सरकारी स्कूलों में अनिवार्य हुआ भगवद गीता श्लोक पाठ: शिक्षा में भारतीय संस्कृति की नई शुरुआत

सरकारी स्कूलों में अनिवार्य हुआ भगवद गीता श्लोक पाठ: शिक्षा में भारतीय संस्कृति की नई शुरुआत
दैनिक प्रभातवाणी | 26 जुलाई 2025
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के क्रियान्वयन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने देशभर के सरकारी स्कूलों में भगवद गीता के श्लोकों का प्रतिदिन पाठ अनिवार्य कर दिया है। यह निर्णय शिक्षा और संस्कृति के समन्वय की उस सोच को मूर्त रूप देता है जो भारतीय ज्ञान परंपरा को विद्यालयी शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने की वकालत करता रहा है।
यह आदेश कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों पर लागू होगा और इसके लिए शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य छात्रों में आध्यात्मिक जागरूकता, नैतिक मूल्य और मानसिक संतुलन को विकसित करना बताया जा रहा है। शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन दर्शन और आत्म-विकास की शिक्षा भी प्रदान करती है, जिसे आज के युग में विशेष रूप से आवश्यक माना जा रहा है।
सरकार का रुख और नई सोच
शिक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी धार्मिक प्रचार या जबरदस्ती से प्रेरित नहीं है, बल्कि भारतीय परंपरा को समकालीन संदर्भों में फिर से जीवंत करने की पहल है। गीता में वर्णित श्लोकों को मूल संस्कृत के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेज़ी में भी समझाया जाएगा, ताकि छात्रों को भाषा संबंधी कठिनाई न हो और वे उसके भावार्थ को गहराई से समझ सकें।
संस्कृति और विज्ञान का संगम
NEP 2020 के तहत शिक्षा में संस्कृति और विज्ञान दोनों को समान महत्व देने की बात की गई थी। गीता का पाठ एक ओर बच्चों को ध्यान, अनुशासन और आत्मनियंत्रण जैसे गुणों से जोड़ता है, वहीं दूसरी ओर यह उन्हें दर्शनशास्त्र और नैतिक निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करता है। कई शिक्षाविदों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों के दौर में गीता जैसे ग्रंथ छात्रों को सकारात्मक सोच और मानसिक स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।
समाज में मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ
इस फैसले का स्वागत जहां एक ओर संस्कृति प्रेमियों, शिक्षाविदों और अनेक माता-पिता ने किया है, वहीं कुछ वर्गों ने इसे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से टकराता हुआ भी बताया है। आलोचकों का कहना है कि एक धर्मविशेष के ग्रंथ को अनिवार्य बनाना, बहुसांस्कृतिक समाज में भेदभाव की आशंका को जन्म दे सकता है। सरकार ने इस आशंका को निराधार बताया है और कहा है कि आगे चलकर अन्य भारतीय ग्रंथों जैसे उपनिषद, योगसूत्र और पंचतंत्र की शिक्षाओं को भी पाठ्यक्रम में जोड़ा जा सकता है।
शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम
शिक्षकों को भगवद गीता के श्लोकों की व्याख्या, उच्चारण और अर्थ समझाने के लिए एक विशेष 10-दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके अंतर्गत उन्हें यह सिखाया जाएगा कि बच्चों की आयु और मानसिक स्तर के अनुरूप किस तरह गीता की शिक्षाओं को सरल और रोचक बनाया जाए।
भविष्य की ओर दृष्टि
शिक्षा मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में भगवद गीता के साथ-साथ महाकाव्य रामायण और महाभारत के कुछ हिस्सों को भी नैतिक शिक्षा और मूल्यों के तहत पढ़ाया जा सकता है। यह बदलाव धीरे-धीरे और स्वैच्छिक रूप से लाया जाएगा ताकि किसी भी धार्मिक भावना को ठेस न पहुँचे।
दैनिक प्रभातवाणी
भगवद गीता का विद्यालयों में श्लोक-पाठ अनिवार्य करना सिर्फ एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि एक वैचारिक दिशा है जो भारतीय शिक्षा को उसकी संस्कृति की जड़ों से जोड़ने की कोशिश है। यह पहल यदि संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण से लागू होती है, तो आने वाली पीढ़ी न केवल विद्वान बनेगी बल्कि संवेदनशील, नैतिक और जागरूक नागरिक के रूप में भी विकसित होगी।