “अनिवार्य अवकाश” पर भेजा गया है।


दैनिक प्रभातवाणी

ऑल वेदर रोड जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना, जिसे देवभूमि के विकास और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए शुरू किया गया था, अब भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती नजर आ रही है। सीबीआई की जांच से जुड़े तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक सुनियोजित साजिश के तहत सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया गया। यदि समय रहते इस घोटाले की जड़ तक पहुंचकर दोषियों को सजा नहीं दी गई, तो न केवल इस परियोजना की विश्वसनीयता समाप्त होगी, बल्कि राज्य की पूरी विकास प्रक्रिया भी अविश्वास की भेंट चढ़ जाएगी।