Spread the loveउत्तराखंड के 4,216 गांवों में टीबी का खतरा, हर साल 28 हजार नए मरीज, कई जिले हाई रिस्क जोन मेंउत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरताओं और पहाड़ी वादियों के बीच एक गंभीर स्वास्थ्य संकट धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। राज्य के 4,216 गांवों में ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) का खतरा लगातार बढ़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 28 हजार नए टीबी मरीज सामने आते हैं, जो राज्य में इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाता है।विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी एक ऐसी बीमारी है, जो प्रारंभिक चरण में पहचान न होने पर तेजी से फैल सकती है। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, कुपोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी इस बीमारी को और गंभीर बनाती है। इसके अलावा, शुरुआती लक्षणों की अनदेखी और समय पर जांच और इलाज में देरी भी इसे बढ़ावा देती है।हाई रिस्क जिलों की स्थितिस्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, कई जिले उच्च जोखिम श्रेणी में आ चुके हैं। इनमें हरिद्वार, चमोली, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल और पिथौरागढ़ शामिल हैं। इन जिलों में टीबी की रोकथाम और उपचार के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। विभाग ने इन क्षेत्रों में ग्रामीण लोगों की स्वास्थ्य जांच और जागरूकता कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी है।विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में टीबी की बढ़ती संख्या का मुख्य कारण स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से नहीं लेते, जिससे संक्रमण बढ़ जाता है। इसके अलावा, पोषण की कमी और ठंडे मौसम में जीवनशैली भी रोग की गंभीरता बढ़ाती है।व्यापक स्क्रीनिंग अभियानराज्य सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए व्यापक स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत 14 साल से अधिक उम्र के सभी ग्रामीणों की एक्स-रे जांच अनिवार्य कर दी गई है। केंद्र सरकार ने इस अभियान के लिए 14 लाख ग्रामीणों की जांच का लक्ष्य निर्धारित किया है। अब तक लगभग पांच लाख लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, जबकि करीब दस लाख लोगों की जांच अभी शेष है।स्क्रीनिंग प्रक्रिया को तेज करने के लिए राज्य में 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें भेजी गई हैं, और 19 नई मशीनें जल्द ही उपलब्ध कराई जाएंगी। इन संसाधनों से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाने में मदद मिल रही है। स्वास्थ्य विभाग का उद्देश्य है कि ग्रामीण क्षेत्रों में हर व्यक्ति तक समय पर जांच और उपचार पहुंच सके।टीबी मरीजों को पोषण सहायताटीबी के मामलों में बढ़ोतरी एक चिंता का विषय है, लेकिन उपचार के स्तर पर सकारात्मक संकेत भी दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत लगभग 91 प्रतिशत मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके साथ ही मरीजों को हर महीने 1000 रुपये की पोषण सहायता भी दी जा रही है, जिससे उनकी रिकवरी में मदद मिलती है।राज्य में राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत 13 जिला टीबी केंद्र, 98 ब्लॉक स्तर की टीबी यूनिट और 157 सक्रिय जांच केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इसके अलावा, ब्लॉक स्तर पर 131 आधुनिक जांच मशीनें भी लगाई गई हैं, जो जांच प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना रही हैं।‘टीबी मुक्त पंचायत’ अभियानस्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि सरकार टीबी उन्मूलन के लिए गंभीर प्रयास कर रही है। स्क्रीनिंग और उपचार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, और इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में टीबी को खत्म करने के लिए ‘टीबी मुक्त पंचायत’ अभियान चलाया जा रहा है। इस योजना के तहत निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले गांवों को टीबी मुक्त घोषित किया जाएगा।स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि इस अभियान में सरकारी कर्मचारियों, स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और स्वयंसेवकों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। उनका कहना है कि टीबी मुक्त पंचायत अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने और संक्रमण को रोकने में महत्वपूर्ण साबित होगा।टीबी पर नियंत्रण के लिए चुनौतियाँविशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में टीबी के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारक हैं। इनमें स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, कुपोषण, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, शुरुआती लक्षणों की अनदेखी और समय पर जांच व इलाज में देरी शामिल हैं। इसके अलावा, कठिन भौगोलिक स्थिति, मौसम और सड़क परिवहन की चुनौतियाँ भी टीबी नियंत्रण को प्रभावित करती हैं।हालांकि, सरकार और स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से इस चुनौती पर काबू पाने की उम्मीद भी मजबूत हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि निरंतर स्क्रीनिंग, समय पर इलाज और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने से टीबी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।भविष्य की रणनीतियाँउत्तराखंड सरकार ने टीबी उन्मूलन के लिए कई लंबी अवधि की योजनाएँ बनाई हैं। इनमें दूरस्थ क्षेत्रों में मोबाइल हेल्थ क्लीनिक, पोर्टेबल जांच मशीनों की संख्या बढ़ाना और ग्रामीण स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण शामिल है। साथ ही, टीबी मरीजों के लिए पोषण और आर्थिक सहायता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।राज्य सरकार का उद्देश्य है कि टीबी मुक्त पंचायत अभियान के माध्यम से पूरे राज्य में धीरे-धीरे टीबी के मामलों में कमी लाई जाए। इसके लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ साझेदारी भी की जा रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में टीबी की रोकथाम और नियंत्रण के लिए यह रणनीति अत्यंत महत्वपूर्ण है। निरंतर निगरानी, समय पर जांच और सही इलाज के माध्यम से ही टीबी की गंभीरता को कम किया जा सकता है।निष्कर्षउत्तराखंड में टीबी एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। 4,216 गांवों में खतरा और हर साल लगभग 28 हजार नए मरीज इसके गंभीर स्तर को दर्शाते हैं। हालांकि, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं। व्यापक स्क्रीनिंग, पोषण सहायता और टीबी मुक्त पंचायत अभियान के माध्यम से इस बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, जागरूकता फैलाना और समय पर इलाज इस चुनौती से निपटने की कुंजी हैं। अगर ये प्रयास निरंतर जारी रहें, तो उत्तराखंड में टीबी के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और पहाड़ी राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों को स्वास्थ्य सुरक्षा के मजबूत आधार मिल सकते हैं। Post Views: 4 Post navigationगंगा बैराज पर भारत का पहला Seaplane टेस्ट: Twin Otter ने भरी सफल उड़ान 14 अप्रैल को होगा दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का लोकार्पण, सांसद ने सुझाया बाबा साहेब अंबेडकर का नाम