Spread the loveकेदारनाथ धाम में बाबा केदार के दर पर वीआईपी दर्शन की व्यवस्था को लेकर तीर्थ पुरोहितों का पारा चढ़ गया। उन्होंने बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के विरुद्ध मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। साथ ही वीआईपी गेट बंद करने की मांग उठाई गई। इस विरोध प्रदर्शन का वीडियो भी जमकर वायरल किया जा रहा है। दूसरी तरफ राज्य सरकार ने भी घटना का संज्ञान लिया है। इस तरह की बातें संज्ञान में आई हैं कि पुलिस कर्मी और कुछ अन्य पैसे लेकर भी वीआईपी दर्शन करवाते हैं। लिहाजा, धाम की व्यवस्था में अन्यत्र की पुलिस को लगाने की तैयारी है।केदारनाथ धाम में वीआईपी दर्शन को लेकर उठा विवाद अब केवल स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मामला राज्य स्तर पर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थस्थल केदारनाथ धाम में तीर्थ पुरोहितों द्वारा किया गया विरोध यह संकेत देता है कि परंपरागत व्यवस्था और आधुनिक प्रबंधन के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है।तीर्थ पुरोहितों ने बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति यानी बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर की। उनका आरोप है कि वीआईपी दर्शन की व्यवस्था से आम श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव हो रहा है, जबकि परंपरागत रूप से सभी भक्तों को समान अधिकार मिलना चाहिए। इसी को लेकर पुरोहितों ने नारेबाजी करते हुए वीआईपी गेट को पूरी तरह बंद करने की मांग उठाई।इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील बन गया है। विरोध करने वाले पुरोहितों का कहना है कि पैसे के आधार पर दर्शन की सुविधा देना धार्मिक आस्था के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।दूसरी ओर, उत्तराखंड सरकार ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है। प्रारंभिक स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि कुछ पुलिसकर्मी और अन्य लोग कथित रूप से पैसे लेकर वीआईपी दर्शन करवा रहे हैं। इस आरोप के बाद सरकार ने जांच के संकेत दिए हैं और धाम की सुरक्षा एवं व्यवस्था में बाहरी जिलों की पुलिस तैनात करने की तैयारी की जा रही है, ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।यह विवाद कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है—क्या तीर्थस्थलों पर वीआईपी संस्कृति को पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए? क्या श्रद्धा और सुविधा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है? और सबसे अहम, क्या धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाएं पारदर्शी और समानता पर आधारित होनी चाहिए?आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और मंदिर समिति इस मुद्दे का समाधान किस तरह निकालते हैं, क्योंकि केदारनाथ धाम न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी एक अहम हिस्सा है। Post Views: 23 Post navigationधामी कैबिनेट के 18 बड़े फैसले: परिवहन से लेकर मदरसा सुधार और कुंभ 2027 तक, उत्तराखंड के भविष्य की नई दिशा तय शादी की 40वीं वर्षगांठ पर केदारनाथ पहुंचे गौतम अडाणी, बाबा केदार के दर पर लिया आशीर्वाद, रोपवे परियोजना का किया हवाई सर्वे